Kedarnath Dham: जानें कौन हैं आदि गुरु शंकराचार्य? PM Modi ने जिनकी मूर्ति का किया अनावरण

वीडियो डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केदारनाथ धाम पहुंचे हैं। जहां उन्होंने बाबा केदारनाथ के दर्शन किए साथ ही आदि गुरु शंकराचार्य की मूर्त की अनावरण किया। ऐसे में जानना जरूरी है कि कौन थे आदि गुरु शंकराचार्य जिन्हें भगवान शंकर का अवतार माना जाता है। आदि गुरु शंकराचार्य का जन्म 788 ईं में हुआ था इनका नाम शंकर था। 

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वीडियो डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केदारनाथ धाम पहुंचे हैं। जहां उन्होंने बाबा केदारनाथ के दर्शन किए साथ ही आदि गुरु शंकराचार्य की मूर्त की अनावरण किया। ऐसे में जानना जरूरी है कि कौन थे आदि गुरु शंकराचार्य जिन्हें भगवान शंकर का अवतार माना जाता है। आदि गुरु शंकराचार्य का जन्म 788 ईं में हुआ था इनका नाम शंकर था। आदि गुरु अद्वैत वेदान्त के प्रणेता, संस्कृत के विद्वान, उपनिषद व्याख्याता और हिन्दू धर्म प्रचारक थे। इन्होंने लगभग पूरे भारत की यात्रा की और इनके जीवन का अधिकांश भाग उत्तर भारत में बीता। शंकराचार्य को भारत के ही नहीं अपितु सारे संसार के उच्चतम दार्शनिकों में महत्व का स्थान प्राप्त है। उन्होंने अनेक ग्रन्थ लिखे हैं, लेकिन उनका दर्शन विशेष रूप से उनके तीन भाष्यों में, जो उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और गीता हैं, इनमें मिलता है। वेद-शास्त्रों के ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने देश भर की यात्रा की और जनमानस को हिंदू वैदिक सनातन धर्म और उसमें वर्णित संस्कारों से अवगत कराया। उनके दर्शन ने सनातन संस्कृति को एक नई पहचान दी और भारतवर्ष के कोने-कोने तक उन्होंने लोगों को वेदों के महत्वपूर्ण ज्ञान से अवगत कराया। इनके बारे में कहा जाता है कि आठ वर्ष की आयु में उन्होंने चार वेद, बारह वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर लिया तथा सोलह वर्ष की आयु में उपनिषद आदि ग्रन्थों के भाष्यों रचना की। इन्होंने भारतवर्ष के चार कोनों में चार मठों की स्थापना की थी जो अभी तक बहुत प्रसिद्ध और पवित्र माने जाते हैं और जिन पर आसीन संन्यासी 'शंकराचार्य' कहे जाते हैं। ये चारों स्थान हैं- ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्रम, श्रृंगेरी पीठ, द्वारिका शारदा पीठ और पुरी गोवर्धन पीठ। शंकराचार्य जी का जीवनकाल सिर्फ 32 वर्ष का था। 2013 में आई आपदा में आदि गुरु शंकराचार्य समाधि की मूल प्रतिमा बह गई थी। नई मूर्ति को मैसूर के कलाकार अरुण योगीराज समेत नौ कारीगरों ने एक साल में तैयार किया। खास बात है कि 130 वजनी शिला को तराशने के बाद इका वजन 35 टन हो गया।

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