Raksha Bandhan Special Story: 5वीं की छात्रा और 6 किलोमीटर का खतरनाक सफर! जानिए कैसे उत्तर प्रदेश की पूर्व सीएम मायावती ने बचपन में अपनी जान पर खेलकर अपने बीमार भाई की जिंदगी बचाई थी। रक्षाबंधन की यह कहानी आपको हैरान कर देगी।

Mayawati Raksha Bandhan Story: रक्षाबंधन का पावन पर्व हमेशा से भाई-बहन के अटूट प्रेम और एक-दूसरे की रक्षा के वादे का प्रतीक रहा है। पारंपरिक सोच यह रही है कि बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और बदले में भाई उसकी रक्षा का संकल्प लेता है। लेकिन इतिहास और समाज में ऐसी कई मिसालें हैं जहां बहनों ने अपनी निडरता, साहस और त्याग से अपने भाइयों की जान बचाकर इस परिभाषा को नया आयाम दिया है। ऐसी ही एक बेहद भावुक और प्रेरणादायक कहानी उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा प्रमुख मायावती के बचपन से जुड़ी है।

अचानक छाया संकट: जब जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था मासूम

दो बहनों और छह भाइयों के भरे-पूरे परिवार में पली-बढ़ीं मायावती बचपन से ही अपने निर्भीक स्वभाव के लिए जानी जाती थीं। बात तब की है जब मायावती महज 5वीं कक्षा में पढ़ती थीं। उसी दौरान उनके चौथे भाई सुभाष का जन्म हुआ था। जन्म के कुछ ही दिनों बाद मासूम सुभाष को गंभीर निमोनिया हो गया और उसकी तबीयत तेजी से बिगड़ने लगी। डॉक्टर ने तुरंत अस्पताल ले जाकर इंजेक्शन लगवाने की सलाह दी। लेकिन परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा-पिता प्रभु दास किसी काम से शहर से बाहर थे और मां खुद बीमार होकर बिस्तर पर पड़ी थीं।

न पैसे, न सवारी: 10 साल की बच्ची ने उठाया जोखिम भरा कदम

सरकारी अस्पताल, जहां परिवार को मुफ्त इलाज की सुविधा उपलब्ध थी, वहां से करीब 6 किलोमीटर की दूरी पर था। घर में कोई बड़ा मौजूद नहीं था जो बच्चे को ले जा सके और किसी गाड़ी या रिक्शा को किराए पर लेने के लिए जेब में पैसे तक नहीं थे। जरा सी देरी मासूम सुभाष की जान ले सकती थी। ऐसे नाजुक मोड़ पर 10-11 साल की नन्हीं मायावती ने खुद यह जिम्मेदारी उठाने का साहसिक फैसला किया।

2.5 घंटे का थका देने वाला सफर: गोद में बीमार भाई और पानी की बोतल

स्कूल से लौटते ही मायावती ने बिना समय गंवाए अपने बीमार भाई को गोद में उठाया और तपती सड़क पर पैदल ही अस्पताल की तरफ कदम बढ़ा दिए। एक हाथ से दूसरे हाथ में भाई को बदलते हुए वह लगातार चलती रहीं। अपनी आत्मकथा में इस घटना का जिक्र करते हुए मायावती ने लिखा था कि वह अपने साथ पानी की एक छोटी बोतल ले गई थीं। जब भी रास्ते में भूख या दर्द से रोता हुआ सुभाष तड़पता, तो वह ठहर जातीं और उसे पानी की कुछ बूंदें पिलाकर फिर आगे बढ़ चलतीं। पूरे ढाई घंटे के थका देने वाले पैदल सफर के बाद वह आखिरकार अस्पताल पहुंचने में कामयाब हुईं।

अस्पताल में डॉक्टर रह गए हैरान: रात को मिला मां का आंसुओं से भरा प्यार

जब एक छोटी सी बच्ची अपनी गोद में गंभीर रूप से बीमार नवजात को लेकर अस्पताल पहुंची, तो वहां मौजूद डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ हक्के-बक्के रह गए। डॉक्टरों ने तुरंत सुभाष का इलाज शुरू किया और जरूरी दवाइयां दीं। इलाज कराने के बाद, मायावती उसी तरह फिर से पैदल चलकर रात करीब 9:30 बजे अपने घर वापस लौटीं। घर पहुंचते ही बीमार मां ने अपनी मासूम बेटी को सीने से लगा लिया और रो पड़ीं। यह रोना खुशी और राहत का था कि कैसे उनकी छोटी सी बेटी ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए अपने भाई को मौत के मुंह से खींच निकाला।

रक्षाबंधन पर फिर क्यों याद आती है यह कहानी?

रक्षाबंधन का संदेश अक्सर भाई द्वारा बहन की रक्षा के संकल्प से जोड़ा जाता है। लेकिन मायावती के बचपन का यह प्रसंग बताता है कि भाई-बहन के रिश्ते में सुरक्षा एकतरफा नहीं होती। जब सुभाष की जिंदगी पर संकट आया, तब एक छोटी बहन ने बिना किसी सहारे के जिम्मेदारी उठाई और अपने भाई को इलाज तक पहुंचाया। यही वजह है कि रक्षाबंधन के मौके पर यह पुरानी कहानी आज भी अलग अर्थ रखती है।

इस घटना का उल्लेख पत्रकार अजोय बोस की किताब 'बहनजी: अ पॉलिटिकल बायोग्राफी ऑफ मायावती' में भी किया गया है। मायावती के बचपन का यह प्रसंग उनके व्यक्तित्व में दिखाई देने वाले दृढ़ संकल्प और जिम्मेदारी की भावना की एक झलक देता है। राखी की कलाई पर बंधा धागा सिर्फ रक्षा का वादा नहीं है। कभी-कभी वही रिश्ता यह भी दिखाता है कि संकट की घड़ी में बहन अपने भाई के लिए खुद ढाल बन सकती है।