The New York Times ने BRICS समिट को बदलती वैश्विक व्यवस्था की झलक बताया और पूछा कि विकासशील दुनिया की आवाज कौन बनेगा—नरेंद्र मोदी या शी जिनपिंग. 24 सितंबर को White House में Donald Trump से शी की मुलाकात तय है. वाशिंगटन पोस्ट/एपी ने 11-सदस्यीय समूह की भिन्न प्राथमिकताओं और भारत के संतुलन पर जोर दिया.
BRICS Summit 2026 India: भारत की मेजबानी में हो रहे 18वें BRICS शिखर सम्मेलन को अमेरिकी मीडिया बदलती वैश्विक व्यवस्था के एक अहम संकेत के तौर पर देख रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव, अमेरिका-चीन की बढ़ती प्रतिस्पर्धा और वैश्विक अर्थव्यवस्था की अनिश्चितता के बीच नई दिल्ली में जुटे नेताओं के सामने कई बड़े सवाल हैं।
अमेरिका के प्रमुख अखबारों की रिपोर्टों में एक सवाल खास तौर पर उभरकर सामने आया है—विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ की सबसे प्रभावशाली आवाज कौन बनेगा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग?
मोदी का ‘ओपन BRICS’ मॉडल, चीन की अलग रणनीति
The New York Times के मुताबिक, भारत BRICS को एक ऐसे खुले मंच के रूप में आगे बढ़ाना चाहता है, जहां अलग-अलग देशों के हितों और प्राथमिकताओं को जगह मिल सके। वहीं चीन की रणनीति BRICS को अमेरिकी प्रभाव के मुकाबले एक मजबूत वैश्विक मंच के रूप में स्थापित करने की मानी जा रही है।
यही अंतर दोनों देशों की BRICS को लेकर सोच को अलग बनाता है। भारत एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने रिश्ते मजबूत कर रहा है, वहीं रूस, चीन और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ भी साझेदारी बनाए रखना चाहता है।
युद्ध, टैरिफ और AI ने बदली दुनिया की कूटनीतिक गणित
यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के अलावा ऊर्जा की ऊंची कीमतें, अमेरिकी टैरिफ और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े बदलावों ने वैश्विक राजनीति को नई दिशा दी है।
कई देश अब अमेरिका और चीन के साथ अपने संबंधों का दोबारा आकलन कर रहे हैं। वॉशिंगटन स्थित Stimson Center के China Program की डायरेक्टर Yun Sun के अनुसार, चीन लंबे समय से भारत के अमेरिका की ओर झुकाव को लेकर सतर्क रहा है। ऐसे में बीजिंग भारत के साथ संबंध सुधारने का अवसर आसानी से छोड़ना नहीं चाहेगा।
7 साल बाद भारत पहुंचे शी जिनपिंग, क्यों अहम है यह दौरा?
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भारत दौरा कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह करीब सात साल बाद उनकी भारत यात्रा है और ऐसे समय हो रही है, जब 2020 की सीमा झड़प के बाद दोनों देशों के रिश्तों में लंबे समय तक तनाव रहा।
2024 से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक स्तर पर धीरे-धीरे बातचीत बढ़ी है। BRICS Summit के दौरान दोनों देशों के शीर्ष नेताओं की मौजूदगी को भारत-चीन संबंधों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अमेरिका से अनिश्चित रिश्तों ने भारत-चीन को दिया बातचीत का मौका?
The Wall Street Journal ने अपने आकलन में कहा कि अमेरिका के साथ भारत और चीन के संबंधों में बनी अनिश्चितता दोनों एशियाई शक्तियों के लिए तनाव कम करने का एक अवसर पैदा कर सकती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के साथ भारत के संबंधों में रूसी तेल खरीद समेत कुछ मुद्दों पर तनाव देखने को मिला है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में अपनी विदेश नीति को नए सिरे से संतुलित करने की कोशिश कर रहा है।
हालांकि, भारत और चीन के बीच सीमा विवाद, पाकिस्तान के साथ चीन की करीबी और हिंद महासागर में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियां अब भी मौजूद हैं। इसलिए दोनों देशों के बीच रिश्तों में सुधार की संभावनाओं के साथ सीमाएं भी बनी हुई हैं।
11 देशों वाले BRICS में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या?
The Washington Post में प्रकाशित Associated Press की रिपोर्टों के अनुसार, विस्तारित BRICS के 11 सदस्य देश वैश्विक व्यवस्था में अपनी भूमिका और प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन इन देशों की राजनीतिक व्यवस्था, आर्थिक हित और विदेश नीति की प्राथमिकताएं एक-दूसरे से काफी अलग हैं।
यही विविधता भारत के लिए चुनौती भी है। ग्लोबल साउथ के देशों को एक साझा मंच पर लाना आसान नहीं है, क्योंकि हर सदस्य की अपनी रणनीतिक प्राथमिकताएं हैं। भारत के रूस और ईरान के साथ पुराने संबंध हैं, जबकि अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ उसकी साझेदारी भी लगातार मजबूत हुई है।
पुतिन, पेजेश्कियान और शी की मौजूदगी ने बढ़ाया समिट का महत्व
BRICS Summit में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग समेत कई बड़े नेताओं की मौजूदगी ने नई दिल्ली की बैठक को खास बना दिया है।
समिट से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुतिन और पेजेश्कियान के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय बैठकें भी कीं। इससे साफ है कि भारत BRICS मंच का इस्तेमाल सिर्फ बहुपक्षीय चर्चा के लिए नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण द्विपक्षीय कूटनीतिक संपर्कों के लिए भी कर रहा है।
नई दिल्ली की बैठक से बदलेगी भारत-चीन की तस्वीर?
BRICS Summit के बीच भारत और चीन के रिश्तों को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि क्या दोनों देशों के बीच मौजूदा कूटनीतिक नरमी आगे भी जारी रहेगी।भारत खुले और सहयोग आधारित BRICS पर जोर दे रहा है, जबकि चीन की प्राथमिकताएं अमेरिकी प्रभाव को चुनौती देने वाले वैश्विक ढांचे से भी जुड़ी हैं। ऐसे में नई दिल्ली की बातचीत के बाद आने वाले महीनों में बीजिंग और नई दिल्ली के फैसले ही बताएंगे कि यह नजदीकी वास्तविक बदलाव है या सिर्फ मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों की कूटनीतिक जरूरत।
