भारत में गिग वर्कर्स की सामाजिक सुरक्षा के लिए एग्रीगेटर कंपनियों से अंशदान लेने के नए फॉर्मूले पर चर्चा जारी है। कारोबार या वर्कर पेमेंट के आधार पर योगदान तय होने से कैब, ऑटो और बाइक प्लेटफॉर्म पर असर पड़ सकता है।
भारत की गिग इकोनॉमी में लाखों लोग ऐप के जरिए काम करते हैं। लेकिन इन कामगारों की सामाजिक सुरक्षा का खर्च किस तरह तय होगा, इसे लेकर सरकार के सामने अब एक अहम सवाल है। अगर अंशदान कंपनियों के कारोबार के बजाय सीधे कामगारों को किए गए भुगतान के आधार पर तय हुआ, तो ज्यादा ट्रांजैक्शन वाले कैब, ऑटो और बाइक प्लेटफॉर्म पर इसका वित्तीय असर बढ़ सकता है।
कारोबार या वर्कर पेमेंट, किस आधार पर लगेगा पैसा?
श्रम और रोजगार मंत्रालय सामाजिक सुरक्षा अंशदान की गणना के दो विकल्पों पर विचार कर रहा है। पहला मॉडल कंपनी के सालाना कारोबार पर आधारित है, जबकि दूसरे में कामगारों को किए गए भुगतान या प्रति लेनदेन को आधार बनाया जा सकता है।
यहीं से इंडस्ट्री की चिंता शुरू होती है। कैब और बाइक राइड जैसे कारोबार में हर दिन बड़ी संख्या में छोटे-छोटे ट्रांजैक्शन होते हैं। ऐसे में भुगतान आधारित फॉर्मूला इन प्लेटफॉर्म के लिए कारोबार आधारित व्यवस्था की तुलना में ज्यादा महंगा साबित हो सकता है।
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Social Security Code में क्या है प्रावधान?
सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के तहत एग्रीगेटर कंपनियों को गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के सामाजिक सुरक्षा कोष में योगदान करना है। किसी एक एग्रीगेटर के साथ वित्त वर्ष में कम से कम 90 दिन या कई एग्रीगेटर्स के साथ कुल 120 दिन काम करने वाला गिग वर्कर निर्धारित लाभों के लिए पात्र हो सकता है।
मौजूदा प्रावधान के अनुसार एग्रीगेटर का योगदान उसके सालाना कारोबार के 1 से 2 फीसदी के बीच होगा। हालांकि, यह राशि गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को किए गए कुल भुगतान के 5 फीसदी से अधिक नहीं हो सकती।
5 फीसदी तक योगदान ने बढ़ाई चिंता
मंत्रालय सीधे वर्कर्स को किए गए भुगतान के आधार पर 5 फीसदी तक योगदान तय करने के विकल्प पर भी विचार कर रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक यही बदलाव राइड-हेलिंग सेक्टर के लिए सबसे महत्वपूर्ण हो सकता है।
सरल शब्दों में समझें तो जिस प्लेटफॉर्म पर कम कीमत वाले लेकिन बहुत ज्यादा ट्रांजैक्शन होते हैं, वहां भुगतान आधारित मॉडल का असर ज्यादा हो सकता है। हालांकि अंतिम फॉर्मूला क्या होगा, यह सरकार के फैसले और नियमों की अंतिम व्यवस्था पर निर्भर करेगा।
इस बदलाव का असर सिर्फ कंपनियों की लागत तक सीमित नहीं रहेगा। आगे चलकर प्लेटफॉर्म की फीस, ड्राइवर की कमाई और ग्राहकों से लिए जाने वाले किराए पर भी इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है।
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