RSS प्रमुख मोहन भागवत ने शिक्षा पर 6% बजट की मांग का समर्थन करते हुए कहा कि यह अकेले सरकार का काम नहीं है। उन्होंने सामाजिक भागीदारी, बेहतर शिक्षक प्रशिक्षण और रोजगार में 'श्रम प्रतिष्ठा' यानी श्रम के सम्मान पर जोर दिया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को राष्ट्रीय बजट का छह प्रतिशत शिक्षा पर आवंटित करने की लंबे समय से चली आ रही मांग का समर्थन किया। उन्होंने इसे "उचित" बताते हुए कहा कि इसे लागू किया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि शिक्षा को व्यावसायिक गतिविधि नहीं माना जाना चाहिए।
मुंबई में एक कार्यक्रम में बोलते हुए भागवत ने कहा, "यह मांग उचित है, हमें ऐसा लगता है, और इसे लागू किया जाना चाहिए।" हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ शिक्षा बजट बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। उन्होंने कहा, "सिर्फ ऐसा करने से काम नहीं चलेगा क्योंकि किसी ने कभी यह नहीं कहा कि सरकार को पूरी शिक्षा व्यवस्था चलानी चाहिए। इसलिए, हम सब मिलकर इसे चला सकते हैं।"
RSS से जुड़े विद्या भारती स्कूलों का जिक्र करते हुए भागवत ने कहा कि सामाजिक भागीदारी और प्रतिबद्धता से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा संभव है। उन्होंने कहा, "हमारे कार्यकर्ता विद्या भारती संगठन के माध्यम से स्कूल चलाने का एक बहुत बड़ा प्रयास कर रहे हैं। लगभग 23,000 अच्छे स्कूल चल रहे हैं। यह केवल बजट के कारण नहीं हुआ है; यह नई पीढ़ी की चिंता और उसके परिणामस्वरूप किए गए प्रयास के कारण हुआ है।"
जन जागरूकता से बनेगा दबाव
भागवत ने कहा कि शिक्षा के बारे में जन जागरूकता पैदा करने से अंततः सरकारें काम करने के लिए मजबूर होंगी। उन्होंने कहा, "अगर ऐसा होता है, तो लोगों में एक माहौल बनेगा, और कोई भी सरकार या राजनेता जनता की अनदेखी नहीं कर सकता। तो, यह बिना किसी आंदोलन के भी हो जाएगा, और 6 प्रतिशत का बजट हासिल हो जाएगा। बिल्कुल।"
शिक्षा व्यावसायिक धंधा नहीं
भागवत ने कहा कि शिक्षा जीवन की एक आवश्यकता है और इसे सभी के लिए सुलभ बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "शिक्षा कोई व्यावसायिक धंधा नहीं है; यह जीवन की एक आवश्यकता है। इसलिए, शिक्षा सभी के लिए आसानी से सुलभ होनी चाहिए। इसके लिए फीस और अन्य मामलों पर बहुत विचार करने की आवश्यकता है।"
RSS प्रमुख ने इस बात पर जोर दिया कि समाज को भी केवल सरकार पर निर्भर रहने के बजाय शैक्षिक बुनियादी ढांचे में सुधार की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। उन्होंने कहा, "कई जगहें हैं जहां ग्रामीणों और कार्यकर्ताओं ने मिलकर स्थानीय स्कूल को बेहतर बनाया... पूरे समाज को शिक्षा के वित्तीय बोझ पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि यह शिक्षा सिर्फ सरकार द्वारा दी गई कोई चीज नहीं है; यह हमारे बच्चों की शिक्षा है।"
शिक्षक प्रशिक्षण से हो सुधार की शुरुआत
भागवत ने बेहतर शिक्षक प्रशिक्षण का भी आह्वान किया और कहा कि सुधारों की शुरुआत शिक्षकों से होनी चाहिए। उन्होंने कहा, "हमें शिक्षकों से शुरुआत करनी होगी; शिक्षकों को प्रशिक्षित करना होगा। उसके बाद, पाठ्यक्रम जैसे मामले सामने आते हैं... हम अगली पीढ़ी का निर्माण करने के लिए शिक्षा प्रदान कर रहे हैं, न कि स्कूल चलाने या पैसा कमाने के लिए।"
उन्होंने कहा कि अगर समाज शिक्षा में सक्रिय रूप से भाग लेता है, तो सुधार बहुत तेजी से आएंगे। उन्होंने छात्रों और शैक्षणिक संस्थानों से स्थानीय समुदायों को शामिल करके स्कूलों में सुधार के उद्देश्य से परियोजनाएं शुरू करने का आग्रह करते हुए कहा, "अगर हम ये दो बदलाव करते हैं, तो चीजें बहुत जल्दी सुधर जाएंगी।"
रोजगार का मतलब सिर्फ नौकरी नहीं
रोजगार पर भागवत ने कहा कि देश को इस मानसिकता से आगे बढ़ना चाहिए कि रोजगार का मतलब केवल वेतनभोगी नौकरी है। उन्होंने कहा, "रोजगार केवल नौकरी नहीं है। यह उद्यमिता भी है। यह कुशल कार्य भी है।" उन्होंने आगे कहा कि समाज को शारीरिक श्रम को अधिक सम्मान देना चाहिए। भागवत ने कहा, "हमें 'श्रम प्रतिष्ठा' की आवश्यकता है, जिसका अर्थ है श्रम की गरिमा।"
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