मार्गशीर्ष यानी अगहन मास भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति का महीना है। इस मास में श्रीकृष्ण की विशेष पूजा अर्चना का काफी महत्व है। इस महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी कहते हैं।

उज्जैन. मार्गशीर्ष यानी अगहन मास भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति का महीना है। इस मास में श्रीकृष्ण की विशेष पूजा अर्चना का काफी महत्व है। इस महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी कहते हैं। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा का विधान है। इस बार यह एकादशी 11 दिसंबर, शुक्रवार को है।

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इस विधि से करें एकादशी का व्रत…

- उत्पन्ना एकादशी के एक दिन पहले यानी दशमी तिथि (10 दिसंबर, गुरुवार) को शाम का भोजन करने के बाद अच्छी प्रकार से दातुन करें ताकि अन्न का अंश मुंह में न रह जाएं। इसके बाद कुछ भी नहीं खाएं, न अधिक बोलें। एकादशी की सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद व्रत का संकल्प लें।
- इसके बाद धूप, दीप, नैवेद्य आदि सोलह चीजों से भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करें और रात को दीपदान करें। रात में सोए नहीं। सारी रात भजन-कीर्तन आदि करना चाहिए। जो कुछ पहले जाने-अनजाने में पाप हो गए हों, उनकी क्षमा मांगनी चाहिए।
- अगले दिन (12 दिसंबर, शनिवार) सुबह फिर से भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करें व योग्य ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देने के बाद ही स्वयं भोजन करें। धर्म शास्त्रों के अनुसार, इस व्रत का फल हजारों यज्ञों से भी अधिक है।

ये है उत्पन्ना एकादशी की कथा...

- उत्पन्ना एकादशी के संबंध में शास्त्रों एक कथा बताई है। ये कथा इस प्रकार है- सतयुग में मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी तिथि को मुर नामक राक्षस का वध किया गया था। मुर राक्षस परम बुद्धिमान व महाबली था।
- उसने देवताओं को स्वर्ग लोक से निकाल कर अधिकार कर लिया था। तब सभी देवता इंद्र सहित भगवान शिव के पास मदद मांगने पहुंचे। शिवजी ने उन्हें विष्णु के पास भेज दिया।
- भगवान विष्णु ने देवताओं की मदद के लिए अपने शरीर से एक परम रूपवती स्त्री उत्पन्न की, जिसने मुर नामक राक्षस का वध किया।
- इससे प्रसन्न भगवान विष्णु ने उस स्त्री का नाम उत्पन्ना रखा और कहा जो आज के दिन उत्पन्ना एकादशी का व्रत करेगा उन्हें सभी सिद्धियां प्राप्त होगी और सभी कामनाएं पूर्ण होंगी।

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