सुप्रीम कोर्ट ने CJP प्रदर्शन में शामिल गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के छात्र को 5 लाख का नोटिस भेजने पर ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को कड़ी फटकार लगाई है। CJI ने पूछा कि कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद ऐसा नोटिस भेजने की हिम्मत कैसे हुई।
CJP Protest: जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन में शामिल होने वाले एक छात्र को 5 लाख रुपये का नोटिस थमाने पर सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को सख्त लहजे में फटकार लगाई है। देश की शीर्ष अदालत ने बेहद नाराजगी जताते हुए पूछा कि जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही 36 दिनों तक चले आंदोलन में शामिल छात्रों पर किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई न करने का साफ आदेश दे चुका था, तो फिर मजिस्ट्रेट ने ऐसा कदम उठाने का दुस्साहस कैसे किया।
गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के छात्र को मिला था 5 लाख का बॉन्ड भरने का नोटिस
पूरा मामला गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के सेकेंड ईयर के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा हुआ है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए CJP के विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने के कारण ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने अक्षत को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया था। नोटिस में छात्र से शांति बनाए रखने के लिए 5 लाख रुपये का पर्सनल बॉन्ड और 5-5 लाख रुपये की दो जमानतें भरने को कहा गया था। हालांकि विवाद बढ़ता देख पुलिस ने बाद में यह नोटिस वापस ले लिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे के उठते ही माहौल गरमा गया।
चीफ जस्टिस ने जताई हैरानी: 'हमारा स्पष्ट आदेश था, कोई उल्लंघन नहीं कर सकता'
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) की अगुआई वाली तीन जजों की बेंच ने इस कार्रवाई पर गहरा आश्चर्य व्यक्त किया। सुनवाई के दौरान CJI ने सख्त लहजे में कहा, "मजिस्ट्रेट की नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे हुई? हमने पहले ही साफ कर दिया था कि किसी भी छात्र के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं होगी। देश का कोई भी मजिस्ट्रेट सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का उल्लंघन नहीं कर सकता।" CJI के साथ बेंच में शामिल जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना ने वकील को मामले के तमाम तथ्य और नोटिस को ऑन-रिकॉर्ड लाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी से इस पूरी मनमानी पर औपचारिक स्पष्टीकरण मांगेगा।
वरिष्ठ वकील ने उठाया अवमानना का मुद्दा, कहा-नोटिस वापस लेने से गलती माफ नहीं होती
सुप्रीम कोर्ट में यह मामला सीनियर वकील विश्वजीत भट्टाचार्य ने मौखिक रूप से उठाया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि उत्तर प्रदेश के अधिकारी छात्रों के बीच 'डर का माहौल' (fear psychosis) पैदा करने का प्रयास कर रहे हैं। वकील भट्टाचार्य ने दलील दी कि भले ही पुलिस ने अब नोटिस वापस ले लिया हो, लेकिन इससे अदालत के आदेश के उल्लंघन का अपराध खत्म नहीं हो जाता। उन्होंने कहा, "यह सीधे तौर पर अदालत की अवमानना का मामला है। एक बार अवमानना हो जाए, तो महज नोटिस वापस खींच लेने से कानून की नजर में वह खत्म नहीं हो जाती।"
क्या था पुलिस का आरोप और क्यों भेजा गया था नोटिस?
लाइव-लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, 4 सितंबर को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 130 के तहत यह नोटिस ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट III की अदालत से जारी हुआ था। पुलिस की रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि अक्षत त्रिपाठी यूनिवर्सिटी के बाकी छात्रों के बीच "सरकार विरोधी भ्रामक बातें फैला रहा था" और उन्हें जंतर-मंतर पर CJP के आंदोलन से जुड़ने के लिए उकसा रहा था।
पुलिस का दावा था कि उसकी गतिविधियों से इलाके में शांति और कानून-व्यवस्था भंग हो सकती थी। दूसरी ओर, छात्र अक्षत त्रिपाठी ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि उसने पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखी थी और प्रदर्शन के वक्त उसकी क्लास का भी कोई नुकसान नहीं हो रहा था।
CJP आंदोलन, NEET धांधली और सुप्रीम कोर्ट का पुराना रुख
गौरतलब है कि NEET परीक्षा में गड़बड़ियों को लेकर 20 जून से शुरू हुआ यह आंदोलन करीब 36 दिनों तक चला था। 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच तीखी झड़प भी देखने को मिली थी। तत्कालीन शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और सरकार द्वारा मांगे स्वीकार करने के बाद आंदोलन खत्म हुआ। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 20 से 25 जुलाई के बीच देशभर में CJP प्रदर्शनों से जुड़े छात्रों पर दर्ज सभी एफआईआर (FIR) रद्द कर दी थीं। इससे पहले 31 अगस्त को दिल्ली पुलिस ने भी कोर्ट को बताया था कि वे दर्ज 13 एफआईआर वापस ले रहे हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के इतने स्पष्ट रुख के बाद भी स्थानीय मजिस्ट्रेट द्वारा छात्र को 5 लाख रुपये का नोटिस जारी करना न्यायपालिका की अवमानना का बड़ा मामला बन गया है।


