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  • ISRO पर Cambridge Study का बड़ा दावा: दुनिया के सबसे महंगे रॉकेट लॉन्च में भारत नंबर-1, जानिए क्यों?

ISRO पर Cambridge Study का बड़ा दावा: दुनिया के सबसे महंगे रॉकेट लॉन्च में भारत नंबर-1, जानिए क्यों?

कैम्ब्रिज की स्टडी ने ISRO की किफायती स्पेस इमेज पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। भारत की रॉकेट लॉन्च लागत अमेरिका से करीब 4 गुना ज्यादा क्यों निकली? ISRO ने डेटा को गलत बताया, जानिए इस हैरान कर देने वाले आंकड़े के पीछे की क्या है असली कहानी!

4 Min read
Author : Surya Prakash Tripathi
Published : Aug 23 2026, 11:55 AM IST
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भारत के रॉकेट लॉन्च दुनिया में सबसे महंगे, जानिए क्यों?
Image Credit : ANI

भारत के रॉकेट लॉन्च दुनिया में सबसे महंगे, जानिए क्यों?

ISRO Launch Cost: दशकों से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) को दुनिया भर में 'किफ़ायती इंजीनियरिंग' (frugal engineering) के एक बेजोड़ मॉडल के तौर पर देखा जाता रहा है। पश्चिमी देशों के महंगे बजट की तुलना में बहुत कम लागत पर चंद्रयान और मंगलयान जैसे मिशनों को अंजाम देने वाली भारत की छवि लोगों के मन में गहराई से बसी हुई है। लेकिन हाल ही में यूरोप के दो सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों की एक विस्तृत एकेडमिक स्टडी ने इस स्थापित धारणा पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।

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क्या सबसे महंगा है भारत का रॉकेट लॉन्च?
Image Credit : ANI

क्या सबसे महंगा है भारत का रॉकेट लॉन्च?

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और इटली की पोलिटेक्निको डि टोरिनो की एक संयुक्त स्टडी में यह चौंकाने वाला दावा किया गया है कि प्रति-किलोग्राम पेलोड लॉन्च की लागत के मामले में भारत दुनिया में सबसे महंगा देश है। प्रतिष्ठित एल्सेवियर जर्नल 'इकोनॉमिक्स लेटर्स' में प्रकाशित इस पीयर-रिव्यू रिपोर्ट के शोधकर्ता एलेसिओ टेरज़ी और फ्रांसेस्को निकोली ने 1960 से 2025 के बीच 6,740 से अधिक रॉकेट लॉन्च के डेटाबेस का विश्लेषण किया। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में एक किलोग्राम पेलोड भेजने की वैश्विक औसत लागत $3,868 प्रति किलोग्राम थी।

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ग्लोबल लॉन्च लागत की तुलना (2025 का आंकड़ा)
Image Credit : ANI

ग्लोबल लॉन्च लागत की तुलना (2025 का आंकड़ा)

  • अमेरिका: $3,225 प्रति किलोग्राम (सबसे कम)
  • वैश्विक औसत: $3,868 प्रति किलोग्राम
  • जापान: $5,287 प्रति किलोग्राम
  • चीन: $5,809 प्रति किलोग्राम
  • रूस: $6,682 प्रति किलोग्राम
  • यूरोप: $9,897 प्रति किलोग्राम
  • भारत: $13,302 प्रति किलोग्राम (अमेरिका से लगभग 4 गुना अधिक)

इस डेटा के अनुसार, भारत में प्रति किलोग्राम लॉन्च की लागत अमेरिका की तुलना में लगभग चार गुना अधिक है, जो देश के कम खर्चीले स्पेस प्रोग्राम की छवि के बिल्कुल विपरीत है।

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रॉकेट का साइज़ और गणित का पेच: आखिर क्यों बढ़ी प्रति-किलो लागत?
Image Credit : ANI

रॉकेट का साइज़ और गणित का पेच: आखिर क्यों बढ़ी प्रति-किलो लागत?

