MP News: क्या विकसित भारत का सपना जनजातीय समाज के बिना पूरा हो सकता है? बैतूल में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने क्यों कहा कि विकास के साथ संस्कृति बचाना जरूरी है? डिजिटल सशक्तिकरण कितना अहम है? प्रकृति संरक्षण में आदिवासी समाज क्यों मिसाल है? जानिए राष्ट्रपति के संबोधन की बड़ी बातें।
भोपाल/बैतूल। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने कहा है कि किसी भी समाज का सशक्तिकरण केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं होना चाहिए। वास्तविक विकास तब माना जाता है जब लोगों में आत्मविश्वास, आत्मसम्मान, जागरूकता और जिम्मेदारी की भावना विकसित हो। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज अपनी गरिमा और आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने वाला समाज है और यही उसकी सबसे बड़ी पहचान है।

राष्ट्रपति मुर्मु गुरुवार को मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में ब्रह्माकुमारी संस्थान द्वारा आयोजित "एम्पावरमेंट ऑफ ट्राइबल सोसाइटी बाय स्पिरिचुअल अवेकनिंग" कार्यक्रम को संबोधित कर रही थीं। वे वर्तमान में मध्यप्रदेश के पांच दिवसीय दौरे पर हैं। अपने प्रवास के पहले दिन उन्होंने बैतूल पहुंचकर इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में भाग लिया।
रुद्राक्ष का पौधा लगाकर दिया पर्यावरण संरक्षण का संदेश
कार्यक्रम स्थल पहुंचने से पहले राष्ट्रपति ने रुद्राक्ष का पौधा रोपित किया। इसे धार्मिक महत्व के साथ-साथ औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है। पौधारोपण के माध्यम से उन्होंने पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। इसके बाद मंच पर पहुंचने पर गोंडी जनजातीय कड़पड़ा दल के कलाकारों ने पारंपरिक लोकनृत्य प्रस्तुत कर उनका स्वागत किया। वहीं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इंदौर एयरपोर्ट पर राष्ट्रपति का स्वागत किया था। मुख्यमंत्री ने कहा कि राष्ट्रपति का यह दौरा प्रदेश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
विकसित भारत 2047 के लक्ष्य में जनजातीय समाज की भूमिका अहम
राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि भारत ने वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य तय किया है। यह लक्ष्य तभी हासिल किया जा सकता है जब देश का कोई भी वर्ग विकास की मुख्यधारा से पीछे न रह जाए। उन्होंने कहा कि हिमालय से कन्याकुमारी तक भारत की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी कहा कि समय-समय पर जनजातीय समाज को भ्रमित करने के प्रयास किए जाते हैं, ऐसे में इस प्रकार के सम्मेलन उनके सामाजिक, आध्यात्मिक और समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
शिक्षा, स्वास्थ्य और जनजातीय कल्याण योजनाओं की सराहना
राष्ट्रपति ने मध्यप्रदेश सरकार द्वारा संचालित शिक्षा, स्वास्थ्य और जनजातीय कल्याण योजनाओं की सराहना की। उन्होंने विशेष रूप से सिकल सेल एनीमिया का उल्लेख करते हुए कहा कि जनजातीय क्षेत्रों में इस बीमारी की संभावना अधिक रहती है। उन्होंने कहा कि इसके उन्मूलन के लिए प्रभावी प्रयास किए जा रहे हैं और उम्मीद जताई कि इन पहलों से जनजातीय समाज के स्वास्थ्य स्तर में उल्लेखनीय सुधार होगा।
बैतूल की संस्कृति और परंपराएं पूरे देश के लिए प्रेरणा
राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि बैतूल जिला अपनी समृद्ध जनजातीय संस्कृति, प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक चेतना के लिए देशभर में पहचान रखता है। यहां के जनजातीय समुदायों ने अपनी परंपराओं, लोकज्ञान और सांस्कृतिक मूल्यों को पीढ़ियों से सुरक्षित रखा है। उन्होंने कहा कि सहयोग, सामूहिकता, ईमानदारी, सरलता और आध्यात्मिकता जैसे जीवन मूल्यों का जीवंत स्वरूप यहां की संस्कृति में देखने को मिलता है। जनजातीय समाज के सशक्तिकरण पर केंद्रित यह महासम्मेलन केवल बैतूल या मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण है।
