दिल्ली में BRICS Summit 2026 की मेजबानी भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक परीक्षा है। रूस-चीन के साथ साझेदारी, अमेरिका-यूरोप से रिश्ते और पश्चिम एशिया के मतभेदों के बीच भारत कैसे सहमति बनाएगा, सबकी नजर इसी पर है।
BRICS Summit 2026: नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी भारत के लिए सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन नहीं है। इस बार दिल्ली की मेज पर दुनिया की बदलती भू-राजनीति भी बैठेगी। चुनौती यह नहीं कि भारत कितने देशों को साथ ला पाता है, बल्कि यह है कि अलग-अलग और कई बार टकराते हितों के बीच कितनी सहमति बनती है।
भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर देती रही है। BRICS में रूस और चीन उसके अहम साझेदार हैं, लेकिन दोनों के साथ रिश्तों की अपनी पेचीदगियां हैं। रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा सहयोग गहरा है, जबकि चीन के साथ सीमा विवाद के बावजूद व्यापार और बहुपक्षीय मंचों पर संवाद जारी है।
BRICS को किसी एक खेमे का मंच बनने से रोकना चुनौती
भारत के लिए दूसरी बड़ी तस्वीर अमेरिका और यूरोप की है। व्यापार, निवेश, तकनीक, रक्षा और सप्लाई चेन में पश्चिम भारत के लिए महत्वपूर्ण साझेदार हैं। ऐसे में BRICS के भीतर अगर पश्चिम-विरोधी रुख को आगे बढ़ाने की कोशिश होती है, तो दिल्ली को संतुलन साधना होगा। भारत का हित साफ है, BRICS को किसी एक देश या किसी एक भू-राजनीतिक धड़े के मंच की पहचान न मिले।
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पश्चिम एशिया ने बढ़ाई मुश्किल
पश्चिम एशिया का संकट इस परीक्षा को और कठिन बनाता है। BRICS में ईरान और UAE दोनों हैं, जबकि भारत के इजराइल के साथ रक्षा और तकनीकी संबंध मजबूत हैं। दूसरी ओर ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी जैसे रणनीतिक हित जुड़े हैं। मई में दिल्ली में हुई BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक में सदस्य देशों के बीच संयुक्त बयान पर सहमति नहीं बन पाई थी। ऐसे में अब शिखर सम्मेलन में पश्चिम एशिया और अन्य संवेदनशील मुद्दों पर घोषणापत्र की भाषा पर खास नजर रहेगी।
असली परीक्षा घोषणापत्र से आगे
दिल्ली BRICS में भारत की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि अंतिम दस्तावेज जारी होता है या नहीं। असली कसौटी यह होगी कि भारत रूस और चीन के साथ रहते हुए अमेरिका-यूरोप से रिश्ते मजबूत रख सके और ईरान, UAE तथा इजराइल जैसे अलग-अलग हितों वाले देशों के साथ भी संतुलन बनाए रखे। यही भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की असली परीक्षा है, किसी एक खेमे का हिस्सा बने बिना, सभी के साथ अपने हित के आधार पर साझेदारी करना।
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