Lord Krishna Last Story: महाभारत के बाद कृष्ण के जीवन में क्या हुआ था? कान्हा के जन्मोत्सव के अवसर पर जानिए भगवान श्रीकृष्ण की अंतिम लीला से जुड़ी पौराणिक कथा।
Krishna Last Leela: बालपन में माखन चुराना, गोपियों संग रास रचाना और कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को गीता का ज्ञान देना.. भगवान श्रीकृष्ण का पूरा जीवन अद्भुत घटनाओं से भरा रहा। आज 4 सितंबर को जब देश-दुनिया में कान्हा के जन्मदिन का उत्सव जोरों पर है, तब उनके बचपन से लेकर महाभारत तक के किस्सों को याद किया जा रहा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद श्रीकृष्ण के जीवन में क्या हुआ था? द्वारकाधीश ने धरती पर अपना अंतिम समय कैसे और कहां बिताया था और भगवान की आखिरी लीला क्या थी?
महाभारत युद्ध के बाद श्रीकृष्ण के जीवन में क्या हुआ था?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, कुरुक्षेत्र की लड़ाई खत्म होने के बाद हस्तिनापुर की गद्दी पर युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हुआ। कृष्ण वापस अपनी बसाई स्वर्ण नगरी द्वारका लौट आए और यादव वंश के साथ करीब 36 सालों तक रहे। लेकिन समय के साथ एक ऐसी घटना हुई, जिसने पूरे यादव वंश की दिशा बदल दी।
गांधारी का शाप और ऋषियों का क्रोध
भागवत महापुराण के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद अपने 100 बेटों की लाशें देखकर गांधारी का कलेजा फट गया था। उन्होंने इस विनाश का जिम्मेदार कृष्ण को मानते हुए शाप दिया था, 'जिस तरह मेरे कुल का नाश हुआ, उसी तरह तुम्हारी आंखों के सामने तुम्हारा पूरा यदुवंश आपस में लड़कर खत्म हो जाएगा।' एक कहानी के अनुसार, महाभारत के बाद जब कृष्ण द्वारका पहुंचे, तो समय बीतने के साथ यदुवंशी युवक अहंकारी हो गए। उन्होंने एक बार दुर्वासा और अन्य ऋषियों का उपहास उड़ाया। ऋषियों ने शाप दिया कि श्रीकृष्ण का एक पुत्र ऐसे मूसल को जन्म देगा, जो पूरे वंश के काल का कारण बनेगा।
द्वारका का पतन, आपस में ही भिड़ गए यदुवंशी
ऋषियों के शाप से उपजे लोहे के मूसल को राजा उग्रसेन ने समुद्र में घिसवाकर फिंकवा दिया। उस चूरे से प्रभास तीर्थ (वर्तमान गुजरात के सोमनाथ के पास) के किनारे जहरीली 'एरका' नाम की घास उग आई। एक दिन उत्सव के दौरान सभी यदुवंशी मदिरा के नशे में धुत होकर आपस में ही पुराने गिले-शिकवे निकालने लगे। बात इतनी बिगड़ी कि उन्होंने किनारे उगी उसी धारदार घास को उखाड़कर एक-दूसरे पर हमला कर दिया। देखते ही देखते प्रद्युम्न, सांब और सभी वीर आपस में कट मरे। श्रीकृष्ण और बलराम चाहकर भी नियति के इस चक्र को नहीं रोक सके, क्योंकि शाप पूरा होना ही था। बलराम जी ने समुद्र किनारे शेषनाग रूप धारण कर देह त्याग दी।
भगवान श्रीकृष्ण की अंतिम लीला
पूरे कुल के विनाश के बाद श्रीकृष्ण समझ गए कि अब पृथ्वी पर उनके अवतार का उद्देश्य पूरा हो चुका है। वे प्रभास क्षेत्र के पास हिरण नदी के किनारे एक पीपल के पेड़ की छांव में योगनिद्रा में विश्राम करने लगे। भगवान अपने बाएं पैर पर दायां पैर रखकर लेटे हुए थे। उनके तलवे पर बना लाल पद्म चमक रहा था। दूर झाड़ियों के पीछे खड़े 'जरा' नाम के बहेलिए को लगा कि वहां कोई हिरण बैठा है। शिकारी ने बिना सोचे-समझे तीर छोड़ दिया। वह बाण सीधे श्रीकृष्ण के पैर के तलवे में जा लगा। मूसल का बचा हुआ अंतिम टुकड़ा उसी तीर की नोक पर लगा हुआ था। जब शिकारी पास पहुंचा और उसने देखा कि उसने किसे तीर मार दिया, तो वह थर-थर कांपते हुए भगवान के चरणों में गिर पड़ा। भगवान ने मुस्कुराकर उसे गले लगाया और बोले, 'डरो मत, ये मेरी ही मर्जी थी। त्रेतायुग में मैं राम था और तुम वानरराज बाली थे, ये केवल कर्म का हिसाब पूरा हुआ है।' इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य रूप में वैकुंठ धाम लौट गए। भगवान के जाते ही समुद्र की विकराल लहरों में द्वारका समां गई।