आधुनिक दौर में अध्यात्म का महत्व पहले से अधिक
राष्ट्रपति ने कहा कि ब्रह्माकुमारी संस्थान ने महिलाओं को केंद्र में रखकर अपने कार्यक्रमों का विस्तार किया है। संस्थान की सेवा भावना, आंतरिक शुचिता और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता समाज को प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि आज की तेज रफ्तार जिंदगी में आध्यात्मिक मूल्यों और आंतरिक पवित्रता का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। इन्हीं मूल्यों से समाज में समानता, संवेदनशीलता और पर्यावरण संरक्षण की भावना विकसित होती है।
जनजातीय समाज प्रकृति के साथ सामंजस्य का उदाहरण
राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि वर्तमान समय में दुनिया तनाव, संघर्ष और युद्ध जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे दौर में आध्यात्मिक चेतना और प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली की आवश्यकता और बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज सदियों से प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर जीवन जीता आया है। यह समाज प्रेम, शांति, आनंद और अहिंसा के मूल्यों को महत्व देता है। जनजातीय समुदाय धरती, जल, वायु, सूर्य, चंद्रमा और पंचतत्वों को पूजनीय मानता है तथा पूरी प्रकृति को ही अपनी आराधना का केंद्र समझता है।
पर्यावरण संरक्षण में जनजातीय जीवनशैली से सीखने की जरूरत
राष्ट्रपति ने कहा कि धरती, जल और वायु के बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं है। जनजातीय समाज प्राकृतिक संसाधनों का दोहन नहीं बल्कि संरक्षण करता है। उन्होंने कहा कि यह समाज संसाधनों का उपयोग करने से पहले प्रकृति के प्रति सम्मान प्रकट करता है। आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण को लेकर चिंतित है, तब जनजातीय समाज की जीवनशैली मानवता के लिए मार्गदर्शक बन सकती है।
उन्होंने रासायनिक उर्वरकों और विदेशी कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग पर चिंता जताते हुए कहा कि इससे भूमि की उर्वरता प्रभावित हो रही है और कई प्रकार की स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ रही हैं। प्राकृतिक खेती भारतीय परंपरा का हिस्सा रही है और आज देश फिर उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है।
जनजातीय युवाओं के लिए डिजिटल सशक्तिकरण जरूरी
राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि तेजी से बदलते समय में जनजातीय युवाओं को आधुनिक शिक्षा, कौशल विकास और डिजिटल सशक्तिकरण से जोड़ना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि विकास के साथ-साथ उनकी सांस्कृतिक पहचान, परंपराएं और आध्यात्मिक विरासत भी सुरक्षित रहनी चाहिए। विकास और संस्कृति के बीच संतुलन ही किसी समृद्ध और सशक्त समाज की असली नींव है।
उन्होंने कहा कि जब सेवा और अध्यात्म का संगम होता है तब समाज में स्थायी और सकारात्मक बदलाव संभव होते हैं। इसी भावना के साथ उन्होंने सभी नागरिकों से विकसित भारत 2047 के निर्माण में अधिक समर्पण के साथ योगदान देने का आह्वान किया।
राष्ट्रपति ने स्व-सहायता समूहों और स्थानीय उत्पादों की प्रदर्शनी देखी
कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने विभिन्न प्रदर्शनी स्टॉलों का भी अवलोकन किया। बैतूल जिले की स्व-सहायता समूह की महिलाएं सतपुडांचल प्रोड्यूसर कंपनी के माध्यम से रागी, कोदो, कुटकी, ज्वार और बाजरा जैसे मिलेट्स से कुकीज, पास्ता, नूडल्स, इंस्टेंट इडली-दोसा मिक्स, दलिया सहित कई पोषणयुक्त उत्पाद तैयार कर रही हैं।
इस कंपनी से 175 स्व-सहायता समूहों के 2075 सदस्य जुड़े हैं और उन्हें हर महीने 8 से 10 हजार रुपये तक की अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है। राष्ट्रपति ने भरेवा शिल्प कला, वन आधारित उत्पादों, नांदा फॉरेस्ट हनी, बैतूल सागौन, कुकरु कॉफी और श्री अन्न आधारित पोषण प्रदर्शनी का भी निरीक्षण किया। प्रदर्शनी में 18 प्रकार के पौष्टिक व्यंजनों को प्रदर्शित किया गया था।


