Bach Baras Katha: इस बार बछ बारस का व्रत 8 सितंबर, मंगलवार को किया जाएगा। इस दिन महिलाएं अपने पुत्र की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं और गाय-बछड़े की पूजा करती हैं।

Bach Baras Vrat Katha In Hindi: भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को बछ बारस का व्रत किया जाता है। इसे गोवत्स द्वादशी भी कहते हैं। इस दिन महिलाएं अपने पुत्र की लंबी उम्र और अच्छी सेहत के लिए व्रत करती हैं और गाय-बछड़े की पूजा करती हैं। इस व्रत का पूरा फल तभी मिलता है, जब इसकी कथा सुनी जाए। आगे पढ़ें बछ बारस की कथा…

ये भी पढ़ें-
बछ बारस 2026, जानें पूजा विधि, मंत्र, मुहूर्त और महत्व

बछ बारस व्रत की कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक समय की बात है। एक शहर में एक साहूकार रहता था। उसके सात बेटे थे। एक बार साहूकार ने एक बहुत बड़ा तालाब बनवाया, लेकिन 12 साल बीत जाने के बाद भी वह तालाब पूरा नहीं भर पाया। साहूकार ने जब इस बारे में पंडितों से पूछा तो उन्होंने कहा कि तालाब तभी भरेगा, जब उसके बड़े बेटे या बड़े पोते की बलि दी जाएगी।

ये भी पढ़ें-
Bach Baras Kab Hai: क्यों करते हैं बछ बारस व्रत, इस दिन महिलाएं क्या खाएं-क्या नहीं? जानें जरूरी नियम

साहूकार ने उनकी बात मान ली और एक योजना बनाकर अपनी बड़ी बहू को उसके मायके भेज दिया। साहूकार की बड़ी बहू धार्मिक प्रवृत्ति की थी और वह बछ बारस का व्रत करती थी। इसके बाद साहूकार ने अपने बड़े पोते की बलि दे दी। जैसे ही बलि दी गई, जोरदार बारिश होने लगी और देखते ही देखते तालाब पानी से लबालब भर गया।
जब साहूकार को इस बात का पता चला तो वह तालाब की पूजा करने के लिए जाने लगा। उसने घर की दासी से कहा कि वह 'गेऊंला-धानुला' यानी चने और मोठ पका ले। संयोग से साहूकार के घर में एक गाय थी और उसके बछड़े का नाम भी गेऊंला-धानुला था। दासी ने नाम को लेकर हुई गलतफहमी में गाय के बछड़े को ही पका दिया और फिर अपने दूसरे कामों में लग गई।
उधर, साहूकार जब तालाब की पूजा करने पहुंचा तो उसे वहां गोबर में लिपटा हुआ वही पोता दिखाई दिया, जिसकी बलि दी गई थी। पोते को जीवित देखकर साहूकार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसे समझ आ गया कि उसकी बड़ी बहू द्वारा किए गए बछ बारस व्रत के प्रभाव से ही उसके पोते को जीवनदान मिला है।
साहूकार खुशी-खुशी घर वापस आया और दासी से गाय के बछड़े के बारे में पूछा। दासी ने डरते हुए उसे पूरी सच्चाई बता दी। यह सुनकर साहूकार बहुत दुखी हो गया। उसे चिंता होने लगी कि जब गाय वापस आएगी और अपने बछड़े को नहीं देखेगी तो कहीं वह पूरे परिवार को श्राप न दे दे।
इसी डर से साहूकार ने गाय के बछड़े को घर के पास एक गड्ढा खोदकर उसमें दबा दिया। शाम को जब गाय जंगल से वापस आई तो अपने बछड़े को वहां न पाकर जोर-जोर से रंभाने लगी। इसके बाद वह घर से बाहर गई और जमीन को अपने पैरों से खुरचने लगी। गाय ने कुछ देर तक जमीन खोदी तो वहां से उसका बछड़ा जीवित बाहर निकल आया।
यह देखकर साहूकार को यकीन हो गया कि बछ बारस के व्रत और गाय-बछड़े की पूजा के प्रभाव से ही उसका बछड़ा दोबारा जीवित हुआ है। इसके बाद साहूकार ने पूरे गांव में इस व्रत का महत्व बताया और सभी महिलाओं से बछ बारस का व्रत करने की बात कही। मान्यता है कि बछ बारस के दिन जो महिलाएं श्रद्धा से गाय और बछड़े की पूजा करती हैं और इस व्रत की कथा सुनती हैं, उनके पुत्र को लंबी उम्र और अच्छी सेहत का आशीर्वाद मिलता है।


Disclaimer
इस आर्टिकल में जो जानकारी है, वो धर्म ग्रंथों, विद्वानों और ज्योतिषियों से ली गईं हैं। हम सिर्फ इस जानकारी को आप तक पहुंचाने का एक माध्यम हैं। यूजर्स इन जानकारियों को सिर्फ सूचना ही मानें।