अमेरिका में पढ़ाई का सपना अब पहले जैसा नहीं रहेगा। ट्रंप के नए स्टूडेंट वीज़ा नियमों ने भारतीय छात्रों के लिए 4 साल की सीमा, कोर्स बदलने और यूनिवर्सिटी ट्रांसफर पर सख्ती बढ़ा दी है। आखिर इसका सबसे बड़ा असर किस पर पड़ेगा?
Trump New US Student Visa Rules: संयुक्त राज्य अमेरिका (US) जाकर पढ़ाई करने और वहां अपना करियर बनाने का सपना देखने वाले लाखों भारतीय छात्रों के लिए एक बेहद चौंकाने वाली और परेशान कर देने वाली खबर आई है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी स्टूडेंट वीज़ा सिस्टम में दशकों का सबसे बड़ा और कड़ा बदलाव लागू करने का ऐलान कर दिया है। इस नए फरमान ने उस 'आजादी' को पूरी तरह खत्म कर दिया है, जिसका फायदा उठाकर विदेशी छात्र सालों तक अमेरिका में रहकर अपनी पढ़ाई और रिसर्च पूरी करते थे। आइए जानते हैं ट्रंप प्रशासन के इस नए वीज़ा चक्रव्यूह की वो बातें, जो हर भारतीय छात्र और उनके अभिभावकों की रातों की नींद उड़ाने वाली हैं।
अब तक क्या था नियम और आखिर क्या है चार साल की वो लक्ष्मण रेखा?
अब तक अमेरिका में पढ़ने जाने वाले अधिकांश छात्र "ड्यूरेशन ऑफ़ स्टेटस" (D/S) मॉडल के तहत वहां कदम रखते थे। इसका मतलब था कि जब तक छात्र किसी मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहा है और नियमों का पालन कर रहा है, तब तक उसे देश छोड़ने की कोई जरूरत नहीं थी। उसका वीज़ा स्वतः ही वैध रहता था। लेकिन अब ट्रंप प्रशासन ने इस लचीले नियम को जड़ से खत्म कर दिया है। नए नियमों के तहत:
- F-1 वीज़ा (छात्र) और J-1 वीज़ा (एक्सचेंज विजिटर्स) धारकों को अब एक बार में अधिकतम केवल चार साल तक ही अमेरिका में रहने की अनुमति मिलेगी।
- यदि किसी छात्र का कोर्स चार साल से अधिक चलता है, तो उसे बीच में ही पढ़ाई छोड़कर वापस अपने देश आना होगा या फिर कड़े प्रशासनिक दौर से गुजरते हुए एक्सटेंशन के लिए दोबारा आवेदन करना होगा।
मर्जी से कोर्स या कॉलेज बदलना अब अपराध! ट्रंप प्रशासन की 'कड़ी निगरानी' का सच
इस नए नियम का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि अब छात्र अपनी मर्जी के मालिक नहीं रह गए हैं। पहले छात्र अमेरिका जाकर अपनी सुविधा या रुचि के हिसाब से अपना मेजर (मुख्य विषय) बदल लेते थे, डिग्री प्रोग्राम बदल देते थे या फिर बेहतर अवसर दिखने पर किसी दूसरी यूनिवर्सिटी या एजुकेशनल इंस्टिट्यूशन में ट्रांसफर ले लेते थे।
अब नए नियम के तहत, अमेरिकी इमिग्रेशन अथॉरिटीज (DHS) की पूर्व अनुमति के बिना कोई भी छात्र:
- अपना मेजर विषय नहीं बदल पाएगा।
- अपना डिग्री प्रोग्राम नहीं बदल सकेगा।
- किसी दूसरे कॉलेज या यूनिवर्सिटी में ट्रांसफर नहीं ले पाएगा।
प्रशासन का तर्क है कि छात्र वीज़ा के इस 'लूपहोल' का फायदा उठाकर कई लोग बिना वजह लंबे समय तक अमेरिका में टिके रहते थे, जिसे अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
60 दिन का ग्रेस पीरियड घटकर हुआ आधा: पढ़ाई खत्म होते ही खाली करना होगा कमरा!
