चीन 2020 से अपने मिसाइल केंद्रों का तेजी से विस्तार कर रहा है। इसका मकसद अमेरिकी सेना का मुकाबला कर परमाणु और हाइपरसोनिक मिसाइल उत्पादन बढ़ाना है। यह कदम ताइवान पर रणनीति का हिस्सा है और वैश्विक हथियारों की दौड़ को तेज कर सकता है।

बीजिंग: एक रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने 2020 से अपने मिसाइल बनाने वाले सेंटर्स को बड़े पैमाने पर बढ़ाना शुरू कर दिया है। CNN की तरफ से जारी सैटेलाइट तस्वीरों और आधिकारिक दस्तावेजों के विश्लेषण रिपोर्ट में कहा गया है कि यह अमेरिकी सेना का मुकाबला करने और इलाके में अपना दबदबा कायम करने के लिए चीन की एक सोची-समझी चाल है।

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परमाणु क्षमता और प्रोडक्शन में क्रांति

राष्ट्रपति शी जिनपिंग के 2012 में सत्ता में आने के बाद से, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) को 'वर्ल्ड क्लास' लेवल पर लाने के लिए अरबों डॉलर का निवेश किया गया है। इस विस्तार का मुख्य केंद्र PLA रॉकेट फोर्स (PLARF) है, जो चीन के परमाणु हथियारों के जखीरे को संभालता है। शी जिनपिंग ने इस फोर्स को रणनीतिक रक्षा की रीढ़ बताया था। रिपोर्ट के मुताबिक, मिसाइल प्रोडक्शन से जुड़े 136 सेंटर्स में से 60% से ज्यादा साइट्स पर बड़े पैमाने पर कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा है।

2020 की शुरुआत से 2025 के अंत तक, इन सेंटर्स में 20 लाख वर्ग मीटर से ज्यादा का नया कंस्ट्रक्शन एरिया जोड़ा गया है। सैटेलाइट तस्वीरों में मुख्य रूप से हथियारों के विकास के लिए नए टावर, बंकर और हैंगर दिखाई दे रहे हैं। इन सबका मकसद ग्रामीण इलाकों को तेजी से मिलिट्री-इंडस्ट्रियल सेंटर्स में बदलना है। चीन का लक्ष्य कम दूरी की, हाइपरसोनिक और परमाणु क्षमता वाली बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBMs) की प्रोडक्शन क्षमता को तेजी से बढ़ाना भी है।

दुनिया भर में चिंता और ताइवान की रणनीति

जानकारों का मानना है कि चीन का यह कदम दुनिया भर में हथियारों की एक नई दौड़ शुरू कर रहा है। पैसिफिक फोरम रिसर्च इंस्टीट्यूट के विलियम अल्बर्क इस घटनाक्रम को हथियारों की नई दौड़ का शुरुआती दौर मानते हैं। 2023 से, चीन अपने परमाणु हथियारों के जखीरे को हर साल लगभग 100 वॉरहेड की दर से बढ़ा रहा है, जो दूसरे देशों की तुलना में कहीं ज्यादा तेज है। हालांकि, अमेरिका और रूस के जखीरे की तुलना में चीन का कुल जखीरा अभी भी बहुत पीछे है।

जानकार इन नए सेंटर्स में बनने वाली मिसाइलों को ताइवान को निशाना बनाने वाली चीन की सैन्य रणनीति (PLA) का एक अहम हिस्सा मानते हैं। जानकारों का कहना है कि अगर जंग होती है, तो ये मिसाइलें 'एंटी-एक्सेस/एरिया डिनायल (A2/AD) बबल' नाम की रणनीति के लिए बहुत ज़रूरी हैं, जिसका मकसद अमेरिकी नौसेना को खाड़ी से दूर रखना है। इस रणनीति का लक्ष्य उन हवाई अड्डों और बंदरगाहों को तबाह करना है जो ताइवान को सैन्य मदद पहुंचाते हैं।

भारत के साथ बिगड़ सकते हैं रिश्ते

रिपोर्ट में कहा गया है कि जैसे-जैसे चीन अपने मिसाइल बनाने वाले सेंटर्स को बड़े पैमाने पर बढ़ा रहा है, इस सैन्य कदम से भारत समेत कई देशों के साथ भू-राजनीतिक रिश्ते और खराब हो सकते हैं। यह भी चेतावनी दी गई है कि इस घटनाक्रम से इलाके में हथियारों की एक नई दौड़ शुरू हो सकती है। जैसा कि पैसिफिक फोरम रिसर्च इंस्टीट्यूट के एनालिस्ट विलियम अल्बर्क ने बताया, चीन खुद को एक ग्लोबल सुपरपावर के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। चीन की यह बढ़ती मिसाइल क्षमता अमेरिका, जापान और ताइवान के साथ-साथ भारत के साथ भी रिश्तों में मुश्किलें पैदा कर सकती है। अंतरराष्ट्रीय जानकारों ने चेतावनी दी है कि अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाने के लिए चीन का यह भारी-भरकम निवेश, इलाके के दूसरे देशों को भी इसी तरह हथियार बढ़ाने के लिए उकसा सकता है।