मध्य प्रदेश के राम डोंगरे की कला अब Cosmoscow 2026 में दिखेगी। Forbes से पहचान पाने वाले कलाकार की पेंटिंग्स में भारत की प्राचीन कला और स्मृतियां हैं।
Moscow/New Delhi। मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव से शुरू हुई कला की यात्रा अब अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच चुकी है। मध्य प्रदेश के कला पिपल गांव में पले-बढ़े कलाकार राम डोंगरे इस महीने मॉस्को में आयोजित होने वाले 14वें Cosmoscow International Contemporary Art Fair 2026 में अपनी नई कृतियां पेश करेंगे। उनकी कला में भारत की प्राचीन दृश्य परंपराओं, लोक स्मृतियों और आधुनिक कला का ऐसा मेल दिखाई देता है, जो उन्हें अंतरराष्ट्रीय कला जगत में अलग पहचान देता है।
राम डोंगरे को इससे पहले जनवरी 2025 में Forbes ने London Art Fair में देखने लायक सात कलाकारों में शामिल किया था। अब Art Incept के प्रतिनिधित्व में वह Cosmoscow में ‘What Remains Beneath the Surface’ शीर्षक से अपना काम प्रस्तुत करेंगे।
उनकी इस प्रदर्शनी में 2026 में तैयार की गई बड़ी ऑयल पेंटिंग्स और कागज पर बनाई गई कृतियां शामिल हैं। खास बात यह है कि डोंगरे की कला किसी बीती हुई परंपरा को सिर्फ दोहराती नहीं है, बल्कि उसे वर्तमान समय की भाषा में आगे बढ़ाती है।
मध्य प्रदेश के गांव में बचपन से मिली कला की पहली सीख
राम डोंगरे के लिए कला की शुरुआत किसी आर्ट स्कूल या बड़े शहर की गैलरी से नहीं हुई। उनका बचपन मध्य प्रदेश के कला पिपल गांव में बीता, जहां उन्होंने अपने पिता को मिट्टी से देवी-देवताओं की आकृतियां बनाते देखा। मिट्टी, पानी और हाथों की उंगलियों के दबाव से धीरे-धीरे देवी-देवताओं के रूप तैयार होते थे। इन आकृतियों को रंगा जाता, सजाया जाता और त्योहारों के दौरान पूजा जाता। लेकिन पूजा खत्म होने के बाद इन्हें नदी में विसर्जित कर दिया जाता था।
यहीं से डोंगरे ने कला को देखने का एक अलग नजरिया सीखा। उनके लिए कला का मूल्य उसके हमेशा बने रहने में नहीं था। हाथों से बनाया गया कोई पवित्र रूप अगर वापस मिट्टी और पानी में मिल जाए, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसका अस्तित्व खत्म हो गया। बल्कि उसका चक्र पूरा हुआ।
राम डोंगरे की बाद की कला में यही विचार बार-बार दिखाई देता है—क्या बचता है, क्या मिट जाता है और स्मृति में आखिर क्या रह जाता है।
Puranic Art और Tribal Art से जुड़ी है राम डोंगरे की कला
डोंगरे ने पेंटिंग की औपचारिक शिक्षा खैरागढ़ से हासिल की, लेकिन उनकी दृश्य दुनिया उससे बहुत पहले तैयार हो चुकी थी। बचपन में देखी गई धार्मिक और लोक परंपराएं उनकी कला की बुनियाद बनीं। उनके काम में Puranic iconography, मध्य प्रदेश की जनजातीय समुदायों की Terracotta और Dokra Art, अजंता की भित्तिचित्र परंपरा और Bhimbetka Rock Paintings की प्राचीन दृश्य भाषा के प्रभाव दिखाई देते हैं।
हालांकि, डोंगरे इन परंपराओं को सिर्फ चित्रित करने की कोशिश नहीं करते। उनके लिए ये किसी संग्रहालय में रखी पुरानी चीजें नहीं हैं। वह इन्हें एक ऐसी जीवित भाषा की तरह देखते हैं, जो पीढ़ियों से आगे बढ़ती आई है। उनकी पेंटिंग्स में वास्तविक दुनिया और कल्पना के बीच की दूरी काफी कम हो जाती है। वह इसे एक तरह के Magical Realism के रूप में देखते हैं, जहां रोजमर्रा की जिंदगी और पौराणिक दुनिया एक-दूसरे से अलग नहीं लगतीं। यानी उनकी कला में देवी-देवता, स्मृतियां, लोक जीवन और आज का समय एक ही फ्रेम में मौजूद हो सकते हैं।
‘Shesh Awshesh’ में मिटाने से बनती है नई कहानी
