हर पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण नहीं लगता, क्योंकि चांद की कक्षा करीब 5 डिग्री झुकी है। जानिए नोड्स और सही अलाइमेंट से कैसे लगता है ग्रहण।
Lunar Eclipse Explained: चंद्र ग्रहण को देखने के लिए लोग महीनों इंतजार करते हैं। लेकिन एक सवाल अक्सर मन में आता है- जब हर महीने पूर्णिमा आती है और उस दिन सूर्य, पृथ्वी और चांद लगभग एक-सी दिशा में होते हैं, तो फिर हर महीने चंद्र ग्रहण क्यों नहीं लगता? आखिर ऐसा क्या है जो हर पूर्णिमा की रात चांद को पृथ्वी की छाया में जाने से रोक देता है? इसका जवाब चांद की कक्षा में छिपा है। चांद पृथ्वी के चारों ओर बिल्कुल सीधी और एक ही समतल में नहीं घूमता। उसकी कक्षा पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर कक्षा की तुलना में करीब 5 डिग्री झुकी हुई है। यही छोटा सा झुकाव हर पूर्णिमा को चंद्र ग्रहण होने से बचा लेता है। केवल तब ग्रहण लगता है, जब पूर्णिमा के समय चांद अपनी कक्षा के उन खास प्वाइंट के पास होता है, जहां उसकी कक्षा पृथ्वी की कक्षीय समतल रेखा को काटती है। इन्हें कक्षीय नोड्स (Nodes) कहते हैं। आइए जानते हैं कैसे होता है यह पूरा खेल...
पहले समझिए चंद्र ग्रहण होता कैसे है?
चंद्र ग्रहण तब होता है जब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा लगभग एक सीध में आ जाते हैं और पृथ्वी बीच में होती है। इसके बाद पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है। अगर चांद पृथ्वी की बनाई गहरी छाया यानी Umbra के भीतर पूरी तरह या आंशिक रूप से चला जाता है, तो चंद्र ग्रहण दिखाई देता है। हर पूर्णिमा पर यह आसानी से होना चाहिए, लेकिन असली पेच तो यहां है।
चांद की कक्षा सीधी नहीं, थोड़ी झुकी हुई है
- पृथ्वी सूर्य के चारों ओर जिस कक्षा में घूमती है, उसे एक काल्पनिक समतल पर समझा जा सकता है। इसे Ecliptic Plane कहा जाता है।
- चांद भी पृथ्वी के चारों ओर घूमता है, लेकिन उसकी कक्षा इस समतल से लगभग 5 डिग्री झुकी हुई है। यही छोटा सा झुकाव बहुत बड़ा फर्क पैदा करता है।
- इसे ऐसे समझें जैसे 2 गोल ट्रैक एक-दूसरे के ऊपर थोड़े तिरछे रखे हों। दोनों ट्रैक साल में कुछ जगहों पर एक-दूसरे को काटेंगे, लेकिन हर जगह पर एक साथ नहीं होंगे।
- चांद की कक्षा भी पृथ्वी की कक्षा के समतल को केवल 2 खास जगहों पर काटती है। इन्हें Ascending Node और Descending Node कहा जाता है।
हर पूर्णिमा पर चांद कहां होता है?
हर लगभग 29.5 दिन में चंद्रमा की एक पूर्णिमा आती है। पूर्णिमा के समय पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच होती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि तीनों एकदम सीधी लाइन में होंगे। अधिकतर पूर्णिमा के समय चंद्रमा पृथ्वी की छाया के ऊपर या नीचे से निकल जाता है। इसलिए पृथ्वी की छाया सीधे चांद पर नहीं पड़ती और चंद्र ग्रहण नहीं होता। यही वजह है हर महीने पूर्णिमा होने के बावजूद चंद्र ग्रहण दिखाई नहीं देता।
आखिर चंद्र ग्रहण कब लगता है?
- चंद्र ग्रहण के लिए सिर्फ पूर्णिमा होना पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि पूर्णिमा के समय चंद्रमा नोड के बहुत करीब हो।
- जब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा लगभग एक ही सीधी रेखा में आ जाते हैं और चांद का स्थान भी उस नोड के पास होता है, तब पृथ्वी की छाया चंद्रमा तक पहुंचती है। तभी हमें आंशिक या पूर्ण चंद्र ग्रहण देखने को मिलता है।
- यानी चंद्र ग्रहण के लिए 2 चीजें एक साथ चाहिए। पूर्णिमा + सही Orbital Alignment इन दोनों का सही समय पर मिलना ही ग्रहण की असली वजह है।
क्या चंद्र ग्रहण बहुत दुर्लभ घटना है?
चंद्र ग्रहण कोई बेहद असामान्य घटना नहीं है। एक साल में आमतौर पर कई चंद्र ग्रहण हो सकते हैं, लेकिन हर ग्रहण हर जगह से दिखाई नहीं देता। इसके अलावा कुछ ग्रहण पेनुम्ब्रल होते हैं, जिनमें चांद पृथ्वी की हल्की छाया से गुजरता है और बदलाव बहुत कम नजर आता है। वहीं पूर्ण चंद्र ग्रहण में चंद्रमा का पूरा हिस्सा पृथ्वी की गहरी छाया में पहुंच सकता है। इसलिए किसी एक जगह के लोगों को चंद्र ग्रहण लंबे अंतराल के बाद दिखाई दे सकता है, जबकि दुनिया के दूसरे हिस्से में लोग उसी टाइम में कोई ग्रहण देख सकते हैं।
5 डिग्री का यह झुकाव इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
अगर चांद की कक्षा पृथ्वी की कक्षा के समतल से बिल्कुल नहीं झुकी होती, यानी दोनों एक ही समतल में होते, तो लगभग हर पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण और लगभग हर अमावस्या पर सूर्य ग्रहण होने की स्थिति बन सकती थी। लेकिन चांद की कक्षा करीब 5 डिग्री झुकी होने के कारण अधिकांश समय वह पृथ्वी की छाया से बचकर ऊपर या नीचे से गुजर जाता है। यानी जिस चीज की वजह से हमें हर महीने ग्रहण नहीं दिखता, वह वास्तव में चांद की कक्षा का बेहद छोटा सा झुकाव है।


