HiRISK रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल-चीन सीमा पर ग्लेशियर आपदा से पहले खतरे के संकेत दिखे थे। बाढ़ में 1127 मौतों के बाद Early Warning System पर भी सवाल उठ रहे हैं।
नेपाल-तिब्बत बॉर्डर के पास 26 अगस्त को अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन में मरनेवालों का आंकड़ा 1100 पहुंच चुका है। इसी बीच, HiRISK साइंटिफिक कंसोर्टियम की नई रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल-चीन सीमा के पास ग्लेशियर टूटने के बाद हुई भीषण लैंडस्लाइड और अचानक आई बाढ़ से कुछ दिन पहले ही ग्लेशियर और आसपास के इलाके में अस्थिरता के साफ संकेत दिखाई देने लगे थे।
ग्लेशियर टूटने से पहले वैज्ञानिकों ने देखे थे खतरे के संकेत
वैज्ञानिकों के मुताबिक, घटना से पहले कुछ ऐसे बदलाव हुए थे, जिनसे खतरे का अंदाजा लगाया जा सकता था। इनमें ग्लेशियर से निकलने वाला पिघला हुआ पानी साफ तौर पर भूरे रंग का होना और आसपास की चट्टानों की ढलान में दरारों का फैलना शामिल था। वैज्ञानिकों ने इन संकेतों को ‘घटना से पहले के संकेत’ बताया है। हालांकि, दूर और बहुत अधिक ऊंचाई वाले हिमालयी इलाकों में इस तरह के बदलावों का समय रहते पता लगाना अब भी बड़ी चुनौती है।
Early Warning System की कमी पर उठे सवाल
HiRISK रिपोर्ट के निष्कर्षों के बाद हिमालय के दूरदराज इलाकों में ग्लेशियर से जुड़े खतरों के लिए ऑपरेशनल Early Warning System की कमी पर नए सवाल खड़े हो गए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर नीचे की ओर बड़े और बेहतर चेतावनी सिस्टम मौजूद होते, तो काफी जानें बचाई जा सकती थीं। रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन के कुछ इलाकों में ग्लेशियल झीलों की निगरानी के लिए हाल के वर्षों में अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगाए गए हैं। लेकिन जिस इलाके में ग्लेशियर टूटने की घटना हुई, वहां ग्लेशियर से जुड़े खतरों की निगरानी के लिए कोई खास ऑपरेशनल सिस्टम मौजूद नहीं था।
पुराने सिस्टम से भी नहीं मिलता ज्यादा समय
वैज्ञानिकों के मुताबिक, जब जमीन धंसना शुरू हुई तो शुरुआती लैंडस्लाइड इतनी तेजी से आगे बढ़ी कि पुराने तरह के वॉर्निंग सिस्टम से बॉर्डर चेकपॉइंट को खाली करने के लिए शायद बहुत कम समय मिलता। बॉर्डर चेकपॉइंट उन इलाकों में से था, जो सबसे पहले प्रभावित हो सकते थे। हालांकि, नीचे की ओर मौजूद इलाकों में लोगों को बचाने और सुरक्षित जगह पहुंचाने के लिए थोड़ा ज्यादा समय मिल सकता था। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर कोई बड़ा Early Warning System 10 मिनट या उससे ज्यादा पहले खतरे की जानकारी दे देता, तो काफी लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
सिर्फ ग्लेशियल झीलों की निगरानी काफी नहीं
- इस घटना ने यह भी दिखाया है कि Early Warning System को सिर्फ ग्लेशियल झीलों तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
- वैज्ञानिकों के मुताबिक, ऐसे सिस्टम में अस्थिर ग्लेशियरों और आसपास की पहाड़ी ढलानों पर भी नजर रखनी चाहिए।
- साथ ही यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि ऊपर के इलाकों में खतरे का पता चलने के बाद नीचे रहने वाले कमजोर और प्रभावित समुदायों तक समय पर चेतावनी पहुंच सके।
'यह इलाका एक ब्लाइंड स्पॉट था'
स्टिमसन सेंटर के एनर्जी, वॉटर एंड सस्टेनेबिलिटी प्रोग्राम के सीनियर फेलो ऑस्टिन लॉर्ड ने हाल ही में एक कमेंट्री में इस घटना को लेकर चिंता जताई। उन्होंने लिखा कि इस घटना का पहले पता नहीं चल पाया और यह एक तरह के ‘ब्लाइंड स्पॉट’ में हुई, जिसके कारण इसका पता लगाना बहुत मुश्किल हो गया। उन्होंने नेपाल और चीन के बीच ज्यादा संवाद, जानकारी साझा करने और सीमा पार खतरों के संयुक्त विश्लेषण की जरूरत पर भी जोर दिया।
दूसरी रिपोर्टों ने भी ग्लेशियर के खतरे को लेकर चेताया
- हिमालय में बढ़ते ग्लेशियर खतरों को लेकर केवल HiRISK की रिपोर्ट ही चिंता नहीं जता रही है।
- मार्च 2026 में International Centre for Integrated Mountain Development (ICIMOD) ने भी हिंदू कुश हिमालय को लेकर दो बड़ी रिपोर्ट जारी की थीं।
- इन रिपोर्टों में हिंदूकुश हिमालय में लंबे समय से हो रहे बदलावों का अध्ययन किया गया था।
- रिपोर्ट में चेतावनी दी गई कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण क्रायोस्फीयर से जुड़े खतरों का जोखिम बढ़ रहा है।
- इनमें Glacial Lake Outburst Flood (GLOF) यानी ग्लेशियल झील के फटने से आने वाली बाढ़ भी शामिल है।
बाढ़ में मरने वालों की संख्या बढ़कर 1127 पहुंची
नेपाल पुलिस के मुताबिक, बाढ़ के कारण मरने वालों की संख्या बढ़कर 1,127 हो गई है। बचाव और तलाशी अभियान जारी रहने के साथ अलग-अलग जिलों से बड़ी संख्या में शव बरामद किए गए हैं। पुलिस के अनुसार, रसुवा से 45, नुवाकोट से 155, धाडिंग से 59, चितवन से 348, गोरखा से 66, तनहुन से 38, नवलपरासी ईस्ट से 217 और नवलपरासी वेस्ट से 190 शव बरामद किए गए हैं।


