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वेनेजुएला ही नहीं, इन 8 देशों में भी घुस चुकी अमेरिकी सेना..दादागीरी के दम पर बदली सत्ता

US Military Intervention History: अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला में घुसकर हमले किए और राष्ट्रपति को उठा ले गई। यह पहली बार नहीं, जब यूएस आर्मी किसी देश में घुसी हो। पिछले 70 सालों में कई देशों में सत्ता बदल चुकी है। जानिए इस लिस्ट में कौन-कौन से देश हैं

4 Min read
Author : Satyam Bhardwaj
Published : Jan 05 2026, 05:57 PM IST
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इराक (2003)

20 मार्च 2003 को अमेरिका ने इराक पर हमला किया। तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने दावा किया कि इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के पास WMD (Weapons of Mass Destruction) हैं, जो पूरी दुनिया के लिए खतरा हैं। युद्ध के बाद जब जांच हुई तो ऐसे किसी सक्रिय WMD प्रोग्राम के सबूत नहीं मिले। इसके बावजूद सद्दाम हुसैन की सत्ता खत्म हो चुकी थी, देश अराजकता में चला गया और आज भी इराक उस युद्ध के असर से उबर नहीं पाया है।

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अफगानिस्तान (2001)

11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में ऑपरेशन एंड्यूरिंग फ्रीडम शुरू किया। मकसद अल-कायदा को खत्म करना और उसे शरण देने वाले तालिबान शासन को हटाना था। अमेरिकी संसद ने 'ऑथराइजेशन फॉर यूज ऑफ मिलिट्री फोर्स' पास किया, जिससे इस युद्ध को कानूनी आधार मिला। यह लड़ाई करीब 20 साल चली, लाखों जानें गईं और आखिरकार अमेरिका को बिना निर्णायक जीत के वापस लौटना पड़ा।

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पनामा पर चढ़ाई (1989)

दिसंबर 1989 में अमेरिका ने 27 हजार से ज्यादा सैनिकों के साथ पनामा पर हमला किया। टारगेट पर राष्ट्रपति मैनुअल नोरिएगा थे, जिन पर अमेरिका में ड्रग तस्करी के आरोप लगे थे। अमेरिकी सेना ने कुछ ही दिनों में पनामा की सेना को हरा दिया और नोरिएगा ने आत्मसमर्पण कर दिया। अमेरिका ने इसे अपने नागरिकों की सुरक्षा बताया, लेकिन दुनिया ने इसे सीधा सत्ता पलट माना।

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ग्रेनेडा (1983)

अक्टूबर 1983 में कैरेबियन के छोटे से देश ग्रेनेडा में सरकार बदलने के लिए एक तख्तापलट हुआ और हालात तेजी से बिगड़ गए। इसी बीच अमेरिका ने दावा किया कि वहां पढ़ रहे अमेरिकी मेडिकल स्टूडेंट्स खतरे में हैं। बस यही वजह बन गई एक बड़े सैन्य ऑपरेशन की। करीब 7,600 अमेरिकी सैनिकों ने ग्रेनेडा में एंट्री की। 'Operation Urgent Fury' चलाया गया। लेकिन दुनिया के कई देशों ने इसे सीधा दखल और संप्रभुता का उल्लंघन बताया। आलोचकों का कहना था कि खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया और असल मकसद सरकार बदलना और अमेरिका समर्थक व्यवस्था बनाना था।

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डोमिनिकन रिपब्लिक (1965)

साल 1965 में डोमिनिकन रिपब्लिक गृहयुद्ध की आग में जल रहा था। अमेरिका को डर था कि कहीं यह देश भी क्यूबा की तरह कम्युनिस्ट खेमे में न चला जाए। अमेरिका ने बिना किसी युद्ध घोषणा के यूएस मरीन और आर्मी को सीधे देश में उतार दिया। 'ऑपरेशन पावर पैक'(Operation Power Pack) चलाया। अमेरिका ने कहा कि वह अपने नागरिकों की रक्षा और कम्युनिज्म को रोकने आया है। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह सत्ता परिवर्तन की कहानी थी। अमेरिका की मध्यस्थता से Act of Reconciliation (1965) हुआ। हेक्टर गार्सिया-गोडॉय को अस्थायी राष्ट्रपति बनाया गया 1966 के चुनावों के बाद अमेरिका समर्थक जोकिन बालागुएर सत्ता में आए।इसके बाद ही अमेरिकी सेना वापस लौटी।

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वियतनाम युद्ध (1964-1973)

गल्फ ऑफ टोंकिन घटना के बाद अमेरिकी संसद ने राष्ट्रपति को युद्ध की खुली छूट दे दी। इसके तहत ऑपरेशन पियर्स एरो शुरू हुआ और उत्तरी वियतनाम पर भारी बमबारी की गई। बाद में पेंटागन पेपर्स सामने आए, जिनसे पता चला कि जनता को गुमराह किया गया था। इसी अनुभव के बाद 1973 में 'वॉर पावर्स रिजोल्यूशन' लाया गया, ताकि राष्ट्रपति की सैन्य ताकत पर लगाम लगाई जा सके।

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कोरियाई युद्ध (1950-1953)

जब उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया पर हमला किया, तब अमेरिका ने इसे युद्ध नहीं बल्कि UN के तहत ‘पुलिस एक्शन’ बताया। अमेरिकी सैनिक बड़ी संख्या में मैदान में उतरे और जनरल डगलस मैकआर्थर के नेतृत्व में लड़ाई लड़ी गई। नतीजा यह हुआ कि कोरिया हमेशा के लिए दो हिस्सों में बंट गया।

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वेनेजुएला (2026)

अमेरिकी संविधान के अनुसार, युद्ध की घोषणा का अधिकार केवल कांग्रेस के पास है। 'वॉर पावर्स रिजोल्यूशन 1973' के तहत राष्ट्रपति को 48 घंटे के भीतर संसद को सूचना देना अनिवार्य है। लेकिन वेनेजुएला में हुई कार्रवाई में पहले कोई सूचना नहीं दी गई। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लीक की आशंका का हवाला दिया। विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बाद में जानकारी देने की बात कही, लेकिन तय समय में रिपोर्ट दाखिल न होने से संवैधानिक संकट की बहस छिड़ गई। इस हमले में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिकी सेना उठा ले गई।

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About the Author

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Satyam Bhardwaj
सत्यम भारद्वाज। 2017 से जर्नलिज्म की फील्ड में काम कर रहे हैं, 8 साल का अनुभव। अक्टूबर 2021 से एशियानेट न्यूज हिंदी से जुड़कर सेवाएं दे रहे हैं। उन्होंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) से जर्नलिज्म एंड मॉस कम्युनिकेशन में मास्टर डिग्री हासिल की है। पॉलिटिकल न्यूज, नेशनल न्यूज, बिजनेस-टेक और ऑटो, क्राइम और फीचर स्टोरीज में खास इंट्रेस्ट है। अलग-अलग मीडिया इंस्टीट्यूशन और कई पब्लिक रिपोर्ट्स बनाने का अनुभव।
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