Iran US Conflict: US-Iran पर अभी हमला नहीं! रुबियो के नए प्लान से बढ़ा सस्पेंस-क्या ईरान पर मंडराता युद्ध टल गया या यह किसी बड़े बारूदी बवंडर से पहले की खामोशी है? प्रतिबंध, नौसैनिक दबाव और होर्मुज में हलचल के पीछे अमेरिका की बड़ी रणनीति क्या है? क्या ईरान फिर निशाने पर आएगा?

US Iran Tensions: वाशिंगटन और तेहरान के बीच महीनों से जारी भीषण तनाव के बाद अब युद्ध के मैदान से एक अप्रत्याशित मोड़ सामने आ रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अपने सहयोगी देशों के समकक्षों को यह संकेत देकर चौंका दिया है कि वाशिंगटन फिलहाल ईरान पर सीधे सैन्य हमले करने की योजना नहीं बना रहा है। हालांकि, इसे शांति का स्थायी दौर मानने की भूल कोई नहीं कर रहा। अमेरिका ने अपनी रणनीति बदलते हुए अब तेहरान को आर्थिक और समुद्री घेराबंदी के जरिए घुटनों पर लाने का चक्रव्यूह रचा है।

हमले की जगह अब आर्थिक घेराबंदी क्यों?

Axios की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि रुबियो ने सहयोगी देशों के विदेश मंत्रियों को संकेत दिया है कि अमेरिका फिलहाल नई सैन्य कार्रवाई से बचेगा। वॉशिंगटन का फोकस अब ईरान की आर्थिक और वित्तीय क्षमता को कमजोर करने पर है। अमेरिका ने ईरान के खिलाफ नए प्रतिबंधों की घोषणा की है और उन देशों को भी चेतावनी दी है जो तेहरान के साथ कारोबार कर रहे हैं। अमेरिकी प्रशासन का मकसद ईरान की बची हुई वित्तीय लाइफलाइन को काटना और उस पर इतना आर्थिक दबाव बनाना है कि वह बातचीत की मेज पर लौटने को मजबूर हो।

लेकिन सैन्य विकल्प अभी बंद नहीं हुआ!

यहीं इस पूरी रणनीति में सबसे बड़ा सस्पेंस है। अमेरिका ने सैन्य विकल्प खत्म नहीं किया है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, अगर ईरान पहले हमला करता है तो वॉशिंगटन जवाबी सैन्य कार्रवाई कर सकता है। यानी फिलहाल रणनीति 'पहले दबाव, फिर प्रतिक्रिया' वाली दिखाई दे रही है। अमेरिका बड़े हमले से बचते हुए ईरान की सैन्य और आर्थिक क्षमता पर दबाव बनाए रखना चाहता है।

होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा दबाव बिंदु

अमेरिका की रणनीति में होर्मुज स्ट्रेट की भूमिका बेहद अहम हो गई है। यह जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण है और संघर्ष के दौरान यहां शिपिंग बुरी तरह प्रभावित हुई है। अमेरिकी सेना पानी के रास्ते से माइंस हटाने में जुटी है। अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि ज्यादा टैंकर अब स्ट्रेट के दक्षिणी रास्ते का इस्तेमाल कर रहे हैं। वॉशिंगटन का आकलन है कि ईरान की होर्मुज के जरिए वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बनाने की क्षमता पहले की तुलना में काफी कमजोर हुई है। अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी ने ईरान के तेल निर्यात पर भी असर डाला है। अधिकारियों के अनुसार, ईरान के प्रमुख तेल निर्यात टर्मिनल खार्ग आइलैंड पर हाल के हफ्तों में बहुत कम टैंकर देखे गए हैं।

ईरान-ओमान की नई पहल से क्या बदलेगा?

इसी बीच ईरान और ओमान ने होर्मुज स्ट्रेट में शिपिंग को नियंत्रित करने को लेकर बातचीत फिर शुरू की है। दोनों देशों ने एक अस्थायी नेविगेशनल कॉरिडोर बनाने और जलमार्ग से माइंस हटाने पर काम करने की चर्चा की है। लेकिन स्थिति अभी भी बेहद नाजुक है। ब्रिटेन के मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस के मुताबिक, मंगलवार को एक तेल टैंकर पर अज्ञात प्रोजेक्टाइल से हमला हुआ और वह ओमान के ऐश शीशा से करीब 9 नॉटिकल मील उत्तर-पूर्व में क्षतिग्रस्त हो गया। यानी स्ट्रेट में सामान्य व्यापार बहाल करने की कोशिशों के बावजूद खतरा पूरी तरह टला नहीं है।

पाकिस्तान की एंट्री से बढ़ी उम्मीद या नया पेंच?

अमेरिका और ईरान के बीच सीधी बातचीत भले ही अटकी हो, लेकिन पर्दे के पीछे कूटनीतिक कोशिशें जारी हैं। पाकिस्तान के आर्मी चीफ फील्ड मार्शल असीम मुनीर रविवार को ईरानी नेताओं से बातचीत के लिए तेहरान पहुंचे। रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान जाने से पहले मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बातचीत की थी और ईरानी पक्ष के सामने एक संभावित प्रस्ताव रखा। हालांकि व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया कि तेहरान के साथ फिलहाल कोई बातचीत चल नहीं रही है और न ही कोई बातचीत निर्धारित है। इससे संकेत मिलता है कि पाकिस्तान दोनों पक्षों के बीच संभावित संवाद का रास्ता तलाश रहा है, लेकिन अभी इसे औपचारिक वार्ता कहना जल्दबाजी होगी।

नवंबर तक चलेगा 'दबाव वाला खेल'?

Axios के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि मौजूदा रणनीति कम से कम नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनावों तक जारी रह सकती है। इसके बाद परिस्थितियों के आधार पर नए सैन्य अभियान पर विचार किया जा सकता है। इस बीच अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपने कुछ राजनयिक मिशनों में कर्मचारियों की वापसी भी शुरू की है। संघर्ष के दौरान जिन कर्मचारियों को हटाया गया था या जिनकी संख्या घटाई गई थी, उन्हें धीरे-धीरे वापस भेजा जा रहा है। इससे संकेत मिलता है कि वॉशिंगटन को तत्काल बड़े पैमाने पर तनाव बढ़ने का खतरा फिलहाल कम नजर आ रहा है।

युद्ध का दबाव अब अमेरिका पर भी

अमेरिका की रणनीति में बदलाव के पीछे घरेलू राजनीति भी एक अहम कारण हो सकती है। रॉयटर्स/इप्सोस सर्वे के मुताबिक, नवंबर के कांग्रेस चुनावों से पहले युद्ध को लेकर अमेरिकी जनता का समर्थन और ट्रंप के प्रति समर्थन में गिरावट देखी गई है। ऐसे में वॉशिंगटन के सामने दोहरी चुनौती है-ईरान पर दबाव बनाए रखना और साथ ही ऐसा कदम न उठाना जिससे नया बड़ा युद्ध शुरू हो जाए।

फिलहाल तस्वीर साफ है: अमेरिका ने ईरान पर हमले का विकल्प छोड़ा नहीं है, लेकिन तत्काल हमला करने के बजाय आर्थिक प्रतिबंध, समुद्री दबाव और होर्मुज स्ट्रेट को रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह दबाव ईरान को बातचीत की मेज तक लाएगा या फिर किसी नए हमले की चिंगारी बन जाएगा।