राम डोंगरे की कला की सबसे दिलचस्प विशेषताओं में से एक उनकी पेंटिंग बनाने की प्रक्रिया है। वह कैनवास पर सिर्फ रंग जोड़ते नहीं जाते, बल्कि कई बार अपनी बनाई हुई परतों को खुद ही खुरचकर हटा देते हैं।
पहले वह पेंटिंग को रंगों, आकृतियों और पौराणिक संकेतों से भरते हैं। इसके बाद धीरे-धीरे उन परतों को अपने हाथों से खुरचते हैं। कई स्तर हटने के बाद कैनवास पर पूरा दृश्य नहीं बचता। सिर्फ कुछ संकेत, कोई आकृति, कोई हरकत या किसी पुराने दृश्य की धुंधली-सी मौजूदगी रह जाती है।
इसी प्रक्रिया से जुड़ी उनकी सीरीज का नाम ‘Shesh Awshesh’ है। इसका अर्थ मोटे तौर पर बचा हुआ हिस्सा, अवशेष या वह चीज है जो सब कुछ गुजर जाने के बाद पीछे रह जाती है। डोंगरे के लिए यह सिर्फ पेंटिंग की तकनीक नहीं है। यह स्मृति को समझने का तरीका भी है।
बचपन की यादें अक्सर पूरी कहानी के रूप में हमारे पास नहीं रहतीं। किसी त्योहार की सिर्फ एक गंध याद रहती है, किसी रंग की झलक, भीड़ में दिखाई दिया कोई चेहरा या कोई अधूरा दृश्य। स्मृति भी कुछ इसी तरह परतों को खोती जाती है और अंत में कुछ टुकड़े ही बचते हैं। उनकी खुरची हुई पेंटिंग्स इसी अनुभव को दृश्य रूप देती हैं।
Ajanta और Bhimbetka की तरह समय भी छोड़ जाता है अपने निशान
डोंगरे की यह तकनीक भारत की प्राचीन कला परंपराओं से भी एक दिलचस्प संबंध बनाती है। अजंता की गुफाओं के भित्तिचित्र हों या भीमबेटका की हजारों साल पुरानी रॉक पेंटिंग्स—समय, मौसम और प्रकृति ने इन चित्रों को पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहने दिया। कई आकृतियां धुंधली हो गईं, कई हिस्से मिट गए और कई जगह सिर्फ कुछ निशान बचे हैं।
डोंगरे अपने कैनवास पर कुछ ऐसा ही करते हैं, लेकिन जानबूझकर। जहां प्रकृति और समय ने प्राचीन चित्रों की परतों को धीरे-धीरे मिटाया, वहीं डोंगरे अपनी पेंटिंग को खुद खुरचकर अधूरा बनाते हैं। उनके लिए अधूरापन कमजोरी नहीं है। कई बार वही अधूरापन किसी दृश्य को ज्यादा सच्चा बना देता है।
‘Katha of Kanta’ में कपड़ों के साथ जुड़ी यादों की कहानी
मॉस्को में राम डोंगरे अपनी नई सीरीज ‘Katha of Kanta’ भी पेश करेंगे। यह बड़े आकार की ऑयल पेंटिंग्स की सीरीज है, जिसका संबंध Kantha quilting tradition से है। कांथा की परंपरा में पीढ़ियों से महिलाएं पुराने और इस्तेमाल किए जा चुके कपड़ों को सिलकर नई वस्तुएं तैयार करती रही हैं। हर कपड़ा अपने साथ एक कहानी लेकर आता है। वह किसी व्यक्ति का पहना हुआ कपड़ा हो सकता है, किसी परिवार की पुरानी चीज या किसी जीवन के बीते हुए दौर का हिस्सा।
कपड़ों को जोड़कर तैयार की गई कांथा में ये पुराने टुकड़े अपनी पहचान पूरी तरह नहीं खोते। उनकी परतें और सिलाई मिलकर एक नई वस्तु बनाती हैं, लेकिन पुरानी जिंदगी की छाप उसमें बनी रहती है। डोंगरे के लिए कांथा महज एक हस्तशिल्प परंपरा नहीं है। यह इस विचार का प्रतीक है कि जिसे हम बेकार या खत्म हो चुका समझते हैं, उसे फिर से जोड़कर ऐसा रूप दिया जा सकता है जिसमें उसका पूरा अतीत मौजूद हो। यही विचार उनकी कला में ‘क्या बचता है’ वाले सवाल को आगे बढ़ाता है।
भारतीय परंपरा और Contemporary Art के बीच कोई दूरी नहीं
राम डोंगरे के काम की एक खास बात यह है कि वह भारतीय परंपरा को आधुनिक दिखाने के लिए उस पर अलग से कोई परत नहीं चढ़ाते। उनकी कला में भारतीयता और समकालीनता दो अलग-अलग चीजें नहीं लगतीं। उनकी पेंटिंग्स में भारतीय दृश्य परंपराओं के संकेत साफ हैं, लेकिन उनका प्रस्तुतिकरण आज के Contemporary Art के संदर्भ में होता है। यही वजह है कि उनका काम अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए भी सहज रूप से जुड़ने वाला बनता है। इसमें भारत की लोक और धार्मिक स्मृतियां हैं, लेकिन सवाल सिर्फ भारत तक सीमित नहीं हैं।