झटके यहीं खत्म नहीं होते। अभी तक पढ़ाई पूरी करने के बाद विदेशी छात्रों को अमेरिका में रुकने, नौकरी ढूंढने, ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (OPT) शुरू करने या अपना इमिग्रेशन स्टेटस बदलने के लिए 60 दिनों का ग्रेस पीरियड मिलता था। यह समय छात्रों को मानसिक और व्यावहारिक रूप से खुद को व्यवस्थित करने के लिए बेहद जरूरी होता था। लेकिन ट्रंप प्रशासन के नए फरमान ने इस समय को सीधे आधा कर दिया है। अब छात्रों को पढ़ाई खत्म होने के बाद सिर्फ 30 दिन का समय मिलेगा। इस तय समय के भीतर या तो उन्हें नौकरी का पुख्ता इंतजाम करना होगा, या फिर अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर वापस देश लौटना होगा।
भारतीय छात्रों पर क्यों पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?
भारत लंबे समय से अमेरिका में पढ़ने वाले सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय छात्र समूहों में शामिल रहा है। हर वर्ष हजारों भारतीय छात्र इंजीनियरिंग, मेडिकल, रिसर्च, पीएचडी और अन्य उच्च शिक्षा कार्यक्रमों के लिए अमेरिका जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि नए नियम से सबसे अधिक असर उन छात्रों पर पड़ेगा जिनके कोर्स चार साल से लंबे हैं। इस सख्त नीति का सबसे बड़ा शिकार भारतीय छात्र होने वाले हैं, जो अमेरिका में सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय छात्र समूहों में से एक हैं। विशेष रूप से:
- पीएचडी (PhD) और डॉक्टोरल कैंडिडेट्स: जिनकी रिसर्च और पढ़ाई को पूरा होने में आमतौर पर 5 से 7 साल का समय लग जाता है।
- मेडिकल और डुअल-डिग्री छात्र: जिनके प्रोग्राम्स की अवधि काफी लंबी होती है।
इन सभी छात्रों को अब हर मोड़ पर कागजी कार्रवाई, अतिरिक्त खर्च और वीज़ा रद्द होने के लगातार मंडराते खतरे का सामना करना होगा। इसके अलावा, बार-बार वीज़ा एक्सटेंशन के लिए आवेदन करने में लगने वाली भारी फीस से भारतीय परिवारों पर आर्थिक बोझ भी कई गुना बढ़ जाएगा।
आखिर ट्रंप प्रशासन क्यों कर रहा है इतने बड़े बदलाव?
डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में कई छात्र वर्षों तक अमेरिका में बने रहते थे, जिससे उनकी प्रभावी निगरानी करना कठिन हो जाता था। प्रशासन का तर्क है कि निश्चित समय सीमा लागू होने से इमिग्रेशन नियमों का पालन सुनिश्चित करना आसान होगा और स्टूडेंट वीज़ा के संभावित दुरुपयोग पर रोक लगेगी। यह कदम ट्रंप प्रशासन की व्यापक इमिग्रेशन नीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें वीज़ा स्क्रीनिंग को सख्त करना, सोशल मीडिया की अतिरिक्त जांच और विदेशी नागरिकों की निगरानी बढ़ाना शामिल है।
यूनिवर्सिटीज़ में हाहाकार: क्या टैलेंट की इस जंग में पिछड़ जाएगा अमेरिका?
अमेरिकी विश्वविद्यालयों के संगठनों और शिक्षाविदों ने ट्रंप सरकार के इस फैसले की तीखी आलोचना की है। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय छात्रों पर पहले से ही 'SEVIS' सिस्टम के जरिए चौबीसों घंटे निगरानी रखी जाती है। ऐसे में यह नया नियम केवल प्रशासनिक अड़चनें पैदा करेगा। चिंता इस बात की भी है कि इन सख्त नियमों के डर से दुनिया भर का बेहतरीन दिमाग (Global Talent) अब अमेरिका जाने के बजाय कनाडा, ब्रिटेन या यूरोपीय देशों का रुख कर सकता है। हालांकि, सरकार के समर्थकों का मानना है कि देश की सुरक्षा और अवैध रूप से टिके रहने वाले लोगों पर लगाम कसने के लिए यह कड़ा कदम उठाना बेहद जरूरी था। यह नियम इसके आधिकारिक प्रकाशन के 60 दिनों के भीतर लागू होने जा रहा है, जिसने अभी से हजारों छात्रों के भविष्य पर सस्पेंस की तलवार लटका दी है।


