Human Body Donation: 2012 में जिल हैनसेन ने अपने पति का शरीर मेडिकल रिसर्च के लिए दान किया था। उन्हें उम्मीद थी कि इससे विज्ञान को मदद मिलेगी। लेकिन कई साल बाद उन्हें पता चला कि उनके पति के शरीर का इस्तेमाल अमेरिकी सेना ने ब्लास्ट-टेस्ट में किया। इस घटना ने देहदान प्रक्रिया में पारदर्शिता और परिवार की सहमति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
Body Donation Controversy: अमेरिका में देहदान से जुड़ा एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने मेडिकल रिसर्च और दानदाताओं की सहमति को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक महिला ने अपने पति की मौत के बाद यह सोचकर उनका शरीर विज्ञान को दान किया था कि इससे मेडिकल रिसर्च में मदद मिलेगी और भविष्य में लोगों की जान बचाने में योगदान होगा। लेकिन वर्षों बाद उसे कथित तौर पर पता चला कि उसके पति के शरीर का इस्तेमाल सैन्य परीक्षण से जुड़े एक प्रयोग में किया गया था।
पति की मौत के बाद लिया देहदान का फैसला
मामला अमेरिका की जिल हैनसेन से जुड़ा है। साल 2012 में उनके पति स्टीव हैनसेन की लिवर सिरोसिस के कारण मौत हो गई थी। बीमारी के कारण उनके अंग प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त नहीं थे। ऐसे में जिल ने उनके शरीर को दान करने का फैसला किया।
जिल का मानना था कि उनके पति का शरीर किसी मेडिकल संस्थान में शोध और शिक्षा के काम आएगा। उन्हें उम्मीद थी कि इस दान से डॉक्टरों और शोधकर्ताओं को मानव शरीर को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी।
मेडिकल रिसर्च के बजाय शरीर पहुंचा कहां?
रिपोर्ट्स के अनुसार, स्टीव के शरीर को एरिजोना स्थित बायोलॉजिकल रिसोर्स सेंटर नाम की संस्था को सौंपा गया था। यह संस्था दान किए गए मानव शरीरों और उनके हिस्सों को शोध से जुड़े इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराती थी।
लेकिन बाद में सामने आई जानकारी ने जिल को झकझोर दिया। आरोप है कि उनके पति के अवशेषों को अमेरिकी रक्षा विभाग से जुड़े एक परीक्षण के लिए उपलब्ध कराया गया था।
सैन्य विस्फोट परीक्षण में इस्तेमाल होने का दावा
रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि दान किए गए मानव अवशेषों का इस्तेमाल ऐसे सैन्य परीक्षणों में किया गया, जिनका उद्देश्य यह समझना था कि सैन्य वाहनों के नीचे होने वाले विस्फोटों का मानव शरीर पर किस तरह असर पड़ सकता है।
इस जानकारी के सामने आने के बाद जिल ने अपनी नाराजगी और पीड़ा जाहिर की। उनका कहना था कि उन्होंने शरीर दान इसलिए किया था क्योंकि उन्हें लगा था कि इसका इस्तेमाल मेडिकल सुविधा में किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि अगर उन्हें पहले से पता होता कि उनके पति के शरीर का इस तरह इस्तेमाल किया जा सकता है, तो वह कभी देहदान के लिए सहमत नहीं होतीं।
दानदाताओं की सहमति पर उठे बड़े सवाल
इस मामले ने सबसे बड़ा सवाल दानदाताओं की सहमति को लेकर खड़ा किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, रॉयटर्स की जांच में अमेरिकी सैन्य शोध के लिए भेजे गए 34 दानदाताओं के मामलों में सहमति से जुड़ी गड़बड़ियां सामने आईं।
कुछ मामलों में दानदाताओं के दस्तावेजों में सैन्य परीक्षण का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। वहीं कुछ मामलों में परिवारों ने ऐसे इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी थी।
दस्तावेजों की जांच के बाद रोका गया कार्यक्रम
बताया गया है कि सैन्य अधिकारी मानव अवशेष उपलब्ध कराने वाली संस्था की ओर से दिए गए दस्तावेजों पर भरोसा कर रहे थे। बाद में जब दस्तावेजों और दानदाताओं की वास्तविक सहमति के बीच अंतर सामने आया, तो संबंधित विस्फोट परीक्षण कार्यक्रम को रोक दिया गया।
इस पूरे मामले ने अमेरिका में देहदान की व्यवस्था पर गंभीर बहस छेड़ दी है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि दान किए गए शरीर का इस्तेमाल कहां हुआ, बल्कि यह भी है कि दान देने वाले व्यक्ति और उसके परिवार को इस्तेमाल की पूरी जानकारी दी गई थी या नहीं।
देहदान के साथ पारदर्शिता क्यों जरूरी?
देहदान को आम तौर पर समाज और विज्ञान के लिए महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। लेकिन इस तरह के मामले बताते हैं कि दानदाता की स्पष्ट सहमति और परिवार को दी गई जानकारी कितनी महत्वपूर्ण है।
किसी व्यक्ति के शरीर को शोध के लिए दान करने का फैसला बेहद निजी और भावनात्मक होता है। इसलिए शरीर या मानव अवशेषों का इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए किया जाएगा, इसकी स्पष्ट जानकारी और अनुमति बेहद जरूरी मानी जाती है। स्टीव हैनसेन का मामला इसी पारदर्शिता की जरूरत को एक बार फिर सामने लाता है।
