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Delhi Ground Report: सत्य निकेतन में धूप भी लग्ज़री...7 मौतों के बावजूद किसके भरोसे हजारों छात्र?

Delhi Satya Niketan Ground Report में सामने आया छात्रों का डरावना सच। जानिए कैसे DU के पास किराएदारों की भीड़ और मकान मालिकों के लालच के बीच छात्र घटिया कमरों, बिना नेटवर्क और हादसों के साए में रहने को मजबूर हैं।

5 Min read
Author : Surya Prakash Tripathi
Published : Sep 08 2026, 08:16 AM IST
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Satya Niketan PG Horror: संकरी गलियां और लालच का कुआँ, DU के छात्र खौफ में!
Image Credit : X

Satya Niketan PG Horror: संकरी गलियां और लालच का कुआँ, DU के छात्र खौफ में!

Delhi Student Hub: दिल्ली के सत्य निकेतन की उन तंग और गंदी गलियों में घूमते हुए एक बात साफ समझ आती है-यहां सिविक सिस्टम और बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर बहुत पहले ही घुटने टेक चुके हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के ठीक सामने बसा यह इलाका कहने को तो स्टूडेंट्स का हब है, लेकिन असलियत में यह मकान मालिकों के लालच और छात्रों की मजबूरी से बनी एक मलिन बस्ती (शहरी स्लम) जैसा दिखता है। हाल ही में यहां एक जर्जर इमारत गिर गई, जिसमें 7 लोगों की जान चली गई-जिनमें से ज़्यादातर पढ़ाई करने आए युवा छात्र थे।

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बुनियाधी सुविधाओं तक के लिए पड़ता है जूझना
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बुनियाधी सुविधाओं तक के लिए पड़ता है जूझना

कहने को पुलिस ने बिल्डिंग मालिक को पकड़ लिया है और सरकार भी लापरवाह अफसरों को नापने के दावों में लगी है। लेकिन जिस जानलेवा माहौल में यहां हज़ारों बच्चे रोज़ घुट-घुट कर जीने को मजबूर हैं, उस पर कानूनी कार्रवाई तो छोड़िए, कोई बात तक करने को तैयार नहीं है, लेकिन बड़ा सवाल सिर्फ उस एक इमारत का नहीं है। सत्य निकेतन में रहने वाले हजारों छात्रों की रोजमर्रा की जिंदगी कैसी है? जिन जगहों पर वे हजारों रुपये किराया देकर रहते हैं, वहां सुरक्षा, रोशनी, हवा और बुनियादी सुविधाओं की स्थिति क्या है? इसके बारे में कोई बात तक करने को तैयार नहीं है।

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DU का साउथ कैंपस हब: पढ़ाई का सपना और कमर्शियल लालच का खेल
Image Credit : ANI

DU का साउथ कैंपस हब: पढ़ाई का सपना और कमर्शियल लालच का खेल

सत्य निकेतन की सबसे बड़ी यूएसपी इसकी लोकेशन है। कैंपस के ठीक पास होने की वजह से देश भर से आए छात्रों के लिए यह पहली पसंद बन जाता है। बस इसी बात का फायदा यहाँ के लोकल मकान मालिकों ने उठाया। उन्होंने अपने सीधे-साधे रिहायशी मकानों को गैर-कानूनी तरीके से बहुमंजिला कमर्शियल हॉस्टलों में बदल दिया। ज्यादा से ज्यादा किराया ऐंठने के चक्कर में एक के ऊपर एक कच्ची-पक्की मंजिलें तान दी गईं।

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सूरज की रोशनी और हवा पहुंचना भी होता है मुश्किल
Image Credit : ANI

