भोटेकोशी बाढ़ में 1,100 से ज्यादा मौतों के बाद नेपाल ने भारत समेत दुनिया के कई बड़े देशों से मुआवजे के रूप में एक अलग ही डिमांड रखी है। नेपाल का कहना है कि हमने वो चीज भोगी, जिसके हम जिम्मेदार नहीं हैं।
नेपाल में 26 अगस्त को आई बाढ़ में अब तक 1100 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 5000 से ज्यादा लोग लापता हैं। इस बाढ़ से नेपाल को उसकी कुल अर्थव्यवस्था के लगभग दसवें हिस्से के बराबर नुकसान झेलना पड़ा है। इन सब चीजों को ध्यान में रखते हुए नेपाल ने अब दुनिया के तीन बड़े मुल्कों से मुआवजे की मांग रखी है। हालांकि, सबसे हैरानी वाली बात ये है कि यह मुआवजा कोई रुपए-पैसे को लेकर नहीं है।
क्या है मुआवजे में नेपाल की अनोखी डिमांड?
नेपाल ने जलवायु परिवर्तन से हुए नुकसान के लिए अमेरिका, भारत और चीन समेत बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों से ‘क्लाइमेट लॉस एंड डैमेज’ का मुआवजा मांगा है। नेपाल का कहना है कि वह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में बहुत कम योगदान देता है, लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के गंभीर असर का सामना कर रहा है। यह मांग ऐसे समय उठाई गई है, जब करीब एक सप्ताह पहले भोटेकोशी नदी में आई अचानक और जानलेवा बाढ़ ने नेपाल के कम से कम तीन जिलों के कई गांवों को तबाह कर दिया था।
तिब्बत-नेपाल सीमा से आई विनाशकारी बाढ़
पिछले सप्ताह तिब्बत-नेपाल सीमा के ऊंचाई वाले इलाके में ग्लेशियर टूटने के बाद बर्फीले पानी, चट्टानों और मलबे की एक विशाल लहर नीचे की ओर आई। इसके बाद भोटेकोशी नदी में अचानक बाढ़ आ गई और इसने रास्ते में आने वाले कई गांवों और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया। नेपाल अब इस आपदा को जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से जोड़ते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नुकसान और क्षति (Loss and Damage) के मुद्दे को मजबूती से उठाने की तैयारी कर रहा है।
नेपाल ने कहा- मदद नहीं, नैतिक जिम्मेदारी समझी जाए
अंतरराष्ट्रीय आर्थिक मदद हासिल करने के लिए नेपाल ने कूटनीतिक कोशिशें शुरू कर दी हैं। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा है कि आपदा के बाद मिलने वाली आर्थिक सहायता को सिर्फ ‘दान’ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक इसे नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी के तौर पर देखा जाना चाहिए। खनाल ने कांतिपुर टीवी को दिए एक इंटरव्यू में नेपाली भाषा में यह बात कही। इंटरव्यू के कुछ अंश ‘द काठमांडू पोस्ट’ और समाचार एजेंसी PTI ने पब्लिश किए हैं।
नेपाल का तर्क- कम उत्सर्जन, फिर भी जलवायु संकट की बड़ी कीमत
विदेश मंत्री ने कहा कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में नेपाल का योगदान बहुत कम है। इसके बावजूद देश ग्लोबल वार्मिंग के गंभीर परिणाम झेल रहा है। इनमें तेजी से पिघलते ग्लेशियर और हिमालयी क्षेत्रों में आने वाली विनाशकारी प्राकृतिक आपदाएं शामिल हैं। PTI द्वारा प्रकाशित इंटरव्यू के अंशों के अनुसार, खनाल ने कहा कि नेपाल ऐसे वैश्विक संकट की भारी कीमत चुका रहा है, जिसे उसने पैदा नहीं किया। उन्होंने ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और पहाड़ों में आने वाली विनाशकारी बाढ़ जैसी घटनाओं को वैश्विक जलवायु परिवर्तन से जोड़ा।
चीन, अमेरिका और भारत का किया जिक्र
विदेश मंत्री खनाल ने ग्रीनहाउस गैसों के बड़े उत्सर्जक देशों के रूप में चीन, अमेरिका और भारत का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि चीन दुनिया में सबसे ज्यादा उत्सर्जन करने वाला देश है, जबकि अमेरिका और भारत भी बड़े उत्सर्जकों में शामिल हैं। नेपाल का तर्क है कि जिन देशों का ऐतिहासिक और वर्तमान उत्सर्जन ज्यादा रहा है, उन्हें जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभाव झेल रहे कमजोर देशों की मदद के लिए आगे आना चाहिए।
हिमालयी ग्लेशियर खत्म हुए तो दक्षिण एशिया पर असर
खनाल ने हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के खतरे पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अगर हिमालय के ग्लेशियर खत्म हो जाते हैं तो दक्षिण एशिया के दो अरब से ज्यादा लोगों की पानी की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। इनमें गंगा और त्रिशूली जैसी नदियों पर निर्भर बड़ी आबादी शामिल है। नेपाल का कहना है कि वह सिर्फ अपने देश के लिए आवाज नहीं उठा रहा, बल्कि दक्षिण एशियाई सभ्यता के अस्तित्व से जुड़े सवाल को भी सामने रख रहा है।
भारत का जलवायु समानता पर क्या रुख है?
भारत लंबे समय से जलवायु समानता (Climate Equity) पर जोर देता रहा है। उसका कहना है कि जलवायु परिवर्तन से जुड़ी जिम्मेदारियां तय करते समय देशों के ऐतिहासिक उत्सर्जन, विकास की जरूरतों और उनकी क्षमता के बीच अंतर को ध्यान में रखा जाना चाहिए। भारत प्रति व्यक्ति उत्सर्जन कम होने का मुद्दा भी उठाता रहा है। उसका तर्क है कि विकसित देशों ने औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया में वैश्विक कार्बन बजट का बड़ा हिस्सा पहले ही इस्तेमाल कर लिया है।
नेपाल ने ‘Loss and Damage Fund’ से मांगी तत्काल मदद
‘द काठमांडू पोस्ट’ की रिपोर्ट के अनुसार, 26 अगस्त को भोटेकोशी नदी बेसिन में आई विनाशकारी अचानक बाढ़ के बाद नेपाल ने ‘लॉस एंड डैमेज’ से जुड़े फंड के बोर्ड से औपचारिक रूप से तत्काल वित्तीय सहायता की मांग की है। यह व्यवस्था 2022 में COP27 में बनाई गई थी और COP28 में इसे लागू किया गया था। इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के कारण कमजोर देशों को होने वाले नुकसान और क्षति से निपटने में वित्तीय मदद उपलब्ध कराना है।


