China Surveillance Report: एक रिपोर्ट में दावा है कि चीन के कथित सर्विलांस नेटवर्क ने विदेशी नागरिकों के ट्रैवल और कई पर्सनल एक्टिविटीज का डेटा रिकॉर्ड किया।

China Surveillance Network: क्या आपने कभी सोचा है कि किसी देश को आपकी हर छोटी-बड़ी गतिविधि की जानकारी हो सकती है? आप कहां घूमने गए, किस अस्पताल में इलाज कराया, कौन-सी ट्रेन पकड़ी, यहां तक कि गैस का बिल कब भरा.. अगर यह सब किसी सिस्टम में रिकॉर्ड हो रहा हो तो? हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट ने चीन के कथित सर्विलांस नेटवर्क को लेकर ऐसे ही कई सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन का निगरानी तंत्र सिर्फ अपने नागरिकों तक सीमित नहीं था, बल्कि वहां रहने वाले विदेशी नागरिकों की गतिविधियों का डेटा भी बड़े पैमाने पर इकट्ठा किया जा रहा था।

इस सीक्रेट डेटाबेस का खुलासा कैसे हुआ?

विदेशी पत्रकार रह चुके और साइबर सुरक्षा रिसर्चर मार्क होफर (Marc Hofer) इंटरनेट पर चीन की निगरानी व्यवस्था से जुड़े संकेत तलाश रहे थे। इसी दौरान उन्हें एक ऐसी वेबसाइट मिली, जिसने उन्हें हैरान कर दिया। वेबसाइट पर उनकी खुद की तस्वीर, पासपोर्ट नंबर और चीन में इस्तेमाल किया गया मोबाइल नंबर मौजूद था। इसके बाद उन्होंने गहराई से जांच शुरू की और सामने आया कि यह प्लेटफॉर्म कथित तौर पर चीन में रहने वाले विदेशी नागरिकों की जानकारी जुटाने के लिए बनाया गया था।

'डायनेमिक कंट्रोल प्लेटफॉर्म' क्या है?

रिपोर्ट के मुताबिक, इस सिस्टम का नाम 'Dynamic Control Platform for Overseas Personnel' था। यह प्लेटफॉर्म चीन के झांगजियाकौ (Zhangjiakou) शहर में रहने या आने वाले विदेशी नागरिकों का डेटा एक जगह इकट्ठा करता था।

इस डेटाबेस में क्या-क्या मिला?

  • 700 से ज्यादा विदेशी नागरिकों की प्रोफाइल थीं।
  • करीब 12,000 रिकॉर्ड मौजूद थे।
  • विदेशी पत्रकारों, छात्रों, हांगकांग और ताइवान से जुड़े लोगों की अलग-अलग कैटेगरी बनाई गई थी।
  • कुछ ऐसे लोगों का डेटा भी मौजूद था, जो कभी उस शहर गए ही नहीं थे।

कौन-कौन सी जानकारी रिकॉर्ड की जा रही थी?

रिपोर्ट के अनुसार, यह सिस्टम सिर्फ नाम और पासपोर्ट नंबर तक सीमित नहीं था। इसमें लोगों की रोजमर्रा की कई गतिविधियों का रिकॉर्ड मौजूद था। इनमें कहां गए यानी कहां सफर की, कौन-सी ट्रेन या फ्लाइट ली, सीट नंबर, अस्पताल कब गए, गैस बिल भुगतान, किन जगहों पर अक्सर जाते थे, फेस रिकग्निशन कैमरों से मिली लोकेशन, स्की रिसॉर्ट विजिट, फोटो और पहचान संबंधी जानकारी शामिल थे। यानी किसी व्यक्ति की दिनचर्या का बड़ा हिस्सा इस सिस्टम में दर्ज किया जा सकता था।

सिर्फ कैमरे नहीं, कई जगहों से जुटाया जाता था डेटा

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह प्लेटफॉर्म सिर्फ CCTV कैमरों पर निर्भर नहीं था। डेटा कथित तौर पर कई स्रोतों से जोड़ा जाता था, जैसे- फेस रिकग्निशन सिस्टम, अस्पतालों के रिकॉर्ड, यूटिलिटी पेमेंट, सफर से जुड़ी जानकारी, स्की रिसॉर्ट विजिट डेटा और सरकारी पहचान रिकॉर्ड। इन सभी जानकारियों को जोड़कर किसी व्यक्ति की गतिविधियों की पूरी तस्वीर तैयार की जा सकती थी।

भारतीय छात्रों का भी जिक्र

रिपोर्ट के अनुसार, डेटाबेस में चीन की Hebei North University में पढ़ने वाले पाकिस्तान और भारत के कई छात्रों की जानकारी भी दर्ज थी। इन प्रोफाइल में सिर्फ नाम ही नहीं, बल्कि, धर्म, शादी हुई है या नहीं, पढ़ाई का सब्जेक्ट, कैंपस में कब एडमिशन लिया या कब एंट्री की, कैमरों में रिकॉर्ड हुई गतिविधियां जैसी जानकारियां भी मौजूद थीं।

किन देशों के लोगों को अलग-अलग कैटेगरी में रखा गया?

रिपोर्ट के मुताबिक, सिस्टम में कुछ देशों के नागरिकों को अलग कैटेगरी में रखा गया था। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों के नागरिकों को Five Eyes Alliance नाम की कैटेगरी में रखा गया था। इसके अलावा मिस्र, ईरान, इजरायल, मोरक्को, पाकिस्तान और सूडान जैसे देशों के लोगों के लिए भी अलग वर्ग बनाए गए थे।

कंपनी और पुलिस के बीच क्या कनेक्शन?

'द न्यूयॉर्क टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्लेटफॉर्म के तार ओरिजिन डायनेमिक (Origin Dynamic) नाम की बीजिंग स्थित एक फर्म से जुड़े हैं। यह कंपनी पुलिस विभागों को रोबोटिक्स और सर्विलांस उपकरण बेचती है। साल 2023 में इसी कंपनी ने एक ऐसे ही सिस्टम के लिए पेटेंट भी दाखिल किया था, जिसे गैर-चीनी नागरिकों के लिए 'सूचना इंटरफेस' कहा गया था। हालांकि पुलिस ने इस डेटाबेस का इस्तेमाल किस स्तर पर किया, यह पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन इसका अस्तित्व यह बताने के लिए काफी है कि चीन विदेशी नागरिकों की प्राइवेसी में किस हद तक सेंध लगा रहा है।

वेबसाइट अचानक क्यों गायब हो गई?

मार्क होफर ने जनवरी में इस प्लेटफॉर्म का डेटा सुरक्षित किया। इसके कुछ महीनों बाद, मई में पूरी वेबसाइट इंटरनेट से गायब हो गई। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि वेबसाइट के लॉगिन पेज पर पहले से यूजरनेम और पासवर्ड भरा हुआ था, जिससे संवेदनशील जानकारी तक पहुंच आसान हो सकती थी।