कैरेक्टर आर्टिस्ट्स जतिन नेगी और सुनीता राजवार ने फिल्म इंडस्ट्री का कड़वा सच उजागर किया। सेट पर खाने, सम्मान, वैनिटी वैन और पेमेंट में भेदभाव के आरोप लगाए।
बॉलीवुड की चमक-दमक के पीछे छिपी एक ऐसी दुनिया भी है, जहां हर कलाकार को बराबरी का दर्जा नहीं मिलता। फिल्मों और टीवी इंडस्ट्री में सालों से काम कर रहे कैरेक्टर आर्टिस्ट्स जतिन नेगी और सुनीता राजवार ने सेट्स पर होने वाले भेदभाव, सम्मान की कमी और पेमेंट में देरी को लेकर कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। उनका दावा है कि इंडस्ट्री में कलाकारों को A, B और C कैटेगरी में बांटकर खाना तक परोसा जाता है। इतना ही नहीं, छोटे कलाकारों को कई बार 90 दिन बाद भुगतान मिलता है, जबकि बड़े सितारों को करोड़ों रुपये समय पर दिए जाते हैं। इन खुलासों ने बॉलीवुड के ग्लैमर के पीछे की सच्चाई पर नई बहस छेड़ दी है।

सेट पर कलाकार नहीं, किरदार की हैसियत देखी जाती है
स्क्रीन से बातचीत में ‘बेल बॉटम’ जैसी फिल्मों में नज़र आए जतिन नेगी ने कहा, "कैरेक्टर आर्टिस्ट्स को आमतौर पर तब तक सम्मान नहीं मिलता, जब तक वे परेश रावल या अनुपम खेर जैसे बड़े नाम न बन जाएं। बड़े कलाकारों को चार-चार वैनिटी वैन मिलती हैं, जबकि कैरेक्टर आर्टिस्ट्स को कई बार एक स्पॉट बॉय और साझा वैनिटी वैन से काम चलाना पड़ता है। आपका रोल ही तय करता है कि आपको कितना सम्मान मिलेगा।"
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सुनीता राजवार बोलीं- समाज जैसा ही है फिल्म इंडस्ट्री का माहौल
25 साल से इंडस्ट्री में एक्टिव और 'गुल्लक' जैसी सीरीज में नज़र आ चुकीं सुनीता राजवार ने भी इसी तरह का अनुभव साझा किया। उन्होंने कहा, "लीड कलाकार और कैरेक्टर आर्टिस्ट के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है। मुख्य भूमिका निभाने वाले कलाकारों के आसपास पूरी व्यवस्था घूमती है। लेकिन अगर आप छोटा किरदार निभा रहे हैं, तो कई बार स्पॉट बॉय तक सम्मान नहीं देते।" सुनीता के मुताबिक, छोटे कलाकारों के नाम तक याद नहीं रखे जाते और कई बार स्क्रिप्ट में उन्हें सिर्फ ‘मैन 1’ या ‘वुमन 2’ जैसे नामों से पहचाना जाता है।
A, B और C कैटेगरी का खाना, ‘कास्ट सिस्टम’ जैसा माहौल
सबसे बड़ा खुलासा सेट्स पर खाने को लेकर हुआ। जतिन नेगी ने दावा किया, "सेट पर A, B और C कैटेगरी बनाई जाती हैं। A कैटेगरी में बड़े और प्रमुख कलाकार होते हैं, जबकि जूनियर और एक्स्ट्रा कलाकारों के लिए अलग सेक्शन होता है। यह देखकर दिल टूट जाता है। माहौल बिल्कुल कास्ट सिस्टम जैसा महसूस होता है।" उन्होंने एक घटना याद करते हुए कहा कि एक बार उन्हें खाने के सेक्शन में जाने से रोक दिया गया था और बाद में अलग लाइन में भेजा गया। वे कहते हैं, "मुझे ऐसा लगा जैसे मैं कोई बाहरी व्यक्ति हूं। कई जगह A और B कैटेगरी के खाने और C कैटेगरी के खाने की गुणवत्ता में साफ अंतर दिखता है।"
