सरकारी दफ्तरों के बंद दरवाजों के पीछे छिपे वीआईपी कल्चर पर चला केंद्र सरकार का डंडा! सरकार ने सरकारी गाड़ियों पर बड़ी सख्ती कर दी है। अब 'एक अधिकारी, एक सरकारी गाड़ी' नियम लागू होगा। आखिर क्यों बदले गए नियम और किन अधिकारियों पर पड़ेगा सबसे बड़ा असर?

नई दिल्ली: दिल्ली के लुटियंस ज़ोन और सरकारी मंत्रालयों के चमकते गलियारों में अचानक सन्नाटा पसर गया है। सालों से चले आ रहे एक वीआईपी कल्चर और विशेषाधिकार पर देश की सरकार ने एक ही झटके में हथौड़ा चला दिया है। केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच इस वक्त सिर्फ एक ही चर्चा है-आखिर इस नए फरमान के बाद उनकी गाड़ियों के काफिले का क्या होगा? वित्त मंत्रालय के तहत आने वाले व्यय विभाग (Department of Expenditure) ने अचानक एक ऐसा ऑफिस मेमोरेंडम (OM) जारी किया है, जिसने नौकरशाही की व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। सरकार ने सरकारी संसाधनों की बर्बादी को रोकने के लिए एक बेहद सख्त नीति को हरी झंडी दे दी है, जिसे नाम दिया गया है-"एक अधिकारी, एक सरकारी गाड़ी"।

अतिरिक्त प्रभार का 'खेल' खत्म: मंत्रालयों में छुपा था कौन सा बड़ा राज?

अब तक कई सीनियर अधिकारियों के बीच एक अघोषित परंपरा चल रही थी। जब भी किसी बड़े अधिकारी को अपने मूल विभाग के साथ-साथ किसी दूसरे मंत्रालय, विभाग या पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (PSU) का 'अतिरिक्त प्रभार' (Additional Charge) मिलता था, तो उनके काफिले में गाड़ियों की संख्या भी दोगुनी हो जाती थी। लेकिन नए नियमों ने इस खेल को पूरी तरह खत्म कर दिया है। नए आदेश के मुताबिक, अब किसी भी अधिकारी को सिर्फ इसलिए दूसरी चमचमाती सरकारी गाड़ी नहीं दी जा सकती क्योंकि उनके पास अतिरिक्त जिम्मेदारी है। चाहे अधिकारी के पास दो विभागों का काम हो या तीन का, उन्हें सिर्फ और सिर्फ उसी एक स्टाफ़ कार से सफर करना होगा जो उन्हें उनके मूल विभाग से आवंटित की गई है। इस नियम के आते ही विभागों में यह देखने की होड़ मच गई है कि कौन सा अधिकारी अब तक कितनी गाड़ियों का मजा ले रहा था।

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PSU की गाड़ियों पर सख्त पहरा: आखिर कहां हो रहा था इनका गुप्त इस्तेमाल?

इस नए मेमोरेंडम में एक और ऐसा क्लॉज शामिल है जिसने कई अफसरों की रातों की नींद उड़ा दी है। अक्सर देखा जाता था कि केंद्र सरकार के अधिकारी अपने रसूख के दम पर विभिन्न PSU, स्वायत्त संस्थाओं या अर्ध-सरकारी संगठनों की गाड़ियों का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते थे। इन गाड़ियों का उपयोग कहाँ और किस काम के लिए हो रहा था, इसका कोई पुख्ता हिसाब-किताब नहीं था। सरकार ने अब इस पर पूरी तरह से पहरा बैठा दिया है। साफ कह दिया गया है कि जब तक कोई आधिकारिक काम या सरकार द्वारा स्वीकृत दौरा न हो, तब तक कोई भी अधिकारी इन संस्थाओं की गाड़ियों को छू भी नहीं सकता। मंत्रालयों को कड़े निर्देश दिए गए हैं कि वे अतिरिक्त या बिना इस्तेमाल पड़ी गाड़ियों को तुरंत अपने नियंत्रण में लें और उन्हें सुरक्षित रखें, ताकि उनका कोई भी गैर-सरकारी या निजी इस्तेमाल न कर सके।

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मास्टर ओएम (Master OM) का री-लोड: क्या टैक्सपेयर्स का पैसा अब पूरी तरह सुरक्षित है?

दरअसल, यह कोई पहली कोशिश नहीं है। इससे पहले 1 सितंबर 2022 को भी सरकार ने एक मास्टर ऑफिस मेमोरेंडम जारी किया था, जिसमें सरकारी दफ्तरों में स्टाफ़ कारों के इस्तेमाल से जुड़े नियमों की व्यापक समीक्षा की गई थी। लेकिन जमीनी स्तर पर लूपहोल्स का फायदा उठाया जा रहा था। अब, 2026 में सरकार ने इसे और अधिक आक्रामक और फुल-प्रूफ बनाकर दोबारा लागू किया है। व्यय विभाग का मानना है कि "एक हकदार अधिकारी, एक सरकारी गाड़ी" का यह सिद्धांत प्रशासनिक दक्षता में क्रांतिकारी सुधार लाएगा। इसका सीधा मकसद दोहराव को खत्म करना, सरकारी संसाधनों का समझदारी से आवंटन करना और वित्तीय अनुशासन को बढ़ावा देना है। देखना यह होगा कि इस सख्त रवैये के बाद क्या वाकई सरकारी परिवहन पर होने वाले करोड़ों रुपये के अनावश्यक खर्च पर लगाम लग पाती है, या फिर नियमों से बचने का कोई नया रास्ता निकाल लिया जाएगा!

सरकार का उद्देश्य क्या है?

व्यय विभाग के अनुसार इन संशोधित दिशानिर्देशों का मुख्य उद्देश्य सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग को रोकना, प्रशासनिक दक्षता बढ़ाना और सरकारी परिवहन पर होने वाले अनावश्यक खर्च को कम करना है। "एक हकदार अधिकारी, एक सरकारी गाड़ी" सिद्धांत से मंत्रालयों और विभागों में वाहन प्रबंधन अधिक व्यवस्थित होगा। साथ ही वित्तीय अनुशासन को बढ़ावा मिलेगा और सरकारी संपत्तियों के उपयोग में पारदर्शिता आएगी।

2022 के नियमों को मिला नया बल

गौरतलब है कि 1 सितंबर 2022 को जारी मास्टर ऑफिस मेमोरेंडम में केंद्र सरकार के कार्यालयों में स्टाफ कारों के उपयोग से जुड़े विभिन्न दिशा-निर्देशों को एकीकृत किया गया था। अब जारी नया आदेश उन्हीं नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर देता है। सरकार ने सभी मंत्रालयों और विभागों को स्पष्ट संदेश दिया है कि सरकारी वाहनों का उपयोग केवल निर्धारित नियमों के अनुरूप ही किया जाए और किसी भी प्रकार की अनियमितता या दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

क्या बदल जाएगी सरकारी व्यवस्था?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन निर्देशों का प्रभावी ढंग से पालन हुआ, तो सरकारी वाहनों के प्रबंधन में पारदर्शिता बढ़ेगी, फिजूलखर्ची पर अंकुश लगेगा और प्रशासनिक जवाबदेही मजबूत होगी। अब सबकी निगाह इस बात पर रहेगी कि मंत्रालय और विभाग इन नियमों को कितनी सख्ती से लागू करते हैं और क्या वास्तव में सरकारी संसाधनों के उपयोग में अपेक्षित बदलाव देखने को मिलता है।

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