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छत्तीसगढ़: गांव की दीदियों ने कर दिखाया कमाल! बखरी से हर महीने 25 हजार की कमाई
Didi Ke Bakhri : छत्तीसगढ़ के कांकेर में ‘दीदी के बखरी’ योजना से महिलाएं सब्जी, मछली और मुर्गी पालन कर हर महीने 20-25 हजार तक कमा रही हैं। जानिए कैसे यह मॉडल ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर और सशक्त बना रहा है।

सब्जी, मछली और मुर्गी पालन से बढ़ रही महिलाओं की कमाई
ग्रामीण भारत की असली ताकत खेत-खलिहान और वहां मेहनत करने वाली महिलाएं हैं। आज वही महिलाएं छोटे-छोटे कामों से बड़ी सफलता की कहानी लिख रही हैं। रायपुर से आई यह रिपोर्ट बताती है कि कैसे सब्जी बाड़ी, पोषण वाटिका, मुर्गी पालन और मछली पालन जैसे काम गांवों में समृद्धि और आत्मनिर्भरता ला रहे हैं।
उत्तर बस्तर कांकेर जिले में ‘बिहान योजना’ के तहत “दीदी के बखरी” नाम से एक खास पहल चलाई जा रही है। इसका मकसद महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना और उनकी आय बढ़ाना है। यहां महिलाएं अपने घर के बाड़ी (बखरी) में सब्जियां उगाकर बाजार में बेच रही हैं। इसके साथ ही वे मछली पालन, मुर्गी पालन, बकरी पालन और वनोपज संग्रहण जैसे काम भी कर रही हैं।
3000 से ज्यादा महिलाएं जुड़ीं, आय बढ़ाने का लक्ष्य
जिले के चार विकासखंड, नरहरपुर, कांकेर, चारामा और भानुप्रतापपुर—में यह योजना तेजी से आगे बढ़ रही है।
- कुल 3364 महिलाएं इस योजना से जुड़ी हैं
- नरहरपुर: 1200 महिलाएं
- कांकेर: 790 महिलाएं
- चारामा: 734 महिलाएं
- भानुप्रतापपुर: 640 महिलाएं
सरकार का लक्ष्य है कि हर महिला की औसत मासिक आय 20 से 25 हजार रुपये तक पहुंचे। वित्त वर्ष 2026-27 में 10,780 नई महिलाओं को जोड़ने की तैयारी है।
आजीविका केंद्र से मिलेगा सीधा लाभ
योजना को मजबूत बनाने के लिए हर क्लस्टर स्तर पर आजीविका सेवा केंद्र खोले जा रहे हैं। इन केंद्रों के जरिए महिलाओं को बीज, खाद और खेती के जरूरी उपकरण दिए जाएंगे। खास बात यह है कि इन केंद्रों को भी महिलाएं ही चलाएंगी, जिससे रोजगार के नए मौके बनेंगे।
गांव की महिलाएं बन रहीं रोल मॉडल
नरहरपुर के गांवों में महिला किसान सुरेखा नेताम ने अपने बखरी में सब्जी और मुर्गी पालन का शानदार मॉडल तैयार किया है। उनका कहना है कि हरी सब्जियां और फल बच्चों और महिलाओं के लिए बेहद जरूरी पोषण देते हैं।
वहीं, ग्राम ठेमा की नामिका यादव वनोपज जैसे महुआ, इमली, शहद और जड़ी-बूटियों का संग्रह कर अपनी आय बढ़ा रही हैं।
भानुप्रतापपुर के गांव हाटकर्रा में मोतिन दर्रो ने मुर्गी और मछली पालन को साथ में जोड़कर कमाल कर दिया है। इस मॉडल में मुर्गियों की बीट मछलियों के चारे का काम करती है, जिससे खर्च कम होता है और मुनाफा बढ़ता है। इसके अलावा बकरी पालन और सूरजमुखी की खेती जैसे काम भी महिलाएं कर रही हैं, जिससे उनकी कमाई के कई स्रोत बन गए हैं।
पोषण और आय दोनों में सुधार
इस पहल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि महिलाओं को सिर्फ कमाई ही नहीं, बल्कि बेहतर पोषण भी मिल रहा है।
- घर में ताजी सब्जियां उपलब्ध
- बच्चों और महिलाओं में पोषण सुधार
- एनीमिया जैसी समस्याओं में कमी
“दीदी के बखरी” जैसी पहल यह दिखाती है कि अगर सही मार्गदर्शन और संसाधन मिलें, तो गांव की महिलाएं अपनी जिंदगी खुद बदल सकती हैं। आज ये महिलाएं सिर्फ अपने परिवार को ही नहीं, बल्कि पूरे गांव को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम कर रही हैं। आने वाले समय में यह मॉडल दूसरे राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है।
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