Banqiao Dam Collapse 1975: एक रात, 62 बांध और 2.3 लाख मौतें! आखिर चीन ने 20 साल तक दुनिया से क्यों छिपाया बैंकाओ डैम का खौफनाक सच? दशकों बाद नेपाल बाढ़ ने फिर सवाल खड़े किए-क्या समय पर चेतावनी न मिलने से इतिहास दोहराया जा रहा है? जानिए इस छिपी तबाही की पूरी दास्तान।
China Banqiao Dam Disaster: नेपाल-चीन सीमा पर हालिया विनाशकारी बाढ़ के बाद चीन की करीब पांच दशक पुरानी बैंकाओ बांध त्रासदी (Banqiao Dam Disaster) एक बार फिर चर्चा में है। 1975 में चीन के हेनान (Henan) प्रांत में बैंकाओ (Banqiao) और शिमंतन (Shimantan) समेत दर्जनों बांध और जलाशय टूट गए थे। अलग-अलग स्रोतों में मृतकों की संख्या को लेकर काफी अंतर है। एक अकादमिक अध्ययन ने सीधे बाढ़ से करीब 26,000 मौतों का अनुमान लगाया, जबकि बाद की भूख और बीमारी से होने वाली मौतों को जोड़ने पर आंकड़ा करीब 1.25 लाख तक पहुंच सकता है। वहीं, ह्यूमन राइट्स वॉच (Human Rights Watch) द्वारा उद्धृत चीनी विशेषज्ञों ने कुल मौतों का अनुमान 2.3 लाख तक बताया था।
वह रात जब पानी ने सब कुछ निगल लिया
7 अगस्त 1975 की रात हालात तेजी से बिगड़ने लगे। टाइफून नीना (Typhoon Nina) के कारण Henan में असाधारण बारिश हुई थी। अध्ययन के मुताबिक, 5 से 7 अगस्त के बीच लिन्झुआंग (Linzhuang) में करीब 1,605 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि Banqiao में तीन दिनों के दौरान लगभग 1,422 मिलीमीटर बारिश हुई। आधी रात के बाद Banqiao Dam के ऊपर से पानी बहने लगा। कुछ ही समय में बांध की संरचना टूट गई और करोड़ों क्यूबिक मीटर पानी तेजी से नीचे की ओर फैल गया। इसके बाद एक के बाद एक कई जलाशयों के टूटने का सिलसिला शुरू हो गया।
62 बांध टूटे या संख्या इससे अलग थी?
इस त्रासदी से जुड़े आंकड़ों में आज भी अंतर दिखाई देता है। कई रिपोर्टों में बैंकाओ (Banqiao) और शिमंतन (Shimantan) समेत कुल 62 बांधों के टूटने की बात कही गई है। कुछ अध्ययनों में दो बड़े बांधों के साथ 62 छोटे जलाशयों का उल्लेख है, जबकि चीन के कुछ स्रोतों में करीब 60 जलाशयों के टूटने की बात सामने आती है। स्थिति इसलिए भी जटिल थी क्योंकि बाढ़ को नियंत्रित करने और दूसरे जलाशयों को बचाने के लिए कुछ बांधों को बाद में जानबूझकर तोड़ा गया था।

सिर्फ बाढ़ नहीं, उसके बाद शुरू हुआ असली संकट
बांध टूटने के बाद आई बाढ़ ने गांवों, सड़कों, रेलवे लाइनों और खेती की जमीनों को तबाह कर दिया। लाखों लोग फंस गए और कई इलाकों का संपर्क पूरी तरह टूट गया। बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी संकट खत्म नहीं हुआ। भोजन और साफ पानी की कमी, बीमारियों और गर्म मौसम ने हालात और खराब कर दिए। प्रिंसटन (Princeton) और सिंघुआ यूनिवर्सिटी (Tsinghua University) के शोधकर्ताओं के 2017 के अध्ययन ने बाढ़ के प्रत्यक्ष प्रभाव से करीब 26,000 मौतों का अनुमान लगाया और बाद की भूख तथा बीमारी से लगभग एक लाख अतिरिक्त मौतों की संभावना जताई। यही वजह है कि Banqiao Disaster में कुल मौतों का आंकड़ा आज भी विवादित है।
चेतावनी थी, लेकिन क्या लोगों तक पहुंची?
