Iran and US Move Closer to a Deal: ईरान और अमेरिका के बीच समझौता अंतिम रूप लेने में समय क्यों लग सकता है? JCPOA क्या था और यह कब लागू हुआ था? 2015 की ईरान न्यूक्लियर डील क्यों टूट गई थी?
दुनिया की सबसे जटिल कूटनीतिक कहानियों में अगर किसी रिश्ते का नाम लिया जाए तो उसमें अमेरिका और ईरान जरूर शामिल होंगे। दोनों देशों के बीच तनाव, प्रतिबंध, परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय राजनीति के मुद्दे दशकों से विवाद की वजह रहे हैं। ऐसे में हालिया समझौते पर हस्ताक्षर को भले ही बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जा रहा हो, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि असली चुनौती अभी बाकी है।

साइन के बाद शुरू होगी असली बातचीत
रिपोर्टों के अनुसार, 17 जून को दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने एक समझौता ज्ञापन (MOU) पर हस्ताक्षर किए हैं। हालांकि यह अंतिम समझौता नहीं है। अब परमाणु कार्यक्रम, यूरेनियम नियंत्रण, होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा, आर्थिक प्रतिबंधों और वित्तीय दावों जैसे कई संवेदनशील मुद्दों पर विस्तृत चर्चा होगी। इन विषयों पर सहमति बनाना आसान नहीं होगा। लेबनान स्थित एकेडमिक और पश्चिम एशिया मामलों के जानकार रमी खूरी का भी मानना है कि प्रस्तावित 60 दिनों की समयसीमा से अधिक वक्त लग सकता है।
2015 की परमाणु डील बनने में लगे थे कई साल
ईरान और अमेरिका के बीच कूटनीतिक प्रक्रिया पहले भी लंबी रही है। वर्ष 2015 में हुई चर्चित परमाणु डील, जिसे जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) कहा गया, अचानक नहीं बनी थी। इसकी बातचीत 2013 से शुरू हुई थी और जनवरी 2016 में जाकर इसे लागू किया गया। इस समझौते में सिर्फ अमेरिका और ईरान ही नहीं, बल्कि चीन, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी भी शामिल थे। उस समय इसे पश्चिम एशिया में स्थिरता की दिशा में बड़ा कदम माना गया था।
क्यों टूट गई थी पिछली डील?
JCPOA को लंबी अवधि के लिए तैयार किया गया था, लेकिन अमेरिकी राजनीति में बदलाव ने इसकी दिशा बदल दी। 2018 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को इस समझौते से अलग कर लिया। उनका तर्क था कि यह समझौता ईरान की मिसाइल गतिविधियों और क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करने में पर्याप्त नहीं है। इसके बाद दोनों देशों के बीच अविश्वास बढ़ता गया। प्रतिबंध, जवाबी कदम और क्षेत्रीय संघर्षों ने हालात को और जटिल बना दिया। कई दौर की वार्ताएं हुईं, लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सका।
क्या इस बार नतीजा अलग होगा?
हालिया समझौते ने उम्मीद जरूर जगाई है, लेकिन इतिहास बताता है कि ईरान और अमेरिका के बीच किसी भी समझौते का रास्ता लंबा और कठिन होता है। कागज पर हस्ताक्षर करना पहला कदम है, जबकि वास्तविक सफलता उन जटिल मुद्दों पर निर्भर करेगी जिन पर आने वाले महीनों में बातचीत होनी है। दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या दोनों देश इस बार स्थायी सहमति तक पहुंच पाएंगे या फिर यह कोशिश भी पिछले प्रयासों की तरह अधूरी रह जाएगी।