सूरज की रोशनी और हवा पहुंचना भी होता है मुश्किल

जब पत्रकारों की टीम ने यहां के एक पीजी का जायजा लिया, तो हालात देखकर रोंगटे खड़े हो गए। कॉरिडोर में कपड़े सूख रहे थे, आने-जाने की जगह में कूलर रखे हुए थे जहां से बचकर निकलना भी किसी जंग से कम नहीं था। न कोई सुरक्षा मानक, न वेंटिलेशन। ऊपर नज़र उठाओ तो उलझे हुए तारों का जाल दिखता है, और नीचे गलियाँ इतनी पतली हैं कि दो लोग एक साथ ठीक से निकल भी न पाएं। इमारतों की ऊंचाई और सघनता ऐसी है कि दिन के उजाले में भी सूरज की एक किरण यहां तक नहीं पहुंच पाती।

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संकरे कॉरिडोर, न बिजली न वेंटिलेशन: कैसा है PG के अंदर का माहौल?
Image Credit : ANI

संकरे कॉरिडोर, न बिजली न वेंटिलेशन: कैसा है PG के अंदर का माहौल?

हॉस्टल वाले जिसे 'किचन' कहते हैं, वहां एक छोटा सिलेंडर और गैस स्टोव रखा था-बिना किसी बिजली कनेक्शन के। जगह इतनी कम कि एक बंदा खड़ा हो जाए तो सांस लेना भारी पड़े। कमरों की बात करें तो एक ही कमरे में तीन-तीन बिस्तर ठूंस दिए गए हैं। हवा के नाम पर एक जंग लगा पंखा और कूलर है। प्राकृतिक रोशनी का तो नामोनिशान नहीं है-दिन है या रात, इसका पता लगाने के लिए आपको सड़क पर बाहर निकलना पड़ेगा।

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किराया कमरे का नहीं, बिस्तर का: नेटवर्क गायब, सिर्फ धमकियां बरकरार
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किराया कमरे का नहीं, बिस्तर का: नेटवर्क गायब, सिर्फ धमकियां बरकरार

सत्य निकेतन में किराया रूम के हिसाब से नहीं, बल्कि प्रति बेड के हिसाब से वसूला जाता है। एक बिस्तर का रेट 6,000 से 8,000 रुपये या उससे भी ज़्यादा है। यानी एक छोटे से अंधेरे कमरे से मकान मालिक हर महीने 18,000 से 25,000 रुपये तक छाप रहे हैं। इसके बदले छात्रों को क्या मिलता है? एक छात्र ने बताया कि किराया देने में अगर एक दिन की भी देरी हो जाए, तो मकान मालिक सीधे सामान बाहर फेंकने की धमकी देते हैं और बेइज्जत करते हैं। आज की AI और 5G की दुनिया में इन कमरों के अंदर मोबाइल नेटवर्क तक नहीं आता। बारिश हो जाए या बिजली कट जाए, तो बच्चे अपने घर वालों से बात तक नहीं कर पाते।

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इटावा के अर्पित की आपबीती: "आग लगी तो हम यहीं जलकर मर जाएंगे"
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इटावा के अर्पित की आपबीती: "आग लगी तो हम यहीं जलकर मर जाएंगे"

इटावा से दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने आए अर्पित यादव की कहानी हर उस छात्र की कहानी है जो बड़े सपने लेकर दिल्ली आता है। अर्पित के घर वाले हर महीने 8,000 रुपये सिर्फ एक बेड के लिए देते हैं। बदले में उन्हें मिलती है सीमेंट की दो स्लैब की अलमारी, एक बल्ब और एक पंखा। एक ही फ्लोर पर 8 छात्र रहते हैं और सबके लिए बस एक वॉशरूम है। हादसे वाली जगह से महज 80 मीटर दूर बनी एक और जर्जर इमारत की तरफ इशारा करते हुए अर्पित कहते हैं, "अब तो डर लगता है। अगर यहाँ कभी आग लग गई तो बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है। हम सब यहीं जल मरेंगे। मकान मालिक को हमारी जान से कोई मतलब नहीं है।"

