सनी देओल की फिल्म ‘बंटवारा 1947’ भले ही बॉक्स ऑफिस ही धीमी रफ़्तार से चल रही है, लेकिन दूसरे शनिवार को फिल्म ने ग्रोथ के मामले में लंबी छलांग लगाई। जानिए कमाई।

आमिर खान प्रोडक्शंस के बैनर तले बनी सनी देओल स्टारर ‘बंटवारा 1947’ बॉक्स ऑफिस पर दूसरे हफ्ते में पहुंच चुकी है। हालांकि, इसकी रफ़्तार बेहद धीमी पड़ चुकी है। फिर भी दूसरे शनिवार को फिल्म की कमाई में इतना बड़ा इजाफा हुआ कि इसने ग्रोथ के मामले में इमरान हाशमी स्टारर 'आवारापन 2' को भी पीछे छोड़ दिया। शनिवार को इस फिल्म का प्रदर्शन लगभग 3,247 शोज में किया गया। फिल्म ने 9 दिन बाद बॉक्स ऑफिस पर पहला माइलस्टोन पार किया।

‘बंटवारा 1947’ ने 9वें दिन कितनी कमाई की?

‘बंटवारा 1947’ ने 9वें दिन यानी दूसरे शनिवार को लगभग 1.15 करोड़ रुपए का कलेक्शन किया। अगर 8वें दिन की कमाई से तुलना करें तो इसमें लगभग 53.3 फीसदी का इजाफा हुआ है। ग्रोथ का यह आंकड़ा इमरान हाशमी स्टारर 'आवारापन 2' से बड़ा है। 9वें दिन 'आवारापन 2' ने 8वें दिन के मुकाबले 9 दिन 39.1 फीसदी के इजाफे के साथ 8 करोड़ रुपए कमाए। 9 दिन बाद 'बंटवारा 1947' का भारत में नेट कलेक्शन 35.50 करोड़ रुपए हो गया है। वहीं इसने ग्रॉस 42.12 करोड़ रुपए कमा लिए हैं।

'बंटवारा 1947' का डे वाइज कलेक्शन

दिन नेट कलेक्शन
पहला दिन5.75 करोड़ रुपए
दूसरा दिन13.50 करोड़ रुपए
तीसरा दिन7.25 करोड़ रुपए
चौथा दिन2 करोड़ रुपए
पांचवां दिन2.25 करोड़ रुपए
छठा दिन1.50 करोड़ रुपए
सातवां दिन1.35 करोड़ रुपए
आठवां दिन75 लाख रुपए
नौवां दिन1.15 करोड़ रुपए
कुल नेट कलेक्शन35.50 करोड़ रुपए

'बंटवारा 1947' का वर्ल्डवाइड कलेक्शन कितना हुआ

'बंटवारा 1947' ने 9वें दिन ओवरसीज मार्केट से लगभग 75 लाख रुपए का ग्रॉस कलेक्शन किया। विदेशों में फिल्म की ग्रॉस कमाई का आंकड़ा 9 करोड़ रुपए पहुंच चुका है। वर्ल्डवाइड बॉक्स ऑफिस पर फिल्म का ग्रॉस कलेक्शन 51.12 करोड़ रुपए हो गया है। यानी फिल्म ने वर्ल्डवाइड बॉक्स ऑफिस पर 50 करोड़ रुपए के माइलस्टोन को पार कर लिया है, जो कि किसी भी फिल्म के लिए पहला बड़ा माइलस्टोन होता है।

‘बंटवारा 1947’ की कहानी क्या है?

'बंटवारा 1947' का निर्देशन राजकुमार संतोषी ने किया है और इसे आमिर खान प्रोडक्शंस ने प्रोड्यूस किया है। कहानी 1947 के भारत विभाजन की पृष्ठभूमि में रखी गई है। फिल्म सिकंदर मिर्जा और उसके परिवार की कहानी दिखाती है, जो हिंसा और उथल-पुथल के बीच लाहौर पहुंचता है। परिवार को एक हिंदू परिवार द्वारा छोड़ी गई हवेली मिलती है, लेकिन नया घर पूरी तरह खाली नहीं होता। यहीं से विस्थापन, अपनापन और विभाजन की मानवीय कीमत से जुड़ी कहानी आगे बढ़ती है।