रॉ एक्शन, किलर डायलॉग्स और दमदार परफॉर्मेंस से ‘मिर्ज़ापुर द मूवी’ बड़े पर्दे पर अपना अलग असर छोड़ती है। हालांकि सेकंड हाफ में थोड़ी सुस्ती जरूर महसूस होती है।
‘मिर्जापुर’ की दुनिया को बड़े पर्दे पर देखने का इंतजार अब खत्म हो चुका है। गुरमीत सिंह के निर्देशन में बनी यह फिल्म सिर्फ वेब सीरीज का लंबा एपिसोड नहीं, बल्कि ज्यादा भव्य और सिनेमाई अनुभव है। कहानी में सत्ता की लड़ाई, बदला, धोखा और इमोशन साथ-साथ चलते हैं, जबकि दमदार संवाद कई सीन्स को यादगार बनाते हैं। कलाकारों की परफॉर्मेंस भी इस गैंगस्टर ड्रामा की बड़ी ताकत बताई गई है। हालांकि दूसरे हाफ की शुरुआत में रफ्तार थोड़ी गिरती है, लेकिन प्री-क्लाइमैक्स और क्लाइमैक्स फिल्म को फिर जोरदार तरीके से संभाल लेते हैं।
क्या है ‘मिर्जापुर द मूवी’ की कहानी?
फिल्म की कहानी की नींव सत्ता की जंग, बदले, विश्वासघात और रिश्तों के इमोशन पर रखी गई है। इसकी शुरुआत 2018 से होती है, जहां पंकज त्रिपाठी सत्ता के खेल में अपनी चालें चलते नजर आते हैं। जितेंद्र कुमार और अली फजल की जोड़ी भी दमदार है। पुराने किरदारों के बीच नए ट्विस्ट कहानी को दिलचस्प बनाए रखते हैं। रवि किशन बब्बन के किरदार में अपराध की दुनिया के बड़े खिलाड़ी बने हैं, जिनकी नजर मिर्जापुर की गद्दी पर है। सीरीज के मुकाबले फिल्म में गद्दी की लड़ाई का दायरा बढ़ गया है। वहीं पहले घंटे में मुन्ना भैया का किरदार अपेक्षाकृत कम भौकाली नजर आता है, जबकि बब्बन को कहानी में काफी प्रमुखता दी गई है।
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‘मिर्जापुर द मूवी’ की स्टार कास्ट की परफॉर्मेंस कैसी है?
फिल्म की सबसे बड़ी खूबियों में इसकी विशाल स्टारकास्ट शामिल है। पंकज त्रिपाठी को शानदार, रवि किशन को जबरदस्त, अली फजल को बेहतरीन और दिव्येंदु को उत्कृष्ट बताया गया है। जितेंद्र कुमार, अभिषेक बनर्जी, मोहित मलिक, राजेश तैलंग, प्रमोद पाठक और सुशांत सिंह भी अपने-अपने किरदारों में असर छोड़ते हैं। रसिका दुग्गल के किरदार में ट्विस्ट है और वह प्रभावी लगती हैं। सोनल चौहान, शीबा चड्ढा और श्रिया पिलगांवकर ने भी अच्छा काम किया है।
गुरमीत सिंह का डायरेक्शन कैसा है?
गुरमीत सिंह ने ड्रामा, एक्शन, ह्यूमर और इमोशन के बीच संतुलन बनाए रखा है। लेकिन कहानी के फ्लो को बनाए रखने में वे कहीं न कहीं मात खा गए। पहले हाफ की तुलना में फिल्म का दूसरा हिस्सा कुछ ज्यादा खिंचा हुआ महसूस होता है। कई ऐसे सीन भी नजर आते हैं, जिन्हें कहानी के लिए जरूरी नहीं कहा जा सकता और जो इसकी लंबाई बढ़ाते हैं। सेकंड हाफ में ‘धुरंधर’ जैसे गानों की झलक भी देखने को मिलती है। हालांकि, फिल्म के आखिरी हिस्से में कहानी को समेटने के बजाय इसे जरूरत से ज्यादा आगे बढ़ाया गया है। रवि किशन का किरदार को कुछ ज़्यादा ही खींचा गया है। इतना कि बाकी किरदारों की मौजूदगी कुछ कमजोर पड़ने लगती है। खासकर गुड्डू भैया और मुन्ना भैया का असर दूसरे हाफ में पहले जैसा दमदार नहीं रह जाता।
कैसा है फिल्म का म्यूजिक?
फिल्म में गानों के लिए ज्यादा जगह नहीं है। ‘सांसों की माला’ समेत कुछ गाने कहानी में इस तरह पिरोए गए हैं कि वे अलग से थोपे हुए महसूस नहीं होते। हालांकि असली ताकत बैकग्राउंड स्कोर है, जो अहम पलों की इंटेंसिटी कई गुना बढ़ाता है। एक्शन रॉ, ब्रूटल और पूरी तरह मास अपील वाला है। बड़े पर्दे का स्केल इसे अतिरिक्त इम्पैक्ट देता है और कई मौके सीटियां बजाने वाले हैं। खासकर प्री-क्लाइमैक्स से क्लाइमैक्स तक जैसलमेर के रेतीले मैदानों का इस्तेमाल विजुअली बेहद प्रभावशाली है। हां, दूसरे हाफ में कुछ हिस्से एडिट किए जा सकते थे।
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क्यों देखें/क्यों ना देखें ‘मिर्जापुर द मूवी’?
‘मिर्जापुर’ के फैंस के लिए फिल्म में रॉ एक्शन, तगड़े डायलॉग्स, हाई-वोल्टेज ड्रामा और पसंदीदा किरदारों का वही तेवर मौजूद है। यहां तक कि जिसने सीरीज नहीं देखी, उसके लिए भी इसे एंटरटेनिंग गैंगस्टर एक्शन फिल्म है। हालांकि, दूसरे हाफ की थोड़ी खिंची हुई रफ्तार आपको निराश कर सकती है। हमारी ओर से इस फिल्म को 5 में से 3 स्टार।