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हादसे का खौफ: मलबे से दोस्तों को निकाला, अब दिल्ली छोड़ने का मन
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हादसे का खौफ: मलबे से दोस्तों को निकाला, अब दिल्ली छोड़ने का मन

इमारत गिरने के बाद से यहां रहने वाले छात्रों का दिमाग दहल चुका है। जिन बच्चों ने अपनी आँखों के सामने अपने दोस्तों को मलबे में दबते देखा, वे सदमे में हैं। UPSC की तैयारी कर रहे रुद्र और कई अन्य छात्र अब दिल्ली छोड़कर अपने घर वापस लौटने की सोच रहे हैं। एक छात्रा ने रोते हुए बताया कि उसके घर वाले खबर सुनते ही उसे वापस बुला रहे हैं, क्योंकि इस इलाके में कोई इमरजेंसी आ जाए तो एम्बुलेंस या मदद पहुँचना भी नामुमकिन है।

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छात्र ने बयां किया आंखों देखा मंजर
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छात्र ने बयां किया आंखों देखा मंजर

हादसे के वक्त पास में मौजूद एक छात्र ने बताया, "हम दोपहर 1:10 के करीब लंच करने गए ही थे। अचानक एक बड़ा धमाका हुआ जैसे सिलेंडर फटा हो या भूकंप आया हो। मेरा दोस्त अंदर ही था, उसने घटना से ठीक 5 मिनट पहले मुझे मैसेज किया था और हादसे के वक्त फोन भी किया... लेकिन मैं उसे बचा नहीं पाया।"

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मांग और आपूर्ति का भारी अंतर: 31 छात्रों पर सिर्फ 1 सरकारी बेड
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मांग और आपूर्ति का भारी अंतर: 31 छात्रों पर सिर्फ 1 सरकारी बेड

आखिर सत्य निकेतन जैसा जानलेवा नेटवर्क इतना फल-फूल क्यों रहा है? इसकी असली वजह है DU में हॉस्टलों की भारी किल्लत। दिल्ली यूनिवर्सिटी में लगभग 7 लाख से ज्यादा छात्र पढ़ते हैं, जबकि यूनिवर्सिटी के अपने हॉस्टलों में सिर्फ 8,000 के आसपास कमरे हैं। इसका मतलब है कि हर 31 छात्रों में से सिर्फ 1 को ही सरकारी हॉस्टल मिल पाता है। बाकी 30 छात्रों को मजबूरन इन प्राइवेट पीजी माफियाओं की शरण में जाना पड़ता है।

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जान बूझकर ये घिनौना खेल करते हैं मकान मालिक
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जान बूझकर ये घिनौना खेल करते हैं मकान मालिक

मकान मालिकों को भी पता है कि इमारतें कभी भी गिर सकती हैं। इसीलिए वे एग्रीमेंट में ही लिखवा लेते हैं कि 'किसी भी हादसे या जान-माल के नुकसान के लिए पीजी प्रशासन ज़िम्मेदार नहीं होगा।' यानी छात्र पैसा भी पूरा दें, जान का जोखिम भी उठाएं और हादसे के बाद कोई ज़िम्मेदारी भी न ले।

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About the Author

SP
Surya Prakash Tripathi
सूर्य प्रकाश त्रिपाठी। 20 जुलाई 2003 से पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत। कुल 22 साल का अनुभव। 19 फरवरी 2024 से एशियानेट न्यूज हिंदी के साथ जुड़े हुए हैं। पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री के साथ इन्होंने डबल MA LLB भी किया हुआ है। इन्होंने क्राइम, धर्म और राजनीति के साथ सामाजिक मुद्दों पर लिखने की रुचि है। हिंदी दैनिक आज, डेली न्यूज एक्टिविस्ट, अमर उजाला, दैनिक भास्कर डिजिटल (DB DIGITAL) जैसे मीडिया संस्थानों में भी सूर्या सेवाएं दे चुके हैं।
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