क्या ईरान का यूरेनियम भंडार कमजोर होगा या परमाणु खतरा फिर लौटेगा? क्या अमेरिका-ईरान डील से जंग खत्म होगी या नई शर्तों पर टकराव शुरू होगा? क्या 440 किलो से ज्यादा संवर्धित यूरेनियम को नष्ट किया जाएगा या कहीं भेजा जाएगा? होर्मुज से यूरेनियम तक, अमेरिका-ईरान समझौते में छिपे 5 बड़े रहस्य उजागर?
वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच 108 दिनों तक चले विनाशकारी युद्ध को खत्म करने के लिए जिस ऐतिहासिक 'इस्लामाबाद समझौते (MoU)' पर हस्ताक्षर हुए हैं, उसकी परतें अब धीरे-धीरे खुलने लगी हैं। हालांकि पूरी दुनिया की नजरें होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने और प्रतिबंधों में ढील दिए जाने पर टिकी हैं, लेकिन इस महा-डील के परदे के पीछे एक ऐसा गुप्त और सबसे संवेदनशील सैन्य प्रावधान छिपा है, जो सीधे तौर पर ईरान के परमाणु कार्यक्रम की रीढ़ को प्रभावित करने वाला है। यह मुद्दा है—ईरान के अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम (Highly Enriched Uranium) के विशाल भंडार का भविष्य।

90% के करीब पहुंच चुका था खतरा: IAEA की उस रिपोर्ट ने उड़ा दिए थे होश
परमाणु हथियारों की दुनिया में 90 प्रतिशत या उससे अधिक संवर्धित यूरेनियम को 'वेपन्स-ग्रेड' माना जाता है। जून 2025 में ईरानी परमाणु ठिकानों पर हुए अमेरिकी और इजराइली हवाई हमलों से ठीक पहले, इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) ने एक बेहद चौंकाने वाला अनुमान जारी किया था। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के पास 60 प्रतिशत तक समृद्ध किया जा चुका लगभग 440.9 किलोग्राम यूरेनियम का भारी भंडार मौजूद था। यह स्तर नागरिक उपयोग से बहुत ज्यादा और परमाणु बम बनाने की दहलीज के बेहद करीब था। यही वजह थी कि अमेरिका किसी भी कीमत पर इस स्टॉकपाइल को पूरी तरह निष्क्रिय या खत्म करना चाहता था।
'डाउनब्लेंड' या तीसरे देश को ट्रांसफर? यूरेनियम को कमजोर करने का वो सीक्रेट प्लान
अमेरिकी अधिकारियों द्वारा साझा किए गए ड्राफ्ट के अनुसार, इस अंतरिम समझौते के तहत ईरान आखिरकार अपने इस खतरनाक यूरेनियम भंडार को "कमजोर" (डाइल्यूट) करने के लिए पूरी तरह सहमत हो गया है। कूटनीतिक भाषा में इसे 'डाउनब्लेंड' करना कहते हैं, यानी यूरेनियम की समृद्धता के स्तर को इतना गिरा देना कि उसका इस्तेमाल कभी हथियार बनाने में न हो सके। हालांकि, इस ऑपरेशन को जमीन पर कैसे उतारा जाएगा, इसका सस्पेंस अभी बरकरार है। परदे के पीछे दो विकल्पों पर गहन बातचीत चल रही है—या तो अंतरराष्ट्रीय निगरानी में ईरान की परमाणु साइट पर ही इसका मिश्रण (blending on site) करके इसे डाउनग्रेड किया जाएगा, या फिर इस पूरे जखीरे को किसी तीसरे सुरक्षित देश में ट्रांसफर कर दिया जाएगा।
2015 की परमाणु डील से भी बड़ी छूट: क्या ईरान को मिलने जा रही है पाबंदियों से पूर्ण आजादी?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह अंतरिम समझौता साल 2015 के ऐतिहासिक परमाणु समझौते (JCPOA) से कहीं ज्यादा व्यापक और ईरान के लिए फायदेमंद है। 2015 में ईरान को यूरेनियम कम करने के बदले केवल कुछ आर्थिक प्रतिबंधों से राहत मिली थी। लेकिन इस बार, यह डील ईरान पर अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा लगाए गए 'सभी' प्रतिबंधों को पूरी तरह खत्म करने का रास्ता खोलती है। इसमें न केवल तेहरान के हथियार कार्यक्रमों पर लगे बैन शामिल हैं, बल्कि मानवाधिकारों के उल्लंघन से जुड़ी पाबंदियां भी हटाने का शेड्यूल तैयार किया जा रहा है। इसके बदले ईरान ने वादा किया है कि वह भविष्य में कभी भी परमाणु हथियार नहीं खरीदेगा और न ही उनका निर्माण करेगा।
300 बिलियन डॉलर का महा-पैकेज और लेबनान पर इजराइली हमलों के बीच नया पेच
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ की सफल मध्यस्थता के बाद यह डील तत्काल प्रभाव से लागू तो हो गई है, लेकिन इसके आर्थिक और क्षेत्रीय प्रावधानों ने नया सस्पेंस पैदा कर दिया है। समझौते के तहत ईरान को अपने देश के पुनर्निर्माण के लिए कम से कम 300 बिलियन अमेरिकी डॉलर ($300 अरब) का एक विशाल वित्तीय पैकेज मिलने की उम्मीद है, जो आगे की बातचीत की प्रगति पर निर्भर करेगा। इसके अलावा, हिज़्बुल्लाह मिलिटेंट ग्रुप के खिलाफ इजराइल के भीषण हमलों के बावजूद, इस डील में लेबनान की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता को बनाए रखने की कसम खाई गई है।
60 दिनों का खतरनाक टाइमर: क्या दो महीने बाद होर्मुज में फिर छिड़ेगा टैक्स युद्ध?
इस समझौते का सबसे नाजुक हिस्सा इसकी समय-सीमा है। यह समझौता केवल 60 दिनों के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य से बिना किसी शुल्क (टोल-फ्री) और बिना रोक-टोक के जहाजों की आवाजाही की गारंटी देता है। सबसे बड़ा सस्पेंस यह है कि इस ड्राफ्ट में भविष्य में ईरान द्वारा इस रणनीतिक जलमार्ग पर ट्रांजिट शुल्क या टैक्स लगाने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया गया है। यानी, अगर अगले 60 दिनों के भीतर यूरेनियम को कमजोर करने और प्रतिबंधों को पूरी तरह हटाने की समय-सारणी पर दोनों देशों के बीच अंतिम सहमति नहीं बनी, तो दुनिया की यह सबसे महत्वपूर्ण तेल सप्लाई लाइन एक बार फिर से बंद हो सकती है और मिडिल ईस्ट दोबारा युद्ध की आग में झुलस सकता है।


