Why Theater Seats are Red: 'हनुमान अंश' या 'मिर्जापुर द मूवी' देखने थिएटर जा रहे हैं? जानें सिनेमा हॉल में लाल सीटें होने के पीछे का असली साइंस और इसका इतिहास।
Cinema Hall Red Seats Reasons: थिएटर में पॉपकॉर्न का टब हाथ में लेकर जैसे ही आप अपनी सीट पर बैठते हैं, तो क्या कभी गौर किया है कि हर बड़े सिनेमा हॉल की सीटें और पर्दे लाल रंग के ही क्यों होते हैं? चाहे आप नीम करोली बाबा की महिमा दिखाती फिल्म 'हनुमान अंश' देखने जा रहे हों या फिर बड़े पर्दे पर कालीन भैया और गुड्डू पंडित का भौकाल देखने के लिए 'मिर्जापुर द मूवी'। हॉल में घुसते ही ये लाल रंग आपकी आंखों के सामने जरूर आता है। लेकिन क्या आप जानते हैं ऐसा क्यों होता है? ये सिर्फ इत्तेफाक या इंटीरियर डिजाइन या इसके पीछे कोई साइंस है? आइए जानते हैं इसकी वजह...
थियेटर में लाल रंग की सीटें ही क्यों होती हैं?
अंधेरे में गायब हो जाता है लाल रंग
जब हॉल की लाइट बंद होती है, तो हमारी आंखों की बनावट कुछ इस तरह काम करती है कि हमें रंगों का अहसास बदलने लगता है। इसे विज्ञान में पुरकिंजे प्रभाव (Purkinje Effect) कहते हैं।
कम रोशनी का खेल
सिनेमा हॉल में फिल्म शुरू होने के बाद रोशनी पूरी तरह बंद कर दी जाती है। ऐसे माहौल में हमारी आंखें तेज रोशनी से धीरे-धीरे कम रोशनी के हिसाब से खुद को ढालती हैं। यहीं लाल रंग काम आता है। कम रोशनी में लाल रंग बाकी कई चमकीले रंगों की तुलना में कम उभरता है। इसलिए अंधेरे में लाल सीटें दर्शकों का ध्यान कम खींचती हैं
स्क्रीन पर पूरा फोकस
जब मूवी शुरू होती है और लाइट ऑफ होती है, तो लाल सीटें आंखों के लिए 'अदृश्य' जैसी हो जाती हैं। इससे स्क्रीन से आपका ध्यान नहीं भटकता है। अगर वहां नीली, हरी या सफेद सीटें होतीं, तो अंधेरे में भी चमकती रहतीं और फिल्म देखने का मजा किरकिरा हो जाता।
दाग-धब्बे छिपने में भी आसानी
इसके पीछे एक और कारण ये है कि थिएटर्स में रोजाना सैकड़ों लोग आते हैं, कोल्ड ड्रिंक और स्नैक्स खाते हैं। लाल या महरून जैसे गहरे रंग पर दाग-धब्बे और धूल-मिट्टी जल्दी नजर नहीं आते, जिससे सीटें लंबे समय तक साफ-सुथरी दिखती हैं।
सिनेमा हॉल में लाल रंग की सीटें लगाने की शुरुआत कब से हुई?
सिनेमा हॉल के इस लाल रंग का कनेक्शन सदियों पुराने यूरोपीय थिएटर्स से भी है। ऐतिहासिक रूप से इटली के ओपेरा थिएटर्स में लाल और गोल्डन रंग का इस्तेमाल शाही अंदाज दिखाने के लिए किया जाता था। समय के साथ यह परंपरा नाटकों से होते हुए आधुनिक सिनेमाघरों तक पहुंच गई और हॉल का स्टैंडर्ड रंग बन गई।


