अदालत का सबसे बड़ा झटका! जंतर-मंतर CJP प्रदर्शन और पुलिस लाठीचार्ज के बाद जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचे छात्र, तो न्यायधीशों ने कह दी ऐसी बात जिसने उड़ा दिए सबके होश। आखिर अदालत ने "समय बर्बाद न करें" क्यों कहा? अब जांच और सुनवाई पर सबकी नजरें हैं।

नई दिल्ली: प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित धांधली और NEET पेपर लीक विवाद को लेकर देश की राजधानी दिल्ली में भड़का आक्रोश अब सड़कों से लेकर देश की सर्वोच्च अदालतों तक पहुंच चुका है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के बैनर तले सोमवार को हुए संसद मार्च और उस पर हुए पुलिस लाठीचार्ज के बाद कानूनी गलियारों में भारी हलचल है। एक तरफ जहां दिल्ली की सड़कों पर नीले रंग की दंगा-रोधी वर्दी में पुलिस और प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच हिंसक झड़पें देखने को मिलीं, वहीं दूसरी तरफ इस मामले को लेकर जब वकील सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, तो उन्हें देश की शीर्ष अदालत से एक बेहद अप्रत्याशित और सख्त संदेश मिला।

जंतर-मंतर पर क्या हुआ था, जिसने पूरे विवाद को जन्म दिया?

सोमवार को हजारों छात्र और प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च निकालने की कोशिश कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें और परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार किए जाएं। पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था का हवाला देते हुए मार्च को रोक दिया। इसके बाद प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव बढ़ गया। आरोप है कि भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने बल प्रयोग किया, जिससे कई प्रदर्शनकारी घायल हुए। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो और तस्वीरों ने इस कार्रवाई को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी।

"हमारा और अपना समय बर्बाद न करें": सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा?

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर हुई कथित पुलिस बर्बरता का मामला जैसे ही सुप्रीम कोर्ट के सामने आया, अदालत का रुख बेहद कड़ा और स्पष्ट था। याचिकाकर्ता के वकील ने जब दिल्ली पुलिस द्वारा छात्रों की बेरहमी से की गई खिंचाई और लाठीचार्ज का लाइव वीडियो साक्ष्य अदालत के सामने पेश करने की अनुमति मांगी, तो मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने उसे सिरे से खारिज कर दिया। चीफ जस्टिस ने बेहद सख्त लहजे में टिप्पणी करते हुए कहा, "हम कोई वीडियो नहीं देखना चाहते। हमारा और अपना समय बर्बाद न करें।" अदालत के इस कड़े और रूखे जवाब ने याचिकाकर्ताओं को स्तब्ध कर दिया। जहाँ एक तरफ CJP के प्रवक्ता इस पूरे घटनाक्रम को 'भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे शर्मनाक दिन' करार दे रहे हैं, वहीं देश की सबसे बड़ी अदालत का यह रुख इस बात का संकेत है कि न्यायपालिका इन मामलों में दखल देने से पहले प्रक्रियात्मक सीमाओं को सर्वोपरि रख रही है।

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हाईकोर्ट का भी झटका: "अदालत को इन सब मामलों में न घसीटें"

सुप्रीम कोर्ट से झटका लगने के ठीक बाद, दिल्ली हाईकोर्ट में भी इस मामले को लेकर एक आपातकालीन याचिका दायर कर तत्काल सुनवाई की गुहार लगाई गई। इस जनहित याचिका (PIL) में शहर की पुलिस द्वारा छात्रों और नागरिकों के खिलाफ "ज़रूरत से ज़्यादा बल" के इस्तेमाल का आरोप लगाया गया था। लेकिन यहां भी प्रदर्शनकारियों के हाथ निराशा ही लगी। मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने याचिका को तत्काल (Urgent) श्रेणी में सूचीबद्ध करने से साफ इनकार कर दिया। पीठ ने याचिकाकर्ता को दो टूक शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा, "अदालत को इन सब मामलों में न घसीटें।" हालांकि, हाईकोर्ट ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए इसे नियमित सुनवाई के लिए बुधवार को सूचीबद्ध करने के निर्देश दिए हैं। अदालतों का यह रवैया साफ करता है कि कानून व्यवस्था से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर न्यायिक सक्रियता की भी एक तय सीमा है।

21वें दिन का रहस्य: सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल और वो आधी रात की कार्रवाई

अदालत में दायर इस याचिका में कई ऐसे चौंकाने वाले और रहस्यमयी दावे किए गए हैं, जो पिछले कुछ दिनों से जंतर-मंतर के पर्दे के पीछे चल रहे घटनाक्रम पर से पर्दा उठाते हैं। याचिका के अनुसार, विख्यात एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक और कई अन्य छात्रों ने शिक्षा प्रणाली में सुधार और NEET पेपर लीक के खिलाफ 28 जून से जंतर-मंतर पर एक अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। दावा किया गया है कि 17 जुलाई तक यह आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण था। लेकिन असली सस्पेंस 18 जुलाई की रात को शुरू हुआ, जब भूख हड़ताल के 21वें दिन भारी संख्या में पुलिस बल प्रदर्शन स्थल में दाखिल हुआ। सरकार का कहना है कि सोनम वांगचुक को गंभीर मेडिकल कारणों से सफदरजंग अस्पताल शिफ्ट किया गया था, लेकिन याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह विरोध स्थल को जबरन खाली कराने और शांतिपूर्ण सभा को तितर-बितर करने की एक सोची-समझी पुलिसिया रणनीति थी।

याचिका में लगाए गए कौन-कौन से आरोप?

याचिका में दावा किया गया है कि जंतर-मंतर पर छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के नेतृत्व में शिक्षा सुधार और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता की मांग को लेकर शांतिपूर्ण धरना चल रहा था।याचिकाकर्ता का आरोप है कि 18 जुलाई को पुलिस ने प्रदर्शन स्थल खाली कराया, कई लोगों को हिरासत में लिया और आवश्यकता से अधिक बल का इस्तेमाल किया। इसके अलावा प्रदर्शनकारियों को कथित रूप से विरोध जारी रखने से रोका गया। याचिका में यह भी कहा गया है कि यह मामला केवल किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता से जुड़ा प्रश्न है।

CJP और प्रदर्शनकारियों का क्या कहना है? स्वतंत्र जांच की मांग पर टिकीं नजरें

याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह है कि 18 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुई पुलिसिया कार्रवाई केवल किसी व्यक्ति विशेष का मामला नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक को मिलने वाली संवैधानिक आज़ादी और शांतिपूर्ण असहमति (Democratic Dissent) के अधिकार पर एक बड़ा आघात है। इस PIL का मुख्य उद्देश्य दिल्ली पुलिस कमिश्नर को यह निर्देश दिलाना है कि वे इस पूरे बल प्रयोग, प्रदर्शनकारियों को जबरन हिरासत में लेने और भूख हड़ताल में बाधा डालने की घटनाओं की एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराएं। अब बुधवार को हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं कि क्या अदालत इस मामले में पुलिस प्रशासन से जवाब तलब करेगी या प्रदर्शनकारियों की मुश्किलें और बढ़ेंगी।

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