नेपाल के रसुवा में ग्लेशियर टूटने से विनाशकारी बाढ़ आई। तेज सैलाब ने भारी तबाही मचाई। यह घटना जलवायु परिवर्तन से पिघलते हिमालयी ग्लेशियरों के बढ़ते खतरे को दर्शाती है, जिसका असर भारत तक पहुंचता है।
नेपाल में आई बाढ़ में कितने लोग मरे या लापता हुए, इसका ठीक-ठीक आंकड़ा अभी भी साफ नहीं है। मंज़र दिल दहला देने वाला है। पानी का तेज़ बहाव रसुवा नाम के एक छोटे से जिले का बड़ा हिस्सा अपने साथ बहा ले गया। रसुवा, बागमती प्रांत का हिस्सा है और यहां की कुल आबादी करीब 45,000 ही है। यह जिला नेपाल के उत्तर में तिब्बत की सीमा पर बसा है। तिब्बत जाने वाले यात्री और व्यापारी इसी रास्ते का इस्तेमाल करते हैं। इस हादसे में तिब्बत जा रहे कई यात्री भी बह गए, जिनमें से कुछ ही बच पाए।
जब टूटकर गिरा ग्लेशियर
शुरुआत में जो वीडियो सामने आए, उनमें मटमैले रंग का सैलाब सब कुछ निगलता हुआ दिख रहा था। कई मंजिला इमारतें ताश के पत्तों की तरह ढह रही थीं। इसे देखकर पहले अनुमान लगाया गया कि शायद भूकंप आया है, क्योंकि ज़मीन में बहुत तेज़ कंपन हुआ था। फिर कहा गया कि ग्लेशियर की कोई झील फट गई है। लेकिन बाद में पुष्टि हुई कि असल वजह कुछ और ही थी। ग्लेशियर का एक बहुत बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिर गया था।
करीब 2,000 फीट चौड़ा बर्फ का यह टुकड़ा 7,000 फीट नीचे घाटी में आ गिरा। इससे 5.2 तीव्रता के भूकंप जैसा झटका महसूस हुआ। इस टक्कर से नदी का पानी, मिट्टी, पत्थर और टूटे हुए बर्फ के टुकड़े मिलकर सैलाब की शक्ल में नीचे की ओर भागे। यह सैलाब पहले लंडे खोला नदी में पहुंचा, जो भोटे कोसी नदी की सहायक नदी है। यह नदी चीन से नेपाल में गहरी घाटियों से होकर बहती है। इन्हीं घाटियों से होते हुए पानी, बर्फ और मलबे का यह सैलाब चीन-नेपाल सीमा को तोड़ते हुए आगे बढ़ा। रास्ते में जो कुछ आया, उसे अपने साथ लेता गया, जिससे इसका आकार और भी बड़ा हो गया। इसने 22 किलोमीटर का सफर सिर्फ 7 मिनट में तय किया, यानी इसकी रफ़्तार 193 किलोमीटर प्रति घंटा थी। देखते ही देखते भोटे कोसी, त्रिशूली और नारायणी नदियों में बाढ़ आ गई।

सीमा पर मची तबाही
बर्फ के इस विशाल टुकड़े के गिरने और बाढ़ आने की असली वजहों पर अभी भी स्टडी चल रही है। लेकिन इतना बड़ा सैलाब कैसे बना, यह हैरान करने वाला है। नेपाल की रसुवा नगरपालिका लगभग पूरी तरह तबाह हो गई। यहां कई पनबिजली परियोजनाएं थीं, जो सब बर्बाद हो गईं। यहीं पर एक बॉर्डर चेक पॉइंट भी था, जिसकी इमिग्रेशन बिल्डिंग पूरी तरह बह गई। उस वक्त बड़ी संख्या में लोग सीमा पार करने के लिए वहां इंतज़ार कर रहे थे। सैलाब उन्हें और उनके घरों को अपने साथ बहा ले गया।
पिघलते ग्लेशियर, बढ़ता खतरा
बर्फ, पत्थर और पानी के इस सैलाब ने कुछ भी नहीं छोड़ा। जहां बाकी जगहों पर बाढ़ का कारण बारिश होती है, वहीं हिमालय की गोद में बसे नेपाल और तिब्बत में वजहें ज़्यादा जटिल हैं। मुख्य कारण तो जलवायु परिवर्तन ही है। ग्लेशियर का टूटना, भूस्खलन और बर्फ पिघलना आने वाले बड़े खतरों का संकेत है। जैसे ध्रुवीय इलाकों में बर्फ पिघल रही है, वैसा ही हिमालय में भी हो रहा है। चेतावनी है कि साल 2000 के बाद से हजारों ग्लेशियर पिघलना शुरू हो चुके हैं। इसका मतलब है कि भविष्य में ऐसी घटनाएं और बढ़ सकती हैं।
हिंदू कुश - हिमालय क्षेत्र
हिंदू कुश और हिमालय, इन दो पर्वत श्रृंखलाओं को मिलाकर हिंदू कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र बनता है। यह अफगानिस्तान से लेकर म्यांमार तक आठ देशों में फैला है। हिंदू कुश की शुरुआत अफगानिस्तान से होती है और यह पामीर और काराकोरम पर्वतमाला से जुड़ता है। वहीं, हिमालय की शुरुआत पाकिस्तान के गिलगित-बाल्टिस्तान में नंगा पर्वत से होती है और यह चीन के कब्जे वाले तिब्बत तक फैला है। इस पूरे इलाके को हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र कहा जाता है, जिसका बड़ा हिस्सा भारत, नेपाल और भूटान में है।

नेपाल से भारत तक असर...
हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र को 'तीसरा ध्रुव' भी कहा जाता है क्योंकि यहां भारी मात्रा में बर्फ जमी है। इसे 'वॉटर टावर' भी कहते हैं क्योंकि यहां से दस बड़ी नदियां निकलती हैं। इनमें से तीन मुख्य नदी सिस्टम नेपाल में हैं - कोसी, गंडकी और करनाली। ये नदियां तिब्बत के पहाड़ों से निकलकर, हिमालय से होते हुए भारत में दाखिल होती हैं। इनमें से कुछ गंगा की सहायक नदियां बन जाती हैं।
महाकाली, करनाली और राप्ती नदियां यूपी में बहती हैं। गंडक, जिसे नेपाल में नारायणी कहते हैं, बिहार और यूपी में पहुंचती है। बागमती और कोसी नदियां बिहार में आती हैं। कोसी को 'बिहार का शोक' यूं ही नहीं कहा जाता। नेपाल में आई इस बाढ़ में बहे लोगों के शव इन्हीं नदियों के रास्ते बिहार और यूपी तक पहुंच गए।
पिघलती जलवायु, उठता हिमालय
हिमालय हमेशा से भूकंप के लिहाज़ से एक संवेदनशील क्षेत्र रहा है। यह भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों के टकराने से बना है और यह प्रक्रिया आज भी जारी है। इसी वजह से हिमालय की ऊंचाई लगातार बढ़ रही है और भूस्खलन होते रहते हैं। अब इसके साथ जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियर पिघलने का खतरा भी जुड़ गया है। हालत यह है कि इतनी नदियों के बावजूद नेपाल के कई हिस्सों में पानी की किल्लत होने लगी है। एक्सपर्ट्स की चेतावनी है कि ऐसी आपदाएं अब आम हो सकती हैं, और इसकी सबसे बड़ी वजह जलवायु परिवर्तन है।