स्मृति क्या बचाती है? समय क्या मिटाता है? किसी परंपरा का कौन-सा हिस्सा अगली पीढ़ी तक पहुंचता है? और जब पुरानी चीजें बदलती हैं तो क्या उनका मूल अर्थ भी बदल जाता है? डोंगरे की कला इन सवालों को सीधे शब्दों में नहीं, बल्कि रंग, सतह, परत और मिटाए गए हिस्सों के जरिए सामने रखती है।
Forbes से London Art Fair और अब Cosmoscow तक का सफर
राम डोंगरे को जनवरी 2025 में Forbes ने London Art Fair में देखने लायक सात कलाकारों में शामिल किया था। London Art Fair के Platform section में उन्होंने अपनी कला प्रदर्शित की थी। इस सेक्शन का क्यूरेशन Virginia Damtsa ने किया था।
Forbes ने उनकी कला को अतीत की परतों को हटाते हुए खोई हुई विरासत और वर्तमान जीवन के बीच संबंध बनाने वाली कला के रूप में देखा था। अब उनकी कला की यात्रा मॉस्को तक पहुंच रही है।
वर्तमान में राम डोंगरे New Delhi स्थित German Embassy में Artist-in-Residence भी हैं। उनके काम निजी और संस्थागत संग्रहों में भी शामिल हैं। इनमें Kumar Mangalam Birla और Boston Consulting Group के संग्रह शामिल हैं।
Cosmoscow 2026 में ‘What Remains Beneath the Surface’
मॉस्को में होने वाले 14वें Cosmoscow International Contemporary Art Fair 2026 में राम डोंगरे की प्रस्तुति का शीर्षक ‘What Remains Beneath the Surface’ है। इस प्रदर्शनी में 2026 की नई कृतियां दिखाई जाएंगी। इसमें ‘Katha of Kanta’ सीरीज की बड़ी ऑयल पेंटिंग्स के साथ कागज पर किए गए काम भी शामिल हैं।
प्रदर्शनी का शीर्षक भी डोंगरे की पूरी कला यात्रा के केंद्रीय विचार से जुड़ा हुआ है—सतह के नीचे आखिर क्या बचा रहता है? मिट्टी से बने देवी-देवताओं के विसर्जन से लेकर पुरानी पेंटिंग की खुरची हुई परतों तक और कांथा के पुराने कपड़ों को जोड़कर बनाए गए नए रूपों तक, डोंगरे के काम में एक ही धागा दिखाई देता है। जो खत्म दिखाई देता है, वह हमेशा खत्म नहीं होता। कुछ न कुछ बचा रहता है।
Art Incept के साथ अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय कलाकार की प्रस्तुति
Cosmoscow में राम डोंगरे की प्रस्तुति नई दिल्ली की Art Incept के जरिए हो रही है। Art Incept का फोकस ऐसे कलाकारों और कला अभ्यासों पर है, जिनकी जड़ें वास्तविक जीवन, जगह, स्मृति और रोजमर्रा के अनुभवों से जुड़ी हैं। गैलरी खासतौर पर उन आवाजों को सामने लाने पर जोर देती है, जो बड़े महानगरों के बाहर के क्षेत्रों और समुदायों से आती हैं।
Art Incept के अनुसार, उसका उद्देश्य ऐसी कला को समर्थन देना है जो बाजार की अपेक्षाओं के बजाय कलाकार के अनुभव और उसके आसपास की दुनिया से निकलती है। पिछले पांच वर्षों से Art Incept दक्षिण एशिया के उभरते कलाकारों के साथ काम कर रहा है। संस्था कलाकारों के साथ लंबे समय तक जुड़कर उनके काम को विकसित होने का अवसर देने पर जोर देती है।
यही वजह है कि उसका काम सिर्फ औपचारिक गैलरी स्पेस तक सीमित नहीं है। अलग-अलग तरह के स्थानों में कला को दर्शकों के सामने लाने की कोशिश की जाती है। राम डोंगरे की कला इस सोच के साथ भी मेल खाती है। उनका काम किसी एक जगह या किसी एक परंपरा में बंद नहीं है। इसकी जड़ें मध्य प्रदेश के गांव में हैं, लेकिन इसकी पहुंच अब अंतरराष्ट्रीय समकालीन कला के मंच तक हो चुकी है।
मिट्टी से बने उन देवताओं से लेकर, जिन्हें कभी नदी में विसर्जित कर दिया जाता था, और अब मॉस्को की गैलरी में पहुंची उन पेंटिंग्स तक—राम डोंगरे की कहानी दरअसल इस सवाल की कहानी है कि समय सब कुछ मिटा देता है या अपने पीछे कुछ ऐसा भी छोड़ जाता है, जिसे कला फिर से सामने ला सके।

