Germany vs India Job Market: जर्मनी में नौकरी पाना भारत से कितना अलग है? भारतीय महिला ने बताया जर्मनी का जॉब मार्केट, रिजेक्शन और भर्ती प्रक्रिया का पूरा सच।

Germany Jobs: जर्मनी का जॉब मार्केट, भारत की कैंपस प्लेसमेंट कल्चर से बिल्कुल अलग है। एक भारतीय प्रोफेशनल का सोशल मीडिया पोस्ट वायरल हो रहा है जिसमें उन्होंने बताया कि वहां नौकरी पाने के लिए धैर्य, लगातार कोशिश और रिजेक्शन से सीखना सबसे जरूरी होता है। उन्होंने बताया कि जर्मनी में पढ़ाई या नौकरी का सपना देखने वाले भारतीय छात्रों के लिए वहां का जॉब मार्केट पहली नजर में काफी अलग लग सकता है। भारत में जहां कई कॉलेजों में कैंपस प्लेसमेंट के जरिए छात्रों को फाइनल ईयर में ही नौकरी मिल जाती है, वहीं जर्मनी में ऐसा कोई तय रास्ता नहीं होता। वहां डिग्री पूरी करने के बाद हर उम्मीदवार को खुले बाजार में बाकी सभी आवेदकों के साथ बराबरी से नौकरी के लिए आवेदन करना पड़ता है।

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भारत और जर्मनी के जॉब सिस्टम में सबसे बड़ा अंतर

जर्मनी में रहने वाली भारतीय महिला श्रुति ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपना अनुभव शेयर करते हुए बताया कि जर्मनी में फाइनल ईयर मतलब नौकरी पक्की जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। पढ़ाई पूरी होने के बाद उम्मीदवारों को अलग-अलग कंपनियों में खुद आवेदन करना पड़ता है और चयन पूरी तरह भर्ती प्रक्रिया पर निर्भर करता है। उन्होंने बताया कि आवेदन करने के बाद लंबे समय तक किसी तरह का जवाब न मिलना भी वहां की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है। कई बार उम्मीदवारों को महीनों तक सिर्फ इंतजार करना पड़ता है।

रिजेक्शन से गुजरना पड़ता है बार-बार

श्रुति के मुताबिक, नौकरी की तलाश का सबसे मुश्किल दौर बार-बार मिलने वाला रिजेक्शन होता है। उन्होंने बताया कि उम्मीदवार उम्मीद के साथ ईमेल चेक करते हैं, लेकिन कई बार उन्हें "Leider" यानी "दुर्भाग्यवश" से शुरू होने वाला रिजेक्शन मेल मिलता है। उनका कहना है कि लगातार मिलने वाले ऐसे जवाब किसी भी व्यक्ति का आत्मविश्वास कमजोर कर सकते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि इसका मतलब यह नहीं होता कि उम्मीदवार में योग्यता की कमी है।

हर रिजेक्शन के पीछे नहीं होती आपकी गलती

श्रुति ने बताया कि जर्मनी में रिजेक्शन सामान्य बात है और अच्छे प्रोफाइल वाले उम्मीदवार भी इससे बच नहीं पाते। इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं। जैसे किसी पद पर बहुत ज्यादा आवेदन आ जाना, जर्मन भाषा की आवश्यकता, कंपनी का बजट कम होना, भर्ती प्रक्रिया का रुक जाना या फिर कुछ वैकेंसी का कभी भरा ही न जाना। यानी हर बार रिजेक्ट होने का कारण उम्मीदवार की क्षमता नहीं होती, बल्कि कई बाहरी परिस्थितियां भी जिम्मेदार होती हैं। नीचे देखें वायरल पोस्ट-

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सफलता का रास्ता है लगातार सुधार और धैर्य

श्रुति का मानना है कि जर्मनी में नौकरी पाने का सबसे प्रभावी तरीका लगातार सीखते रहना है। हर आवेदन के बाद रिज्यूमे में सुधार करना, अनुभव से सीखना और फिर नई नौकरी के लिए आवेदन करना इस पूरी प्रक्रिया का हिस्सा है। उनकी पोस्ट पर कई लोगों ने भी प्रतिक्रिया दी। कुछ यूजर्स ने कहा कि भारत जैसी कैंपस प्लेसमेंट व्यवस्था दुनिया के अधिकांश देशों में देखने को नहीं मिलती। इस पर श्रुति ने भी सहमति जताते हुए कहा कि भारत का कैंपस प्लेसमेंट मॉडल वैश्विक स्तर पर काफी अलग और सीमित देशों में ही देखने को मिलता है। जो छात्र जर्मनी में करियर बनाने की योजना बना रहे हैं, उनके लिए यह अनुभव एक महत्वपूर्ण सीख है कि वहां नौकरी पाने के लिए केवल अच्छी डिग्री ही नहीं, बल्कि धैर्य, तैयारी और लगातार प्रयास भी उतने ही जरूरी हैं।