सऊदी अरब पर हूती हमलों के बीच पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने बड़ा संकेत दिया है। उन्होंने कहा कि हमले जारी रहे तो मक्का रक्षा समझौता सक्रिय हो सकता है। क्या पाकिस्तान अब सऊदी के लिए मध्य पूर्व की जंग में उतरेगा?

सऊदी अरब पर हूतियों के ताजा हमलों ने सिर्फ तेल ठिकानों को नहीं, बल्कि पाकिस्तान की नई सैन्य साझेदारी को भी पहली बड़ी परीक्षा के सामने खड़ा कर दिया है। 8 सितंबर को सऊदी के अबहा, खमिस मुशैत, जिजान और नजरान में हूतियों ने मिसाइल और ड्रोन हमले किए। 73 लोग घायल हुए और ऊर्जा प्रतिष्ठानों में आग लगने के साथ कुछ ऑपरेशन रोकने पड़े। जिजान की 4 लाख बैरल प्रतिदिन क्षमता वाली रिफाइनरी भी हमले की चपेट में आई।

अब पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के बयान ने इस संकट को और बड़ा सवाल दे दिया है, अगर सऊदी पर हमले जारी रहे तो क्या पाकिस्तान सीधे मध्य पूर्व की जंग में उतर सकता है?

ख्वाजा आसिफ ने क्या कहा?

ख्वाजा आसिफ ने कहा है कि पाकिस्तान अलर्ट पर है और अगर यमन का संघर्ष फैलता है तो पाकिस्तान, सऊदी और तुर्की के बीच हुआ मक्का संयुक्त रक्षा समझौता सक्रिय हो सकता है। यानी फिलहाल पाकिस्तान ने युद्ध में उतरने का ऐलान नहीं किया है, लेकिन उसने सैन्य मदद की संभावना को खुला रखा है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने भी हमलों की कड़ी निंदा करते हुए सऊदी की संप्रभुता और अपनी सुरक्षा के अधिकार का समर्थन किया है।

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क्या है मक्का डिफेंस पैक्ट?

7 अगस्त 2026 को सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसकी सबसे अहम शर्त है कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला बाकी दोनों पर हमला माना जाएगा। समझौते में रक्षा सहयोग, संयुक्त सैन्य अभ्यास और सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करने की बात भी है। इसी वजह से इसे NATO के Article 5 जैसी सामूहिक रक्षा व्यवस्था से जोड़ा जा रहा है। हालांकि तुर्की ने स्पष्ट किया था कि यह समझौता किसी एक देश के खिलाफ बनाया गया सैन्य गठबंधन नहीं है और वास्तविक मदद परिस्थितियों तथा संबंधित देश के अनुरोध पर निर्भर करेगी।

अब सबसे बड़ा सवाल, पाकिस्तान करेगा क्या?

सऊदी पर हुए हमले ने इस नए गठबंधन को कागज से जमीन पर उतरने की स्थिति में ला दिया है। हालांकि पाकिस्तान ने अभी हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू करने की घोषणा नहीं की है। अगर यमन का संघर्ष सऊदी की सीमा और महत्वपूर्ण ऊर्जा ठिकानों पर लगातार असर डालता है, तो इस समझौते की वास्तविक भूमिका पर दबाव बढ़ सकता है। यही वजह है कि ख्वाजा आसिफ का बयान आने वाले दिनों में मध्य पूर्व की रणनीति के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।

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