गणपति की मूर्ति कैसे बनती है? जानिए मिट्टी तैयार करने से लेकर ढांचा, चेहरा, रंगाई, आंखों की कारीगरी और विसर्जन तक की पूरी प्रक्रिया।
Ganesh Idol Making Process: गणेश चतुर्थी पर गणपति की खूबसूरत मूर्ति देखने के बाद मन गदगद हो जाता है। इस मूर्ति के पीछे कारीगर की कई दिनों की मेहनत, मिट्टी की तैयारी और बारीक कारीगरी होती है। मूर्ति बनने की कहानी सिर्फ मिट्टी को आकार देने तक सीमित नहीं होती। इसके लिए सही मिट्टी चुनने से लेकर उसे गूंथना, शरीर का ढांचा तैयार करना, चेहरा और सूंड बनाना, हाथ-पैर जोड़ना, सुखाना, रंग करना और लास्ट में आंखों में आकर्षण का भाव देना- हर फेज बहुत खास होता है। पारंपरिक मिट्टी की मूर्तियों में नदी या नदी किनारे की मिट्टी का यूज होता है, जबकि कुछ जगहों पर शाडू मिट्टी और चिकनी मिट्टी भी इस्तेमाल होती है।
सबसे पहले आती है मिट्टी
कारीगर के लिए मूर्ति की शुरुआत मूर्ति से नहीं, बल्कि मिट्टी की तैयारी से होती है। मिट्टी को छानकर उसमें मौजूद कंकड़-पत्थर हटाए जाते हैं। उसमें जरूरत के मुताबिक- पानी मिलाकर अच्छी तरह गूंथा जाता है। कुछ जगह मिट्टी को मजबूत और काम करने लायक बनाने के लिए भूसी या दूसरे नेचुरल रेशेदार सामान मिलाए जाते हैं। यहीं से कारीगर की असली परीक्षा शुरू होती है, क्योंकि मिट्टी न बहुत सूखी होनी चाहिए और न ही जरूरत से ज्यादा गीली।
...और फिर बनता है गणपति का ढांचा
मिट्टी तैयार होने के बाद कारीगर सबसे पहले मूर्ति का बेस और शरीर का मुख्य आकार तैयार करता है। बड़े साइज की मूर्तियों में अंदरूनी ढांचे के लिए बांस, भूसा या दूसरे हल्के पदार्थों का यूज होता है। इसके ऊपर मिट्टी की परतें लगाकर शरीर का आकार बनाया जाता है। इसके बाद पेट, पैर, हाथ, कंधे और सिर का आकार धीरे-धीरे बनता है। कारीगर हाथ से मिट्टी दबाता, काटता और चिकना करता है। मूर्ति का हर हिस्सा अनुपात में हो, इसका खास ध्यान रखा जाता है।
सबसे मुश्किल काम - चेहरा और सूंड बनाना
गणपति की पहचान उनके चेहरे, बड़े कान और सूंड से होती है। इसलिए मूर्ति का चेहरा बनाना सबसे बारीक कामों में से एक माना जाता है। कारीगर छोटी-छोटी मिट्टी की परतों से आंखों, नाक, कान, होंठ और सूंड का आकार तैयार करता है। सूंड किस दिशा में होगी, चेहरे पर कैसा भाव होगा और आंखों का साइज कैसा रहेगा- इन छोटी चीजों से पूरी मूर्ति का रूप बदल जाता है। इसी फेज में मुकुट, आभूषण, वस्त्र, हाथों में मौजूद वस्तुएं और गणपति के वाहन मूषक जैसे छोटे हिस्से भी तैयार होते हैं।
मूर्ति को सुखाना सबसे जरूरी फेज होता है...
मूर्ति का आकार बन जाने के बाद उसे तुरंत रंग नहीं किया जाता। पहले मिट्टी को अच्छी तरह सुखाना पड़ता है। यही वह फेज है जहां कारीगर को सबसे ज्यादा अलर्ट रहना पड़ता है, क्योंकि जल्दी या गलत तरीके से सूखने पर मिट्टी में दरारें पड़ सकती हैं। मूर्ति को आमतौर पर तरीके से सुखाया जाता है। मौसम, मूर्ति के आकार और मिट्टी के प्रकार के अनुसार मूर्ति को सूखने में 6 से 15 दिन तक का समय लगता है, जबकि मुंबई की नमी वाले मौसम में शाडू मिट्टी की बड़ी मूर्तियों को 15-20 दिन तक सूखने में लगता है।
अब आती है रंगों की बारी
जब मूर्ति पूरी तरह सूख जाती है, तब उसकी सतह को ठीक किया जाता है। कहीं दरार दिखे तो उसे मिट्टी से भरकर दोबारा सुखाया जाता है। इसके बाद बेस कोट और रंगों का काम स्टार्ट होता है। कारीगर गणपति के शरीर, वस्त्र, मुकुट और आभूषणों को अलग-अलग रंग देता है। पर्यावरण को ध्यान में रखकर नेचुरल और पानी में घुलने वाले रंगों के यूज होता है। मौजूदा समय में हल्दी, गेरू, चारकोल और पौधों से बने रंगों का इस्तेमाल भी हो रहा है।
सबसे लास्ट में बनती हैं आंखें
मूर्ति का सबसे भावुक और महत्वपूर्ण पार्ट होता है आंखों का काम। ज्यादातर कारीगर इसे सबसे लास्ट में करते हैं। आंखों की बारीक रेखाएं और चेहरे का अंतिम भाव मूर्ति को जीवंत रूप देते हैं। एक बार आंखों और अंतिम सजावट का काम पूरा हो जाए तो मिट्टी का एक सिंपल ढांचा गणपति बप्पा की सुंदर प्रतिमा में बदल जाता है।
फिर कारीगर से भक्तों तक पहुंचते हैं बप्पा
मूर्ति तैयार होने के बाद उसे सावधानी से पैक करके गणेश पंडालों और घरों तक पहुंचाया जाता है। स्थापना के समय पूजा होती है और गणपति की प्रतिमा को सजाया जाता है। इसके बाद भक्त बप्पा की पूजा करते हैं। फिर आता है वह सबसे भावुक और रुला देने वाला पल, जिसका इंतजार किसी को नहीं होता - विसर्जन।
मिट्टी फिर मिट्टी में लौट जाती है...
विसर्जन के दौरान गणपति की मिट्टी की मूर्ति पानी में धीरे-धीरे घुलकर अपने नेचुरल रूप में लौटती है। यही वजह है प्राकृतिक मिट्टी से बनी छोटी मूर्तियों को पर्यावरण के लिए बेहतर ऑप्शन माना जाता है। इस तरह एक गणपति मूर्ति की यात्रा मिट्टी से शुरू होकर भगवान के स्वरूप तक पहुंचती है और आखिर में फिर मिट्टी में ही लौट जाती है। इसके पीछे सिर्फ कारीगर के हाथों की कला नहीं, बल्कि कई दिनों की मेहनत, धैर्य और श्रद्धा की कहानी होती है।


