GLOF यानी ग्लेशियर झील फटने से आने वाली बाढ़ क्या है? जानिए यह कैसे बनती है, हिमालय में इसका खतरा क्यों बढ़ रहा है और इससे बचाव कैसे संभव है।
Glacial Lake Outburst Flood Explained: बुधवार 26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास भोटेकशी नदी में बर्फ, चट्टान, कीचड़ और पानी का तेज बहाव आया। इसके बाद मडस्लाइड यानी कीचड़ और मलबे के तेज बहाव ने कई कस्बों और गांवों को अपनी चपेट में ले लिया। इस आपदा में अब तक 98 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि सैकड़ों लोग लापता हैं।
GLOF हो सकता है अचानक बाढ़ की वजह
- नेपाल में आई इस बाढ़ ने छोटे गांवों के साथ-साथ हाइड्रोपावर प्लांट, पुलों, सड़कों, बैंकों को भी भारी नुकसान पहुंचाया। हालांकि अभी यह पूरी तरह साफ नहीं है कि हिमस्खलन कहां से शुरू हुआ और इसके पीछे क्या वजह थी।
- लेकिन वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को आशंका है कि यह तबाही ग्लेशियल झील के फटने से आई बाढ़ यानी GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) की वजह से हो सकती है। पिछले कुछ वर्षों में हिमालयी क्षेत्र में कई GLOF की घटनाएं हुई हैं।
- इनसे पहाड़ों में बसे शहरों और कस्बों में बड़े पैमाने पर तबाही हुई है। अक्टूबर 2023 में सिक्किम में आई विनाशकारी बाढ़ भी इसका एक बड़ा उदाहरण है। आखिर GLOF क्या होता है, यह कैसे बनता है और हिमालयी क्षेत्र इससे इतना ज्यादा प्रभावित क्यों है? आइए समझते हैं।

GLOF क्या है और ग्लेशियर झील कैसे बनती है?
- ग्लेशियर कई वर्षों तक अपने साथ चट्टान और मलबा जमा करता रहता है। जब ग्लेशियर पिघलने लगता है और पीछे हटता है, तो उसके साथ बड़ी मात्रा में यह मलबा भी आगे बढ़ता है।
- धीरे-धीरे यह मलबा ग्लेशियर के सबसे निचले हिस्से तक पहुंचकर जमा हो जाता है। ग्लेशियर के इस निचले हिस्से को 'स्नाउट' या सिरा कहा जाता है। यहां जमा चट्टान, मिट्टी और दूसरे मलबे से एक तरह की दीवार बन जाती है।
- इस दीवार को मोरेन (Moraine) कहा जाता है। मोरेन ग्लेशियर से पिघलकर आने वाले पानी को रोक लेती है। हालांकि, इसके पीछे धीरे-धीरे पानी जमा होता जाता है और एक ग्लेशियर झील बन जाती है।
- जब किसी वजह से यह मोरेन टूट जाती है, तो झील का पानी कुछ ही मिनटों में तेजी से बाहर निकल सकता है। इसी घटना को GLOF यानी Glacial Lake Outburst Flood कहा जाता है।

GLOF में सिर्फ पानी नहीं, मलबा और बर्फ भी बहते हैं
GLOF को सामान्य बाढ़ से अलग बनाता है इसका बेहद तेज और विनाशकारी बहाव। इसमें सिर्फ पानी नीचे की ओर नहीं आता, बल्कि बड़े-बड़े पत्थर, गाद यानी सिल्ट, बर्फ और भारी मलबा भी अपने साथ बहता है। तेज ढलान के कारण यह पूरा बहाव बहुत तेजी से नीचे आता है। कई बार पानी की तुलना में मलबा और कीचड़ ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। यही वजह है कि GLOF के रास्ते में आने वाले पुल, सड़कें, इमारतें और दूसरे बुनियादी ढांचे कुछ ही समय में तबाह हो सकते हैं।
GLOF कैसे आता है?
GLOF कई अलग-अलग वजहों से हो सकता है। आमतौर पर इसके पीछे एक साथ कई खतरनाक परिस्थितियां काम करती हैं। एक स्थिति में ग्लेशियर झील के पानी का रिसाव मोरेन को कमजोर कर देता है और आखिरकार मोरेन टूट जाती है। दूसरी स्थिति में बड़े पत्थर या बर्फ का कोई हिस्सा झील में गिर जाता है। इससे पानी में अचानक बड़ी लहर पैदा हो सकती है और पानी झील के किनारे से बाहर निकल सकता है। सिर्फ बारिश से आमतौर पर GLOF नहीं आता। हालांकि, तेज बारिश मलबे को ढीला कर सकती है और ग्लेशियर झील में पानी का स्तर बढ़ा सकती है। इससे झील ओवरफ्लो होने का खतरा बढ़ जाता है।
सिक्किम की South Lhonak झील में कैसे आई थी बाढ़?
- सिक्किम की South Lhonak झील इसका एक उदाहरण है। यहां मोरेन का एक हिस्सा लंबे समय से धीरे-धीरे खिसक रहा था। आखिरकार 4 अक्टूबर 2023 को इसका एक हिस्सा झील में गिर गया।
- इसके बाद झील का पानी तेजी से बाहर निकला और बड़े पैमाने पर बाढ़ आई। इस घटना ने सिक्किम में भारी तबाही मचाई और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया।

