Maharashtra Politics: उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) में नई टूट की अटकलें क्यों लगाई जा रही हैं और हालिया घटनाक्रम क्या संकेत दे रहे हैं? बालासाहेब ठाकरे द्वारा स्थापित शिवसेना अपने गठन के बाद अब तक कितनी बार बड़े विभाजन का सामना कर चुकी है और उसके प्रमुख कारण क्या रहे हैं?
Shiv Sena Split: महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर शिवसेना चर्चा के केंद्र में है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) के भीतर बढ़ती हलचल ने पार्टी के भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। हाल के घटनाक्रमों ने संकेत दिए हैं कि पार्टी के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है और आने वाले दिनों में राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।

मातोश्री में हुई बैठक में पार्टी के 9 लोकसभा सांसदों में से केवल 4 सांसदों का पहुंचना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। वहीं, 18 जून को नई दिल्ली में बुलाई गई बैठक पर भी सभी की नजरें टिकी हैं। इस बीच शिवसेना (UBT) के वरिष्ठ नेता संजय राऊत ने दावा किया है कि महाराष्ट्र के सांसदों को 15-15 करोड़ रुपये के प्रस्ताव दिए जा रहे हैं, हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
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बालासाहेब की शिवसेना में कब-कब आई बड़ी टूट?
19 जून 1966 को बालासाहेब ठाकरे द्वारा स्थापित शिवसेना लंबे समय तक महाराष्ट्र की सबसे प्रभावशाली क्षेत्रीय पार्टियों में रही। लेकिन समय के साथ पार्टी कई बड़े विभाजनों से गुजरी।
पहली बड़ी दरार 1990 के दशक में तब सामने आई जब छगन भुजबल ने पार्टी छोड़ दी। इसके बाद 2005 में नारायण राणे का अलग होना शिवसेना के लिए बड़ा झटका माना गया। वर्ष 2006 में राज ठाकरे ने पार्टी से अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) का गठन किया, जिसने शिवसेना के पारंपरिक वोट बैंक को चुनौती दी।
2022 की बगावत ने बदल दी पार्टी की तस्वीर
शिवसेना के इतिहास की सबसे बड़ी टूट 2022 में देखने को मिली, जब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में विधायकों का बड़ा समूह अलग हो गया। इसके बाद पार्टी दो धड़ों में बंट गई और संगठन से लेकर चुनाव चिन्ह तक की लड़ाई अदालत और चुनाव आयोग तक पहुंची।
अब एक बार फिर सांसदों और विधायकों के संभावित असंतोष की चर्चाओं ने उद्धव ठाकरे खेमे की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। हालांकि स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में अगले कुछ दिन बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। 60 साल पूरे करने जा रही शिवसेना के सामने यह शायद एक और बड़ी राजनीतिक परीक्षा साबित हो सकती है।
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