इस त्रासदी का सबसे भयावह पहलू सिर्फ बारिश और बांध टूटना नहीं था। संचार व्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित हुई थी। टेलीफोन और रेडियो संपर्क बाधित हो गए थे और भारी बारिश के बीच चेतावनी पहुंचाना बेहद मुश्किल हो गया। कुछ स्थानों तक संदेश पहुंचाने के लिए लोगों को खुद बाढ़ के बीच जाना पड़ा। कई संदेशवाहक भी बाढ़ की चपेट में आ गए। ऐसे में हजारों लोगों को खतरे का अंदाजा होने से पहले ही पानी ने घेर लिया। यही सवाल बाद में Banqiao Disaster की सबसे बड़ी सीखों में शामिल हुआ-अगर खतरे की सूचना समय पर लोगों तक न पहुंचे, तो प्राकृतिक आपदा कितनी तेजी से मानवीय त्रासदी में बदल सकती है?
क्या चीन ने दुनिया से आपदा छिपाई?
1975 की घटना को लेकर सबसे गंभीर विवाद सूचना के कथित दमन को लेकर है। उस समय चीन में सूचना और मीडिया पर कड़ा नियंत्रण था। बाद की रिपोर्टों के अनुसार, बाढ़ राहत की जानकारी तो सामने आई, लेकिन बांधों के टूटने और उससे हुई तबाही का वास्तविक पैमाना लंबे समय तक सार्वजनिक चर्चा में नहीं आया। Human Rights Watch की 1995 की रिपोर्ट ने इस आपदा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फिर चर्चा में ला दिया। कुछ पूर्व अधिकारियों और विशेषज्ञों के बयानों के आधार पर यह आरोप सामने आया कि उस समय खराब खबरों को सार्वजनिक करने से बचा जाता था। हालांकि, मृतकों की वास्तविक संख्या और घटना के सरकारी स्तर पर छिपाए जाने की सीमा को लेकर आज भी अलग-अलग दावे मौजूद हैं।
नेपाल की बाढ़ ने फिर क्यों जगाई पुरानी बहस?
हालिया नेपाल-चीन सीमा बाढ़ के बाद Banqiao की चर्चा इसलिए भी तेज हुई है क्योंकि हिमालयी क्षेत्र में अचानक आने वाली बाढ़, भूस्खलन, ग्लेशियर और नदी अवरोधों से जुड़े जोखिम फिर सामने आए हैं। नेपाल की भोटे कोशी-त्रिशूली नदी प्रणाली में आई अचानक बाढ़ के शुरुआती वैज्ञानिक आकलन इसे बर्फ, चट्टान या ग्लेशियर से जुड़े घटनाक्रम से जोड़ते हैं। वहीं, कुछ नेपाली पत्रकारों और विशेषज्ञों ने सीमा क्षेत्र में चल रहे बुनियादी ढांचा निर्माण की संभावित भूमिका पर सवाल उठाए हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
Three Gorges से लेकर नए बांधों तक उठते रहे सवाल
चीन के बड़े बांधों को लेकर पर्यावरणीय प्रभाव, जल-प्रबंधन और आपदा संबंधी जानकारी साझा करने जैसे मुद्दों पर लंबे समय से बहस होती रही है। इसी संदर्भ में चीन के थ्री गॉर्जेस बांध (Three Gorges Dam) और तिब्बत के मेडोग क्षेत्र में प्रस्तावित विशाल जलविद्युत परियोजना को लेकर भी विशेषज्ञों ने चिंताएं जताई हैं। हालिया नेपाल बाढ़ ने इस बहस को नया संदर्भ दे दिया है। सवाल यह है कि हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में अगर नदी का प्राकृतिक प्रवाह किसी भूस्खलन, ग्लेशियर या मानव निर्मित संरचना से बाधित होता है, तो नीचे बसे देशों और समुदायों को खतरे की जानकारी कितनी जल्दी मिलती है?
आधी सदी बाद भी Banqiao की सबसे बड़ी सीख
Banqiao Disaster सिर्फ एक बांध टूटने की कहानी नहीं है। यह अत्यधिक बारिश, कमजोर आपदा-प्रबंधन, संचार विफलता, चेतावनी में देरी और सूचना की कमी के एक साथ आने का उदाहरण है। 1975 की वह रात दिखाती है कि किसी भी जल-आपदा में खतरा सिर्फ पानी की मात्रा से तय नहीं होता। कमजोर बुनियादी ढांचा, देर से मिली चेतावनी और जानकारी की कमी नुकसान को कई गुना बढ़ा सकती है। आज, लगभग पांच दशक बाद, नेपाल-चीन सीमा पर आई बाढ़ ने उसी पुराने सवाल को फिर सामने ला दिया है-जब पहाड़ों में पानी और मलबा रास्ता रोक दें, तब समय पर मिली एक चेतावनी कितनी जिंदगियां बचा सकती है?


