जौनपुर के डेहरी गांव में नौशाद अहमद दुबे के भतीजे के वलीमा का अनोखा कार्ड सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। 356 साल पुरानी वंश परंपरा, पीएम–सीएम को न्योता और दो अलग लिफाफों ने इस वलीमा को देशभर में चर्चा का विषय बना दिया है।

शादी के कार्ड अक्सर तारीख, जगह और मेहमानों की सूची तक सीमित होते हैं, लेकिन जौनपुर के एक गांव से निकला वलीमा कार्ड इन दिनों सामाजिक सौहार्द और पहचान की बहस का केंद्र बन गया है। केराकत क्षेत्र के डेहरी गांव निवासी और विशाल भारत संस्थान के जिला चेयरमैन नौशाद अहमद ‘दुबे’ के भतीजे के निकाह पर जारी बहुभोज का यह अनोखा निमंत्रण पत्र सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और लोग इसे हिंदू–मुस्लिम एकता की मिसाल के तौर पर देख रहे हैं।

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356 साल पुरानी वंश परंपरा का जिक्र

वायरल हो रहे वलीमा कार्ड के लिफाफे पर वर्ष 1669 ई. के जमींदार लालबहादुर दुबे का उल्लेख है। कार्ड में बताया गया है कि उन्हीं की आठवीं पीढ़ी के वंशज खालिद ‘दुबे’ के निकाह एवं बहुभोज के शुभ अवसर पर मेहमानों को आमंत्रित किया गया है। इस ऐतिहासिक वंश परंपरा का जिक्र लोगों के लिए आकर्षण का विषय बना हुआ है। सोशल मीडिया पर कई लोग नौशाद अहमद ‘दुबे’ की सराहना कर रहे हैं कि उन्होंने अपने पारंपरिक सरनेम को आज भी संजोकर रखा है, जो मौजूदा दौर में कम देखने को मिलता है।

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पीएम–सीएम और संघ परिवार को भी भेजा न्योता

नौशाद अहमद ‘दुबे’ ने बताया कि रविवार को उनके भतीजे खालिद का निकाह संपन्न हो रहा है, जिसके उपलक्ष्य में बहुभोज का आयोजन किया गया है। उन्होंने कहा कि इस अवसर पर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री समेत संघ परिवार को भी विशाल भारत संस्थान के माध्यम से निमंत्रण भेजा गया है। उनका कहना है कि वे चाहते हैं कि इस आयोजन के जरिए भाईचारे और आपसी सम्मान का संदेश ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे।

दो तरह के लिफाफों पर शुरू हुई नई बहस

वलीमा कार्ड को लेकर एक और चर्चा सामने आई है। बताया जा रहा है कि बहुभोज के लिए दो अलग-अलग तरह के लिफाफे छपवाए गए हैं। एक लिफाफे पर आठवीं पीढ़ी के वंशज होने का उल्लेख है, जबकि दूसरे पर सिर्फ “बहुभोज (दावते वलीमा)” लिखा गया है। कयास लगाए जा रहे हैं कि हिंदू और मुस्लिम समाज के लिए अलग-अलग कार्ड तैयार किए गए हैं, जिसने इस पूरे मामले को और अधिक चर्चित बना दिया है।

पहले भी सरनेम को लेकर उठ चुका है बवाल

यह पहला मौका नहीं है जब नौशाद अहमद ‘दुबे’ का नाम सुर्खियों में आया हो। करीब एक साल पहले 10 दिसंबर को उनके परिवार में हुई शादी के दौरान कार्ड पर ‘नौशाद अहमद दुबे’ नाम छपवाने को लेकर सियासी और सामाजिक बहस छिड़ गई थी। उस समय मुस्लिम समुदाय में नाराजगी देखने को मिली थी, जबकि हिंदू समाज ने इसे खुले दिल से स्वीकार किया था। अब एक बार फिर वलीमा कार्ड ने डेहरी गांव को चर्चा के केंद्र में ला दिया है और सामाजिक सौहार्द, पहचान और परंपरा को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है।

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