जूनियर आर्टिस्ट्स को खड़े होकर खाना पड़ता है
जतिन के अनुसार कई प्रोडक्शन हाउस में जूनियर आर्टिस्ट्स को सेट से दूर खाना दिया जाता है। उन्होंने कहा, "कई बार उनके लिए टेंट तक नहीं होता। न कुर्सियां होती हैं और न बैठने की व्यवस्था। उन्हें खड़े होकर खाना पड़ता है।" हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि सभी जगह हालात ऐसे नहीं होते। जतिन ने कई बड़े सितारों की तारीफ भी की। उन्होंने बताया, "एक बार मेरे दोस्त ने ग्रीन टी मांगी तो स्पॉट बॉय ने मना कर दिया। तभी वहां मौजूद एक सुपरस्टार ने कहा, 'अगर एक कलाकार ग्रीन टी मांग रहा है तो उसे क्यों नहीं दी जा सकती?' इसके बाद तुरंत ग्रीन टी पहुंचाई गई। बड़े सितारे अक्सर दूसरों के लिए खड़े होते हैं।"
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करोड़ों स्टार्स को, लेकिन छोटे कलाकारों की पेमेंट अटकती है
पेमेंट को लेकर जतिन नेगी ने कहा, “लीड स्टार्स को करोड़ों रुपये दिए जाते हैं, लेकिन कैरेक्टर आर्टिस्ट्स के पांच लाख रुपये भी समय पर नहीं मिलते। अगर फिल्म फ्लॉप हो जाए तो सबसे पहले छोटे कलाकारों की पेमेंट अटकती है।” जतिन नेगी के मुताबिक, कलाकारों की पेमेंट कुछ इस प्रकार होती है:-
- तृतीयक (Tertiary) किरदार: लगभग ₹5,000 प्रतिदिन। (दो दिन के काम के लिए कुल ₹8,000–10,000, जो लगभग 2 महीने बाद मिलते हैं।)
- द्वितीयक (Secondary) किरदार: लगभग ₹10,000 प्रतिदिन। (पांच दिन के काम के लिए कुल ₹50,000, जो अक्सर 2 महीने बाद मिलते हैं।)
- प्राथमिक (Primary) किरदार: लगभग ₹15,000–25,000 प्रतिदिन।
- बड़े एक्टर: लगभग ₹50,000 प्रतिदिन।
- हिट किरदार बनने पर: लगभग ₹1,00,000 तक प्रतिदिन।
- लीड एक्टर: करोड़ों रुपये तक।
वहीं, सुनीता राजवर की मानें तो भुगतान कलाकार की मार्केट वैल्यू पर निर्भर करता है। उनके मुताबिक़, मुख्य एक्ट्रेसेस (Lead Actresses) को भी अक्सर हीरो से कम भुगतान मिलता है। कुछ एक्टर 5 दिन काम करके उतना या उससे अधिक कमा लेते हैं, जितना दूसरे एक्टर 15 दिन काम करके नहीं कमा पाते। कैरेक्टर आर्टिस्ट्स को नुकसान होने की स्थिति में सबसे पहले भुगतान कटौती का सामना करना पड़ता है। भुगतान की समय-सीमा पहले 45 दिन थी, फिर 60 दिन, और अब 90 दिन (टेलीकास्ट के बाद) हो गई है।
ग्लैमर नहीं, हकीकत में संघर्ष भरी जिंदगी
सुनीता राजवार ने बताया कि आज भी वे ऑटो और मेट्रो से सफर करती हैं। जतिन के मुताबिक़, वे 300 स्क्वायर फीट के घर में परिवार के साथ रहते हैं और मुंबई में गुजारा करना आसान नहीं है। जतिन नेगी का मानना है कि टीवी इंडस्ट्री में कैरेक्टर आर्टिस्ट्स को फिल्मों की तुलना में ज्यादा सम्मान और स्थिरता मिलती है। फिल्मों में कई बार आपकी इज्जत आपकी फीस से तय होती है।
