Kanha Ji Ki Chhathi 2026 Kab Hai: हर साल जन्माष्टमी के 6 दिन बाद कान्हा जी का छठी उत्सव मनाया जाता है। इस दिन कान्हा जी को कढ़ी का भोग विशेष रूप से लगाया जाता है। इस परंपरा के पीछे एक रोचक कथा भी है।
Kanha Ji Ki Chhathi Ka Bhog: भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद घर-घर में उनकी छठी का उत्सव मनाने की परंपरा है। इस दिन लड्डू गोपाल को नए कपड़े पहनाकर उनका श्रृंगार किया जाता है और तरह-तरह के पकवानों का भोग लगाया जाता है। इस बार कुछ स्थानों पर कान्हा जी का छठी उत्सव 9 सितंबर को तो कुछ स्थानों पर 10 सितंबर को मनाया जा रहा है। इस दिन कान्हा जी को कढ़ी-चावल का भोग लगाने की परंपरा सबसे खास मानी जाती है। इसके पीछे एक लोकमान्यता और कथा भी जुड़ी हुई है। आगे जानिए
छठी पर कढ़ी-चावल ही क्यों बनाते हैं?
प्रचलित कथा के अनुसार, वृंदावन में कान्हाजी के एक बहुत बड़े भक्त थे। उन्होंने एक बार छठी उत्सव के मौके पर कान्हाजी के लिए तरह-तरह के भोग बनवाएं। आमतौर पर भोग में सबसे आगे मिठाई रखी जाती है लेकिन उन्होंने गलती से सबसे आगे कढ़ी रख दी और मिठाई को पीछे रख दिया। भोग लगाने के कुछ बाद बाद जब वे लौटे तो उन्होंने देखा कि कान्हाजी का प्रतिमा अपने स्थान पर नहीं है। बहुत ढूंढने पर भी जब कान्हाजी की प्रतिमा नहीं मिली तो वे उदास हो गए। जब वे भोग उठाने लगे तो देखा कि कान्हाजी की प्रतिमा को कढ़ी में है। तब से ऐसा कहा जाता है कि कान्हा जी को कढ़ी अति प्रिय है और तभी से छठी उत्सव के मौके पर कान्हा जी को कढ़ी-चावल का भोग विशेष रूप से लगाया जाता है।
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क्यों खास है कढ़ी-चावल?
कढ़ी-चावल को घर के बने सात्विक और सरल भोजन के रूप में देखा जाता है। मान्यता है कि कान्हा को यह भोग लगाने से घर में सुख-शांति आती है और परिवार पर भगवान श्रीकृष्ण की कृपा बनी रहती है। कढ़ी को दही और बेसन से तैयार किया जाता है, जबकि चावल अन्न का प्रतीक माने जाते हैं। इसलिए इस भोग को समृद्धि, शुद्धता और घर में अन्न की कमी न होने से भी जोड़कर देखा जाता है।
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आज भी निभाई जाती है ये परंपरा
आज भी कई घरों में कान्हा जी की छठी के दिन कढ़ी-चावल जरूर बनाए जाते हैं। पहले लड्डू गोपाल का स्नान और श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद पूजा करके कढ़ी-चावल समेत अन्य पकवानों का भोग लगाया जाता है। भोग के बाद इसे प्रसाद के रूप में परिवार और आसपास के लोगों में बांटा जाता है।
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