BRICS Summit New Delhi: भारत नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। यह अहम बैठक यूक्रेन और पश्चिम एशिया के संकट के साये में हो रही है। इस गुट का मकसद ग्लोबल साउथ की आवाज बनना है, लेकिन इसके सदस्य देशों के बीच गहरे मतभेद हैं, जो एक मध्यस्थ के रूप में भारत की कूटनीतिक क्षमता की परीक्षा लेंगे।

Russia Ukraine War: नई दिल्ली में 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है, जब पश्चिम एशिया का बढ़ता तनाव और रूस-यूक्रेन युद्ध दुनिया के सामने बड़ी चुनौती बने हुए हैं। भारत की अध्यक्षता में होने वाली बैठक की थीम ‘लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण’ रखी गई है। इन संघर्षों का असर ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य महंगाई, उर्वरक आपूर्ति और विकासशील देशों के बढ़ते कर्ज पर पड़ा है।

ग्लोबल साउथ की आवाज बनेगा ब्रिक्स?

विकासशील देशों को लगता है कि मौजूदा वैश्विक संस्थाओं में उनकी चिंताओं को पर्याप्त जगह नहीं मिलती। ऐसे में ब्रिक्स उनके लिए एक वैकल्पिक मंच के तौर पर उभर रहा है। विशेषज्ञ हर्ष वी. पंत के मुताबिक, पश्चिम एशिया और यूक्रेन संकट का असर विकासशील देशों पर ज्यादा पड़ा है। ऐसे में ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, कर्ज और आपूर्ति से जुड़े मुद्दे ब्रिक्स के एजेंडे में अहम रहेंगे।

बढ़ते विस्तार के बीच अंदरूनी मतभेद

ब्रिक्स के विस्तार से संगठन में अलग-अलग राजनीतिक और आर्थिक हित वाले देश शामिल हुए हैं। रूस और ईरान जहां पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं, वहीं भारत, यूएई, सऊदी अरब, मिस्र और अन्य देश पश्चिमी देशों के साथ भी मजबूत संबंध रखते हैं। ऐसे में किसी एक पक्ष के समर्थन वाली भाषा पर सहमति बनाना आसान नहीं होगा। स्थानीय मुद्रा में व्यापार और मजबूत आपूर्ति श्रृंखला जैसे व्यावहारिक मुद्दे साझा सहमति का आधार बन सकते हैं।

यूक्रेन युद्ध पर संतुलित रुख

ब्रिक्स ने अपने पिछले दस्तावेजों में संयुक्त राष्ट्र चार्टर और कूटनीतिक समाधान के प्रति प्रतिबद्धता जताई है। संगठन ने संवाद के जरिए युद्ध खत्म करने की पहल का समर्थन किया है। हालांकि, सदस्य देशों के रूस और पश्चिमी देशों के साथ अलग-अलग संबंध होने के कारण यूक्रेन मुद्दे पर एक समान राजनीतिक रुख बनाना अब भी चुनौतीपूर्ण है।

पश्चिम एशिया संकट ने बढ़ाई मुश्किल

पश्चिम एशिया को लेकर ब्रिक्स के भीतर मतभेद और ज्यादा स्पष्ट दिखाई देते हैं। गाजा में नागरिकों की मौत, विस्थापन और मानवीय संकट पर संगठन ने चिंता जताई है। साथ ही तत्काल युद्धविराम, मानवीय सहायता और फिलिस्तीन के लिए दो-राष्ट्र समाधान के समर्थन की बात कही गई है। लाल सागर और अन्य महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा भी प्रमुख मुद्दा है।

भारत की कूटनीतिक परीक्षा

ब्रिक्स अध्यक्ष के रूप में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग विचार रखने वाले देशों को एक साझा मंच पर बनाए रखना है। भारत लगातार संवाद और कूटनीति को संघर्षों के समाधान का रास्ता बताता रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘यह युद्ध का युग नहीं है’ वाला संदेश भी इसी नीति को दर्शाता है। रूस, ईरान और पश्चिमी देशों के साथ भारत के संबंध उसे संवाद के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका देते हैं।

पुतिन और पेसेश्कियन की मौजूदगी अहम

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेसेश्कियन की नई दिल्ली में मौजूदगी सम्मेलन को खास कूटनीतिक महत्व देती है। दोनों देशों का संबंध मौजूदा वैश्विक संघर्षों से सीधे जुड़ा है। ऐसे में सम्मेलन के दौरान द्विपक्षीय बातचीत के जरिए युद्ध, व्यापार, ऊर्जा और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा के रास्ते खुल सकते हैं।

नई वैश्विक व्यवस्था की उम्मीद

18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन सिर्फ सदस्य देशों की बैठक नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में संगठन की भूमिका का परीक्षण भी है। स्थानीय मुद्रा में व्यापार, आपूर्ति श्रृंखला, डिजिटल ढांचे और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार जैसे मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने की कोशिश होगी। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ब्रिक्स अपने मतभेदों को पीछे छोड़कर ग्लोबल साउथ के लिए एक प्रभावी और साझा आवाज बन पाएगा।