मानसून सत्र के आखिरी दिन लोकसभा की कार्यवाही सिर्फ 1 मिनट चली। जानिए संसद की एक मिनट की कार्यवाही पर कितना खर्च होता है और हंगामे से क्या नुकसान हुआ।
मानसून सत्र के आखिरी दिन गुरुवार, 13 अगस्त को लोकसभा की कार्यवाही केवल एक मिनट तक चली। सदन की शुरुआत में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 'वंदे मातरम' का सामूहिक गायन कराया। इसके तुरंत बाद उन्होंने लोकसभा की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने की घोषणा कर दी। सत्र के अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह सहित केंद्र सरकार के सभी प्रमुख मंत्री सदन में मौजूद रहे। वहीं, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी कार्यवाही के दौरान उपस्थित रहे।
NEET और राम मंदिर चंदा विवाद पर विपक्ष का लगातार हंगामा
20 जुलाई से शुरू हुए मानसून सत्र के दौरान विपक्ष ने NEET पेपर लीक मामले, छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई और राम मंदिर चंदा विवाद को लेकर सरकार के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन किया। इन्हीं मुद्दों को लेकर सदन में कई दिनों तक हंगामा होता रहा, जिसके कारण लोकसभा की कार्यवाही बार-बार स्थगित करनी पड़ी। पूरे मानसून सत्र में लोकसभा की कुल 19 बैठकें हुईं, लेकिन कार्यवाही केवल 17 घंटे 30 मिनट ही चल सकी। जबकि निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार लगभग 114 घंटे तक सदन चलना था।
संसद की 1 मिनट की कार्यवाही पर कितना खर्च होता है?
भारतीय संसद की कार्यवाही पर होने वाले खर्च को लेकर अक्सर चर्चा होती है। पूर्व संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने वर्ष 2012 में बताया था कि संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही चलाने पर हर मिनट लगभग 2.5 लाख रुपये खर्च होते हैं। इस हिसाब से संसद के दोनों सदनों पर हर घंटे करीब 1.5 करोड़ रुपये का खर्च आता है। वहीं, कार्यवाही की अवधि के अनुसार एक दिन में संसद संचालन पर लगभग 6 से 9 करोड़ रुपये तक खर्च हो सकते हैं।
(नोट: यह खर्च का अनुमान 2012 में पूर्व संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित है।)
संसद के संचालन पर होने वाले खर्च में क्या-क्या शामिल होता है?
संसद की कार्यवाही पर होने वाले खर्च में कई तरह की व्यवस्थाएं शामिल होती हैं। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं..
- सांसदों के वेतन और भत्ते
- संसद सचिवालय और प्रशासनिक कर्मचारियों का वेतन
- संसद भवन का रखरखाव और तकनीकी सुविधाएं
- सुरक्षा व्यवस्था
- अनुवाद और लाइव प्रसारण जैसी सेवाएं
संसद नहीं चलने से क्या नुकसान होता है?
- संसद की कार्यवाही बाधित होने का असर केवल सरकारी खर्च तक सीमित नहीं रहता। सबसे बड़ा नुकसान लोकतांत्रिक प्रक्रिया को होता है।
- जब सदन नहीं चलता, तब जिन मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए, वे अधूरे रह जाते हैं। सांसद सरकार से जवाब नहीं मांग पाते और कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर विस्तार से बहस नहीं हो पाती।
प्रश्नकाल और शून्य काल भी हुए प्रभावित
- लगातार हंगामे की वजह से संसद की दो महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं प्रश्नकाल (Question Hour) और शून्य काल (Zero Hour) भी सामान्य रूप से संचालित नहीं हो सकीं।
- प्रश्नकाल वह समय होता है, जब सांसद विभिन्न मंत्रालयों से सीधे सवाल पूछते हैं और सरकार को जवाब देना होता है।
- वहीं, शून्य काल के दौरान सांसद अपने क्षेत्र और देश से जुड़े तत्काल महत्व के मुद्दों को सदन में उठाते हैं।
- इस मानसून सत्र में लगातार व्यवधान के कारण दोनों प्रक्रियाएं प्रभावी तरीके से नहीं चल सकीं।
बिना बहस के ही पारित हुए विधेयक
संसद में लगातार हंगामे का असर विधेयकों पर चर्चा पर भी पड़ा। 31 जुलाई को रजिस्ट्रेशन ऑफ बर्थ एंड डेथ (संशोधन) विधेयक लोकसभा में बिना किसी विस्तृत चर्चा के पारित कर दिया गया। इसके बाद दोनों सदनों की कार्यवाही तय समय से पहले स्थगित कर दी गई।
विशेषज्ञ क्यों मानते हैं बहस जरूरी है?
- संसदीय मामलों के जानकारों का मानना है कि किसी भी विधेयक पर विस्तृत चर्चा लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है।
- बहस के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपनी राय रखते हैं, संशोधन सुझाते हैं और विधेयक की संभावित कमियों की ओर ध्यान दिलाते हैं। इससे कानून अधिक प्रभावी और संतुलित बनते हैं।
- यदि विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा का अवसर नहीं मिलता, तो संसद की विचार-विमर्श और जवाबदेही सुनिश्चित करने वाली भूमिका कमजोर पड़ सकती है।


