मध्य प्रदेश की मैहर बैंड, अगरिया लोह परंपरा और निमाड़ी जायका को राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में स्थान मिला, जिससे प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान और मजबूत हुई।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित और वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने की पहल को एक और बड़ी सफलता मिली है। मध्य प्रदेश की तीन विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहरों—मैहर बैंड, अगरिया लोह परंपरा और निमाड़ी जायका—को भारत सरकार की संगीत नाटक अकादमी द्वारा राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage-ICH) सूची में शामिल किया गया है।

यह उपलब्धि न केवल प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करती है, बल्कि भविष्य में इन धरोहरों को यूनेस्को की स्थायी सूची तक पहुंचाने की दिशा में भी अहम कदम मानी जा रही है।
राष्ट्रीय ICH सूची में शामिल हुईं मध्य प्रदेश की तीन अनमोल धरोहरें
अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (ICH) उन जीवंत परंपराओं, लोक कलाओं, लोकगीतों, शिल्प, खान-पान, अनुष्ठानों और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को कहा जाता है जो किसी समाज की पहचान होती हैं और पीढ़ियों से हस्तांतरित होती रहती हैं। मध्य प्रदेश की तीन परंपराओं का इस सूची में शामिल होना राज्य की सांस्कृतिक समृद्धि का राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान है।
सांस्कृतिक विविधता को मिला राष्ट्रीय सम्मान
पर्यटन विभाग के सचिव एवं मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड के प्रबंध संचालक डॉ. इलैयाराजा टी. ने कहा कि मैहर बैंड, अगरिया लोह परंपरा और निमाड़ी व्यंजन प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता का शानदार उदाहरण हैं। उनका कहना है कि राष्ट्रीय सूची में स्थान मिलना पूरे प्रदेश के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने उम्मीद जताई कि वर्ष 2028 तक इन धरोहरों को यूनेस्को की स्थायी सूची में शामिल कराने की मजबूत संभावना बनेगी।
वैश्विक सांस्कृतिक पहचान को मिलेगी नई मजबूती
मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड के अपर प्रबंध संचालक अभय अरविंद बेडेकर ने कहा कि इन तीनों परंपराओं ने वर्षों से प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक ज्ञान और लोक जीवन को जीवित रखा है। राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल होने से इन्हें नई पहचान मिलेगी और मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक मजबूत होगी।
अगरिया लोह परंपरा: सदियों पुरानी स्वदेशी धातुकर्म तकनीक
अगरिया जनजाति आज भी अपनी पारंपरिक लौह निर्माण तकनीक को जीवित रखे हुए है। आधुनिक मशीनों के बिना यह समुदाय पारंपरिक भट्टियों, लकड़ी के कोयले और स्थानीय लौह अयस्क की मदद से लोहा तैयार करता है। इस प्रक्रिया में केवल धातु निर्माण ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग और पारंपरिक वैज्ञानिक ज्ञान का भी समावेश है। इस तकनीक का ज्ञान किसी पुस्तक में नहीं बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा और परिवारों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया जाता है।
समुदाय के अनुभवी लोग युवाओं को लौह अयस्क की पहचान, भट्ठी तैयार करने, तापमान नियंत्रित करने और धातु शोधन की पारंपरिक विधियां सिखाते हैं। यही कारण है कि यह परंपरा भारत की प्राचीन धातुकर्म विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
मैहर बैंड का 108 वर्षों का गौरवशाली सफर
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की लोक कला और संगीत संरक्षण की नीति के तहत संस्कृति विभाग के प्रयासों से मैहर बैंड को यह महत्वपूर्ण सम्मान मिला है। मैहर बैंड की स्थापना वर्ष 1918 में महान संगीतज्ञ उस्ताद अलाउद्दीन खाँ ने मैहर रियासत के तत्कालीन महाराजा बृजनाथ सिंह जूदेव की प्रेरणा से की थी। इसे भारतीय शास्त्रीय संगीत का दुनिया का पहला शास्त्रीय ऑर्केस्ट्रा माना जाता है।
पिछले 108 वर्षों में इस बैंड ने अपनी मौलिकता और शास्त्रीय परंपरा को पूरी निष्ठा के साथ सुरक्षित रखा है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता दुर्लभ वाद्ययंत्रों और उस्ताद अलाउद्दीन खाँ द्वारा तैयार की गई विशिष्ट शास्त्रीय बंदिशों में दिखाई देती है।
इस वाद्यवृंद में सितार, सरोद, इसराज, वायलिन, चेलो, सितार-बैंजो, हारमोनियम और तबला जैसे वाद्यों का अनूठा समन्वय देखने को मिलता है। इनमें सबसे खास वाद्य 'नलतरंग' है, जिसे उस्ताद अलाउद्दीन खाँ ने बंदूक की नालियों को स्वरबद्ध करके तैयार किया था। यह वाद्य आज दुनिया में केवल मैहर बैंड के पास ही मौजूद है।
वर्ष 1924 में लखनऊ के केसर बाग में आयोजित भातखंडे समारोह में मैहर बैंड की प्रस्तुति ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया था। इसके बाद इस वाद्यवृंद ने देश के लगभग सभी प्रमुख संगीत मंचों पर अपनी अलग पहचान बनाई। वर्ष 2016 में मध्य प्रदेश शासन ने इसके उत्कृष्ट योगदान के लिए इसे 'शिखर सम्मान' से सम्मानित किया था। वर्तमान में संस्कृति विभाग के संरक्षण में यह बैंड भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ा रहा है।
निमाड़ी जायका: स्वाद के साथ संस्कृति की पहचान
निमाड़ क्षेत्र की पहचान केवल लोक संस्कृति तक सीमित नहीं है बल्कि यहां का पारंपरिक भोजन भी इसकी सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बड़वानी, खरगोन और बुरहानपुर जिलों में पीढ़ियों से तैयार किए जा रहे दाल-पानी, धुली कढ़ी, पूरण की कचौरी, पारंपरिक कबाब, बिरयानी और कई अन्य स्थानीय व्यंजन अपने विशेष स्वाद और पारंपरिक विधियों के लिए प्रसिद्ध हैं। इन व्यंजनों में स्थानीय कृषि उत्पादों, मोटे अनाज और मौसमी सामग्री का उपयोग किया जाता है, जो निमाड़ क्षेत्र की जीवनशैली और प्रकृति से उसके गहरे संबंध को दर्शाता है।
पारिवारिक समारोहों, धार्मिक आयोजनों और सामाजिक अवसरों पर परोसे जाने वाले ये व्यंजन केवल भोजन नहीं बल्कि निमाड़ की आत्मीयता, मेहमाननवाजी और सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक हैं। राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल होने के बाद निमाड़ी व्यंजनों को भी देशभर में नई पहचान मिलने की उम्मीद है।


