जंतर-मंतर प्रदर्शन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणियों और अभद्र भाषा को लेकर बरखा त्रेहान ने सवाल उठाए, लोकतांत्रिक विरोध की मर्यादा पर बहस तेज।
लेखक: बरखा त्रेहान
दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन के कुछ वीडियो पूरे देश में चर्चा का विषय बने हुए हैं। इन वीडियो में देश के प्रधानमंत्री मोदी का "फ्रेंड्स फ्रेंड्स" कहकर मज़ाक उड़ाया गया। इतना ही नहीं, उनके लिए अभद्र, अश्लील और बेहद आपत्तिजनक भाषा का खुलेआम इस्तेमाल किया गया। कुछ वीडियो में सेक्सिस्ट टिप्पणियाँ भी सुनाई देती हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि एक जीवित प्रधानमंत्री की प्रतीकात्मक "13वीं" तक मनाई गई। यह दृश्य केवल राजनीतिक बहस का विषय नहीं है। यह हमारे समाज, हमारे संस्कार और हमारे युवाओं की सोच पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
क्या यही एक छात्र आंदोलन की पहचान है?
क्या सचमुच NEET के छात्र छात्राएँ अपनी बात रखने के लिए गालियों, अश्लील भाषा और व्यक्तिगत अपमान का सहारा लेते हैं? क्या उनके माता पिता ने उन्हें यही संस्कार दिए हैं कि किसी भी व्यक्ति, विशेष रूप से देश के प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति, के लिए इस तरह की भाषा का प्रयोग करें?
लोकतंत्र में विरोध करना हर नागरिक का अधिकार है। सरकार की आलोचना भी लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन क्या विरोध का मतलब किसी का मज़ाक उड़ाना, अश्लील गालियाँ देना, सेक्सिस्ट टिप्पणियाँ करना और मर्यादा की सभी सीमाएँ पार कर देना है?
हम अपने बच्चों और युवाओं को किस दिशा में ले जा रहे हैं?
अगर आज आंदोलन की पहचान तर्क और संवाद के बजाय गाली गलौज, अभद्र भाषा और व्यक्तिगत अपमान बन जाएगी, तो आने वाले कल में समाज से शालीनता और सम्मान की उम्मीद कैसे की जाएगी? मतभेद हो सकते हैं। विचार अलग हो सकते हैं। लेकिन भाषा और व्यवहार की भी एक मर्यादा होती है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संवाद है, न कि अपमान।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हर राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर हम यह सोचें कि क्या इस तरह की भाषा और व्यवहार को सामान्य माना जा सकता है? अगर इसका उत्तर "नहीं" है, तो हमें मिलकर ऐसी मानसिकता का विरोध करना चाहिए, चाहे वह किसी भी मंच, किसी भी संगठन या किसी भी विचारधारा से क्यों न जुड़ी हो।
अंत में मैं केवल कुछ प्रश्न छोड़ना चाहती हूं-
- क्या हम अपने बच्चों को असहमति व्यक्त करना सिखा रहे हैं, या अपमान करना?
- क्या हम उन्हें तर्क की भाषा सिखा रहे हैं, या गाली की?
- क्या यही हमारे युवाओं का भविष्य है?
और सबसे बड़ा प्रश्न।
- क्या यही वह भारत है, जिसका भविष्य हमारे युवा गढ़ना चाहते हैं?
कौन है बरखा त्रेहान?
बरखा त्रेहान एक मीडिया पर्सनैलिटी, सामाजिक कार्यकर्ता और जेंडर-न्यूट्रल (लिंग-तटस्थ) समाज की मुखर समर्थक हैं। वह समाज में मौजूद लिंग आधारित पूर्वाग्रहों और रूढ़ियों को चुनौती देते हुए भारतीय संविधान के तहत सभी लिंगों के लिए समान न्याय की वकालत करती हैं। उनका मानना है कि अधिकारों और कानूनों का लागू होना निष्पक्ष, समान और बिना किसी भेदभाव के होना चाहिए।
प्रमुख भूमिकाएं और उपलब्धियां
- पुरुष आयोग (Purush Aayog) की अध्यक्ष – पुरुष अधिकारों और पारिवारिक न्याय के क्षेत्र में कार्य करने वाला एक प्रमुख मंच।
- AIIMS रायपुर और FMS दिल्ली में TEDx स्पीकर रह चुकी हैं।
- हिंदू उद्यमी (Entrepreneur) और सांस्कृतिक चिंतक के रूप में भी पहचान रखती हैं।
- लघु फिल्म वन साइडेड लव (One Sided Love) की निदेशक और निर्माता हैं।
- कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्देशन कर चुकी हैं।
जोश टॉक्स (Josh Talks) में अपनी बात रख चुकी हैं और उन्हें डोस्टकास्ट (Dostcast), वैदिक वॉक्स (Vedic Vox), भारत 24, तरुण बिंदलिश, प्रवीण दिल्लीवाला और इंडिया न्यूज जैसे प्रमुख मीडिया एवं पॉडकास्ट प्लेटफॉर्म्स पर आमंत्रित किया जा चुका है।
