ज़ोमैटो डिलीवरी पार्टनर उमा रोज़ 200 किमी बाइक चलाकर 25 ऑर्डर पूरे करती हैं। अपने बेटे के लिए उनकी यह मेहनत प्रेरणा है, पर यह कहानी गिग इकॉनमी की चुनौतियों को भी उजागर करती है।

सोशल मीडिया पर एक पोस्ट वायरल हो रही है, जिसमें ज़ोमैटो की डिलीवरी पार्टनर उमा की कहानी बताई गई है। अपने परिवार के लिए उनकी मेहनत और लगन को देखकर हर कोई उन्हें सलाम कर रहा है। रोज़ाना सैकड़ों किलोमीटर बाइक चलाकर लोगों तक खाना पहुंचाने वाली उमा की कहानी कई लोगों के लिए प्रेरणा बन गई है।

सुबह 5 बजे से शुरू होता है दिन

वायरल पोस्ट के मुताबिक, उमा का दिन सुबह 5 बजे ही शुरू हो जाता है। उनका पहला काम होता है अपने बेटे को साइकिल पर बिठाकर क्रिकेट ट्रेनिंग के लिए ले जाना, जो करीब 15 किलोमीटर दूर है। वहां से लौटकर वह घर का सारा काम निपटाती हैं और फिर दोपहर में अपने डिलीवरी के काम पर निकल जाती हैं। उनका काम भी आसान नहीं है। पोस्ट में बताया गया है कि वह दोपहर 12 बजे से लेकर रात 11 बजे तक फूड डिलीवरी करती हैं। इस दौरान वह हर दिन करीब 18 से 25 ऑर्डर पूरे करती हैं।

हर दिन 200 किमी से ज़्यादा बाइक चलाती हैं!

इतने सारे ऑर्डर पूरे करने के लिए उमा को रोज़ाना 200 किलोमीटर से भी ज़्यादा बाइक चलानी पड़ती है। यह दूरी करीब-करीब दिल्ली से चंडीगढ़ जाने जितनी है। दिन भर की इस कड़ी मेहनत के बाद उन्हें रात में सिर्फ़ पांच घंटे ही आराम करने को मिलता है और अगले दिन फिर वही रूटीन शुरू हो जाता है।

परिवार की ज़िम्मेदारी ही सबसे बड़ी प्रेरणा

पोस्ट में बताया गया है कि करीब एक दशक पहले उमा के पति का निधन हो गया था। तब से अपने बेटे की परवरिश की पूरी ज़िम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है। घर का खर्च चलाने और बेटे के बेहतर भविष्य के लिए वह दिन-रात मेहनत कर रही हैं। उनकी यह कहानी सोशल मीडिया पर लोगों का दिल छू रही है। यह भी दावा किया गया है कि 2020 में उन्हें ज़ोमैटो की तरफ से 'स्टार डायमंड' अवॉर्ड भी मिला था। उन्होंने आज तक कोई भी ऑर्डर कैंसिल नहीं किया और न ही कभी डिलीवरी में देरी की।

तारीफ़ के साथ 'गिग इकॉनमी' पर बहस

एक तरफ जहां लोग उमा के जज़्बे और मेहनत की तारीफ़ कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ लोगों ने 'गिग इकॉनमी' (डिलीवरी जैसे कामों से जुड़ी अर्थव्यवस्था) पर सवाल उठाए हैं। लोगों का कहना है कि इतनी कड़ी मेहनत के बावजूद इन कर्मचारियों की कमाई और भविष्य की सुरक्षा के लिए क्या बेहतर मौके हैं?

इस वजह से उमा की कहानी सिर्फ़ एक प्रेरणा बनकर नहीं रह गई है, बल्कि इसने डिलीवरी कर्मचारियों पर काम के दबाव, उनकी कमाई, सामाजिक सुरक्षा और भविष्य को लेकर एक बड़ी बहस भी छेड़ दी है। हालांकि, वायरल पोस्ट में किए गए दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना ज़रूरी है, लेकिन उमा की कहानी ने मेहनत और 'गिग इकॉनमी' की हकीकत पर सोचने के लिए एक नई वजह ज़रूर दे दी है।