BRICS Summit 2026: भारत 12 September 2026 को नई दिल्ली में BRICS शिखर बैठक की मेजबानी कर रहा है और 4वीं बार चेयर है। समूह पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती देना चाहता है, लेकिन S Jaishankar के शब्दों में “गैर-पश्चिमी होना पश्चिम-विरोधी होना नहीं है।” ब्राज़ील, रूस, चीन, ईरान और नए सदस्य अलग-अलग रास्ते चुनते हैं।
India Role in BRICS: नई दिल्ली में 12 सितंबर 2026 को BRICS शिखर बैठक हो रही है और भारत चौथी बार इस समूह की अध्यक्षता कर रहा है। इसी बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या BRICS धीरे-धीरे चीन और रूस के नेतृत्व वाले ‘पश्चिम-विरोधी’ गुट में बदल रहा है? हालांकि, BRICS के सदस्य देशों की नीतियों और प्राथमिकताओं को देखें तो तस्वीर इतनी सीधी नहीं है।
समूह के अधिकांश देश इस बात पर सहमत हैं कि वैश्विक संस्थाओं में उभरती अर्थव्यवस्थाओं को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। लेकिन अमेरिका और यूरोप के साथ संबंधों को लेकर सभी देशों की सोच अलग है। कुछ देश मौजूदा व्यवस्था में अधिक प्रभाव चाहते हैं, कुछ रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर देते हैं, जबकि रूस और ईरान जैसे देश पश्चिम के साथ ज्यादा टकराव की स्थिति में हैं।
भारत का रुख क्या है? गैर-पश्चिमी, लेकिन पश्चिम-विरोधी नहीं
भारत की विदेश नीति को समझने के लिए ‘गैर-पश्चिमी’ और ‘पश्चिम-विरोधी’ के बीच अंतर महत्वपूर्ण है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर कई मौकों पर कह चुके हैं कि भारत गैर-पश्चिमी हो सकता है, लेकिन इसका मतलब पश्चिम-विरोधी होना नहीं है।
भारत अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ व्यापार, तकनीक, निवेश और रक्षा संबंध लगातार मजबूत कर रहा है। दूसरी तरफ, वह BRICS में भी सक्रिय भूमिका निभाता है और वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने की कोशिश करता है।
BRICS और Quad में भारत की एक साथ मौजूदगी इसी रणनीतिक स्वायत्तता को दिखाती है। भारत अलग-अलग मंचों को एक-दूसरे के विरोधी खेमे के तौर पर नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के माध्यम के रूप में देखता है।
भारत BRICS से क्या हासिल करना चाहता है?
भारत का जोर संयुक्त राष्ट्र, IMF और World Bank जैसी वैश्विक संस्थाओं में सुधार पर है। उसका मानना है कि इन संस्थाओं में विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को उनकी वर्तमान आर्थिक और जनसंख्या संबंधी स्थिति के अनुरूप ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
यानी भारत BRICS का इस्तेमाल पश्चिम से टकराव के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने के लिए करना चाहता है। यही वजह है कि भारत की BRICS नीति को सीधे ‘Anti-West’ नजरिए से देखना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।
ब्राजील का रुख भी टकराव के बजाय संतुलन वाला
ब्राजील लंबे समय से वैश्विक संस्थाओं में सुधार और शक्ति-संतुलन की मांग करता रहा है। हालांकि, वह अमेरिका के साथ सीधा टकराव नहीं चाहता। उसका जोर बहुपक्षवाद, अंतरराष्ट्रीय कानून और मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने पर रहा है।
मौद्रिक सहयोग के मामले में ब्राजील राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार और सस्ते सीमा-पार भुगतान जैसे विकल्पों का समर्थन कर सकता है, लेकिन पूरी तरह ‘डॉलर से मुक्ति’ को वैचारिक लक्ष्य बनाने के पक्ष में नहीं रहा है।
चीन, रूस और ईरान का रुख क्यों अलग है?
BRICS में चीन और रूस का रुख भारत और ब्राजील की तुलना में ज्यादा चुनौतीपूर्ण दिखाई देता है। रूस और पश्चिम के बीच यूक्रेन युद्ध, NATO और प्रतिबंधों को लेकर गहरा टकराव है। हालांकि, मॉस्को का लक्ष्य केवल मौजूदा व्यवस्था को खारिज करना नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में अपने लिए बड़ी भूमिका हासिल करना भी है।
चीन भी एशिया में अमेरिकी प्रभाव को चुनौती देता है और संवेदनशील तकनीक, वित्त तथा रणनीतिक क्षेत्रों में पश्चिमी प्रतिबंधों से अपने जोखिम कम करना चाहता है। वह BRICS को अधिक प्रतिनिधित्व वाली वैश्विक व्यवस्था के मंच के तौर पर पेश करता है। हालांकि, चीन की अर्थव्यवस्था खुद पश्चिमी बाजार, पूंजी और तकनीक से गहराई से जुड़ी रही है। इसलिए उसका लक्ष्य पूरी व्यवस्था से बाहर निकलना नहीं, बल्कि उसके नियमों और संस्थाओं पर अपना प्रभाव बढ़ाना भी माना जाता है।
ईरान इस समूह में पश्चिम-विरोधी रुख के सबसे करीब दिखाई देता है। अमेरिका के साथ लंबे समय से उसका तनाव और प्रतिबंधों की स्थिति BRICS को उसके लिए आर्थिक और कूटनीतिक विकल्पों का महत्वपूर्ण मंच बनाती है।
नए सदस्य BRICS की तस्वीर को और जटिल बनाते हैं
BRICS के विस्तार के बाद इसे सिर्फ चीन-रूस केंद्रित या पश्चिम-विरोधी समूह मानना और मुश्किल हो गया है। मिस्र के अमेरिका के साथ महत्वपूर्ण सुरक्षा संबंध हैं। UAE के अमेरिका और यूरोप के साथ मजबूत कारोबारी, वित्तीय और रणनीतिक रिश्ते हैं।
इंडोनेशिया भी लंबे समय से ‘मुक्त और सक्रिय’ विदेश नीति का पालन करता आया है। उसका लक्ष्य किसी एक शक्ति के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय अलग-अलग देशों के बीच अपने रणनीतिक हितों के लिए जगह बनाए रखना है।
BRICS की असली एकजुटता आखिर किस मुद्दे पर है?
BRICS के भीतर देशों के बीच मतभेदों के बावजूद एक साझा बिंदु जरूर दिखाई देता है—वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार की मांग। सदस्य देश चाहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र, IMF और World Bank जैसी संस्थाओं में उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आवाज ज्यादा मजबूत हो।
इसलिए BRICS को केवल ‘पश्चिम-विरोधी गुट’ कहना शायद इसकी जटिलता को कम करके आंकना होगा। भारत रणनीतिक स्वायत्तता चाहता है, ब्राजील संतुलन और बहुपक्षवाद पर जोर देता है, चीन वैश्विक व्यवस्था में ज्यादा प्रभाव चाहता है, जबकि रूस और ईरान पश्चिम के साथ ज्यादा टकराव की स्थिति में हैं।
यही अलग-अलग हित BRICS को एक पारंपरिक सैन्य या वैचारिक गठबंधन बनने से रोकते हैं और इसे एक ऐसे मंच में बदलते हैं, जहां सदस्य देश साझा आर्थिक और वैश्विक मुद्दों पर साथ आते हैं, लेकिन अपनी-अपनी विदेश नीति को स्वतंत्र रखते हैं।