भारत में बैंकों से कैश निकासी में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है, अप्रैल में ₹61,000 करोड़ निकाले गए। टैक्स का डर, चुनाव और बैंकों में कम भरोसे के कारण लोग कैश रख रहे हैं। इससे लोन महंगे होने और अर्थव्यवस्था पर असर पड़ने का खतरा है।
RBI Cash Withdrawal Report: एक तरफ खाड़ी युद्ध की वजह से देश में महंगाई बढ़ने लगी है, तो दूसरी तरफ लोग बैंकों से अपना कैश निकालने में जुटे हैं। रिपोर्ट बताती है कि अप्रैल के पहले 15 दिनों में ही भारतीय बैंकों से 61,000 करोड़ रुपये निकाल लिए गए। ये उस भारत में हो रहा है, जहां 46% लेन-देन डिजिटल हैं और सब्जीवाला भी QR कोड लगाकर पेमेंट लेता है। तो फिर अचानक लोग बैंकों से कैश क्यों निकालने लगे? अगर RBI के आंकड़ों को देखें तो आज भारत में 42.3 लाख करोड़ रुपये सर्कुलेशन में हैं, जो नोटबंदी के बाद का सबसे बड़ा आंकड़ा है।

क्यों भारत में लोग कैश निकालने लगे हैं?
2016 की नोटबंदी के 9 साल में पहली बार भारतीय अर्थव्यवस्था में ऐसा उछाल देखा गया है, जहां लोग बैंक खातों से कैश निकाल रहे हैं। इससे पहले कैश की मांग इतनी तेजी से कभी नहीं बढ़ी। अब सवाल उठता है कि यह बढ़ोतरी क्यों हुई? क्या लोगों का बैंकों पर भरोसा कम हो गया है? क्या वे डिजिटल पेमेंट पर यकीन नहीं कर पा रहे हैं या इस कैश के पीछे ब्लैक इकोनॉमी का खतरा बढ़ रहा है? कैश निकालने में इस तेजी की वजहों और इससे जुड़े खतरों को समझना जरूरी है।
लोग बैंक में रखने के बजाय अपने पास कैश क्यों रखना चाहते हैं?
रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल के मुकाबले करेंसी सर्कुलेशन में 11.8% की बढ़ोतरी हुई है। जनता के पास मौजूद कैश का आंकड़ा अप्रैल 2026 में 39 लाख करोड़ रुपये को पार कर गया। अप्रैल के पहले 15 दिनों में ही 61,000 करोड़ रुपये निकाले गए। SBI की रिपोर्ट कहती है कि कैश निकालने का यह ट्रेंड अक्टूबर 2025 से शुरू हुआ और अप्रैल 2026 में इसने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। कैश निकालने के पीछे तीन बड़ी वजहें हैं- टैक्स का डर, चुनावी साइकिल और तीसरी सबसे बड़ी वजह है एहतियाती मांग।
टैक्स का डर: कुछ महीने पहले, कर्नाटक सरकार ने 6000 व्यापारियों को GST नोटिस भेज दिए थे। ये वो व्यापारी थे जिन्होंने GST रजिस्ट्रेशन नहीं कराया था। सरकार ने UPI ट्रांजैक्शन की मदद से उनका डेटा ट्रैक किया और नोटिस भेज दिए, जिसके बाद कर्नाटक, मैसूर समेत दक्षिण के कई राज्यों में UPI का बायकॉट किया गया। व्यापारियों ने कैश में लेन-देन करना शुरू कर दिया।
चुनावी कनेक्शन: पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के कारण भी कैश की मांग बढ़ी है। चुनावी माहौल में कैश की मांग बढ़ जाती है। चुनाव आयोग की सख्ती के बावजूद कई जगहों पर कैश पकड़ा भी गया।
बैंकिंग सिस्टम में भरोसा कम: लोगों का बैंकिंग सिस्टम पर भरोसा कम होने लगा है। FD पर ब्याज दरें पहले ही कम हो चुकी हैं, इसलिए लोग बैंकों में बचत करने से बच रहे हैं। एहतियाती मांग के चलते भी कैश में बढ़ोतरी देखी गई है। बैंकिंग नियमों में बदलाव, बढ़ते जोखिम और बढ़ती महंगाई के कारण मिडिल क्लास परिवार अब पैसा जमा करने के बजाय घर पर कैश रखने की ओर बढ़ रहे हैं। सोने-चांदी के दाम बढ़ने से लोगों ने मुनाफे के लिए बाजार में पैसे का फ्लो बढ़ा दिया है। लोग सोना बेचकर कैश तो ले रहे हैं, लेकिन उसे बैंक में जमा करने की बजाय घर पर ही रख रहे हैं।
बैंकों का बिगड़ता बैलेंस
अगर हम कैश निकासी को देखें, तो HDFC, ICICI जैसे बड़े बैंकों में क्रेडिट और डिपॉजिट के अनुपात में 80% तक का अंतर है। इसका मतलब है कि बैंक कर्ज तो ज़्यादा दे रहे हैं, लेकिन उनके पास FD कम आ रही है। बैंकों में जमा पैसा कम होना बड़े खतरे का संकेत दे रहा है। बैंकों में कैश फ्लो कम होने से लिक्विडिटी का दबाव बनता है। जब बैंकों के पास जमा पैसा कम होगा, तो उन्हें लोन बांटने में कैश की दिक्कत होगी। इसका मतलब है कि लोन महंगे होने लगेंगे। आपका होम लोन और कार लोन महंगा हो जाएगा। बैंकों में जमा कम होने पर बड़ी कंपनियों को फंड मिलने में दिक्कत होगी, जिसका असर देश के रोजगार और विकास पर दिखेगा।
पैसे निकालने के फेर में फंसती अर्थव्यवस्था?
कैश की यह निकासी देश की अर्थव्यवस्था को खोखला कर सकती है। बैंकों से कैश निकालने में बढ़ोतरी और जमा में कमी के कारण कर्ज महंगा होगा। कंपनियों को देने के लिए फंड की कमी होगी, जो रोजगार और देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा। डिजिटल इंडिया के 10 साल के बावजूद, ग्रामीण अर्थव्यवस्था अब भी कैश पर ही लेन-देन करती है। कैश का यह उछाल अर्थव्यवस्था की कमजोरी, टैक्स को लेकर डर, चुनावी खेल में काले धन का चक्कर और बैंकिंग सिस्टम की कमजोरी को दिखाता है। बाजार में बढ़ता यह कैश देश की अर्थव्यवस्था को दस साल पीछे ले जा रहा है, जहां से नोटबंदी के बाद बाहर निकलने की कोशिश की गई थी।