GLOF की वजह पता करने में क्यों लगता है समय?
- किसी अचानक आई बाढ़ के पीछे असल कारण का पता लगाना हमेशा आसान नहीं होता। कई बार विशेषज्ञ भी कई हफ्तों तक इस बात पर सहमत नहीं हो पाते कि बाढ़ की शुरुआत वास्तव में किस घटना से हुई।
- अगस्त 2025 में उत्तरकाशी के धराली में आई अचानक बाढ़ के बाद भी ऐसी ही स्थिति सामने आई थी। उस समय नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी यानी NDMA के अधिकारियों ने बताया था कि करीब 6,700 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर का एक हिस्सा कुछ दिन पहले अलग हो गया था। इसके बाद कई दिनों तक हुई बारिश ने मलबे को खीर गंगा नदी की ओर नीचे धकेल दिया।
हिमालय में GLOF का खतरा क्यों बढ़ रहा है?
- हिमालय में GLOF के बढ़ते खतरे की मुख्य वजहों में जलवायु परिवर्तन को माना जाता है। काठमांडू स्थित International Centre for Integrated Mountain Development (ICIMOD) की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, 1970 के दशक से हिमालय के ग्लेशियर लगातार पतले हो रहे हैं और पीछे हट रहे हैं।
- ICIMOD ने इस साल की शुरुआत में बताया था कि हिमालय के ग्लेशियर अब वर्ष 2000 की तुलना में करीब दोगुनी तेजी से बर्फ खो रहे हैं।
- जब कोई ग्लेशियर पीछे हटता है, तो उसके पीछे नई ग्लेशियर झील बनने की संभावना बढ़ जाती है। दूसरी ओर, पहले से मौजूद झीलें भी लगातार बड़ी हो सकती हैं। इससे भविष्य में GLOF का खतरा बढ़ता है।

हिमालय में हजारों ग्लेशियर झीलें मौजूद
- अगस्त 2025 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO ने बताया था कि 2016-17 के दौरान हिमालय में 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 ग्लेशियर झीलें मिली थीं।
- इनमें से 676 झीलें 1984 के बाद काफी बड़ी हो गई थीं। इनमें 130 झीलें भारत में थीं। 65 झीलें सिंधु बेसिन, 58 ब्रह्मपुत्र बेसिन और सात गंगा बेसिन में थीं।
- ICIMOD की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर औसत वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है, तो इस क्षेत्र के करीब एक-तिहाई ग्लेशियर पिघल सकते हैं।
GLOF में इतना भारी नुकसान क्यों होता है?
GLOF से होने वाली तबाही का एक बड़ा कारण उन रास्तों पर बुनियादी ढांचे और कस्बों का निर्माण है, जहां से ऐसी बाढ़ गुजर सकती है। हालांकि, इन इलाकों में निर्माण के पीछे मजबूरी और जरूरत भी है। इन्हीं पहाड़ी क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं और कई जगहों पर स्थानीय अर्थव्यवस्थाएं भी इन्हीं संसाधनों पर निर्भर हैं। हिंदूकुश हिमालय में अनुमानित 500GW जलविद्युत क्षमता मौजूद है। इनमें से ज्यादातर पनबिजली परियोजनाएं उन घाटियों में बनाई गई हैं, जहां GLOF का खतरा बना रहता है।

क्या GLOF से बचाव संभव है?
GLOF के खतरे को पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं है। इंजीनियर कुछ ग्लेशियर झीलों का पानी निकाल सकते हैं या उनके आउटलेट यानी पानी निकलने के रास्ते को गहरा कर सकते हैं। लेकिन ज्यादातर ग्लेशियर झीलें समुद्र तल से करीब 4,500 मीटर की ऊंचाई पर होती हैं। वहां पहुंचना भी काफी मुश्किल होता है और कई जगह सिर्फ पैदल पहुंचा जा सकता है। ऐसे में इंसानी दखल की गुंजाइश सीमित रहती है और इस तरह के काम में जोखिम भी बहुत ज्यादा होता है।
निगरानी और समय पर चेतावनी सबसे जरूरी
- विशेषज्ञों के मुताबिक, GLOF से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए सबसे जरूरी चीज निगरानी और समय पर चेतावनी है। जिन ग्लेशियर झीलों को पहले से अस्थिर माना गया है, उन पर लगातार नजर रखने की जरूरत है।
- ऊंचाई वाले कैचमेंट क्षेत्रों में, जहां बारिश का पर्याप्त डेटा उपलब्ध नहीं है, वहां मौसम स्टेशन लगाए जाने चाहिए। इसके साथ ही नदियों के जलस्तर की निगरानी के लिए सेंसर लगाने की जरूरत है, ताकि पानी के स्तर में अचानक होने वाले बदलाव का पता समय रहते चल सके।
- सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बाढ़ के संभावित रास्तों पर निर्माण कार्य से बचा जाए। बस्तियों, सड़कों और पनबिजली परियोजनाओं की योजना बनाते समय GLOF और जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिमों को ध्यान में रखना जरूरी है।
- हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और ग्लेशियर झीलों के बढ़ने के साथ GLOF का खतरा भी बढ़ रहा है। ऐसे में वैज्ञानिक निगरानी, बेहतर चेतावनी प्रणाली और जोखिम वाले इलाकों में निर्माण को नियंत्रित करना ही भविष्य में होने वाली बड़ी तबाही को कम करने का महत्वपूर्ण तरीका हो सकता है।


