सार

Maha Kumbh 2025: प्रयागराज में इस समय लाखों साधु-संत महाकुंभ में आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। इनमें से अधिकांश साधु अपने नाम के साथ गिरी, पुरी और भारती जैसे सरनेम लगाते हैं। ये सरनेम बहुत खास होते हैं क्योंकि इसी से इनकी पहचान होती है।

 

Prayagraj Maha Kumbh 2025: प्रयागराज में महाकुंभ 2025 के दौरान लाखों साधु-संत वहां इकट्ठा हुए हैं। ये सभी साधु किसी न किसी अखाड़े से जुड़े होते हैं। इनमें से जब भी किसी साधु से आप उसका नाम पूछेंगे तो वह अपने नाम के साथ-साथ गिरी, पुरी, भारती जरूर बोलेंगे, ये सभी शब्द एक सरनेम जैसे हैं। दरअसल इन सरनेम केआधार पर ही इन साधु-संतों की पहचान होती है कि ये इनकी दीक्षा किस अखाड़े से हुई है। ये परंपरा आदि गुरु शंकराचार्य के समय से चली आ रही है। ये परंपरा सिर्फ शैव अखाड़ों में है।

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शैवों को क्यों कहते हैं दशनामी सन्यासी?

शैव अखाड़ों के आगे दशनामी शब्द लगाया जाता है। कई लोग इसका अर्थ शैवों के दस अखाड़ों से लगाते हैं। दस अखाड़े मतलब दशमानी। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। दशनामी का अर्थ दस नामों से है। शैव सन्यासियों के नाम में ये नाम शामिल होते हैं। शैव साधू अपने नाम के साथ इन नामों को लगाते हैं जिससे उनके पंथ, मठ और परंपरा की पहचान हो सके। जैसे हम अपने नाम से सरनेम का उपयोग करते हैं, वैसे ही सन्यासियों में इन दस नामों का उपयोग किया जाता है।

कौन-से हैं ये 10 नाम?

शैव अखाड़ों के ये दस नाम हैं सरस्वती, तीर्थ, अरण्य, भारती, आश्रम, गिरि, पर्वत, सागर, वन, और पुरी। जैसे आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंदगिरी महाराज, महामंडलेश्वर परमानंद सरस्वती आदि। इन्हीं नामों से दशनामी साधु-संतों की पहचान होती है और ये जाना जा सकता है कि कौन सा संत किस शंकराचार्य मठ से संबंध रखता है।

कैसे तय होते हैं साधुओं के सरनेम?

1. श्रंगेरि मठ जो रामेश्वरम में है, उस मठ के संन्यासी अपने नाम के साथ सरस्वती, तीर्थ, अरण्य और भारती लिखते हैं।
2. द्वारिका में स्थित शारदा पीठ के साधु-संत अपने नाम के साथ तीर्थ और आश्रम लिखते हैं। इसी से इनकी पहचान होती है।
3. बद्रीनाथ धाम में स्थित ज्योतिर्मठ से जुड़े साधु-संन्यासी अपने नाम के साथ गिरि, पर्वत और सागर लगाते हैं।
4. जगन्नाथ पुरी स्थित गोवर्धनपुरी मठ से जुड़े साधु-संन्यासी अपने नाम के साथ वन, पुरी और अरण्य लिखते हैं।


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