शोधकर्ताओं के अनुसार, यह विरोधाभास रॉकेट के आकार और पेलोड क्षमता के कारण पैदा होता है। भारत के लॉन्च व्हीकल (जैसे PSLV) मुख्य रूप से छोटे और मध्यम पेलोड ले जाते हैं। जब किसी मिशन की कुल फिक्स्ड इंफ्रास्ट्रक्चर लागत कम किलोग्राम पर बंटती है, तो पूरे मिशन का कुल बजट कम होने के बावजूद प्रति किलोग्राम लागत काफी ज़्यादा हो जाती है। इसके विपरीत, बड़ी क्षमता वाले रॉकेट बड़ी मात्रा में पेलोड ले जाते हैं, जिससे प्रति किलो लागत घट जाती है।

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कम खर्च वाला ISRO फिर महंगा कैसे?
Image Credit : ANI

कम खर्च वाला ISRO फिर महंगा कैसे?

यहीं स्टडी का सबसे दिलचस्प पहलू सामने आता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक भारत के लॉन्च व्हीकल आमतौर पर छोटे पेलोड ले जाते हैं। ऐसे में रॉकेट और मिशन की तय लागत कम किलोग्राम पर बंटती है, जिससे प्रति किलोग्राम लागत बढ़ जाती है, भले ही पूरे मिशन का खर्च कम हो। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि अधिक लॉन्च फ्रीक्वेंसी और अनुभव लागत घटाने में अहम भूमिका निभाते हैं। अमेरिका को खासतौर पर SpaceX की तेज लॉन्च गति और रीयूजेबल रॉकेट तकनीक का बड़ा फायदा मिला है।

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लॉन्च की कम फ्रीक्वेंसी और रीयूज़ेबिलिटी का अभाव
Image Credit : ANI

लॉन्च की कम फ्रीक्वेंसी और रीयूज़ेबिलिटी का अभाव

अध्ययन में बताया गया है कि अमेरिका की कम लागत के पीछे मुख्य वजह लॉन्च की उच्च फ्रीक्वेंसी और रीयूज़ेबल (पुनः उपयोग योग्य) रॉकेट तकनीक है। अर्थशास्त्र के 'एक्सपीरियंस कर्व' के मुताबिक, जो देश जितनी अधिक बार लॉन्च करते हैं, उनकी लागत उतनी ही तेज़ी से घटती है। SpaceX के फाल्कन 9 रॉकेट के पहले चरण को बार-बार इस्तेमाल किए जाने से अमेरिका को जबरदस्त फायदा मिला है। अकेले 2025 में SpaceX ने लगभग 165 लॉन्च किए और ऑर्बिट में भेजे गए कुल ग्लोबल पेलोड का करीब 75% हिस्सा कवर किया। इसके मुकाबले, ISRO ने अपने 57 साल के इतिहास में कुल 105 के करीब लॉन्च किए हैं और भारत के पास अभी ऑर्बिटल रीयूज़ेबल रॉकेट सेवा में चालू नहीं है।

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ISRO और दिग्गजों का तीखा पलटवार: "आंकड़े गलत और भ्रामक"
Image Credit : ANI

ISRO और दिग्गजों का तीखा पलटवार: "आंकड़े गलत और भ्रामक"

इस रिपोर्ट के सामने आते ही भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र में खलबली मच गई। हालांकि, ISRO और भारत के शीर्ष विशेषज्ञों ने इस निष्कर्ष को पूरी तरह खारिज कर दिया है:

  • ISRO चेयरमैन डॉ. वी. नारायणन: उन्होंने NDTV से बात करते हुए स्पष्ट किया कि इस रिसर्च पेपर में "गलत डेटा" और दोषपूर्ण अनुमानों का इस्तेमाल किया गया है।
  • पूर्व चेयरमैन डॉ. एस. सोमनाथ: उन्होंने कहा कि प्रति किलोग्राम लागत पूरी कहानी नहीं बताती। उदाहरण के लिए, 4.5 टन के भारी सैटेलाइट के लिए अमेरिकी प्रोवाइडर की लागत और ISRO के 'लॉन्च व्हीकल मार्क-3' (LVM-3) की लागत लगभग बराबर ही आती है। SpaceX की कम लागत उनके अपने इंटरनल इस्तेमाल और विशाल पैमाने की वजह से है, जिसका फायदा वे बाहरी ग्राहकों को सीधे तौर पर नहीं देते।
  • इसके अलावा, भारत में पारदर्शी कॉस्ट अकाउंटिंग की कमी और लंबे समय तक चलने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर का खर्च कई मिशनों में बंटने की वजह से भी पश्चिमी मानकों से सीधी तुलना करना भ्रामक हो जाता है।
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भविष्य की चुनौती या वेक-अप कॉल?
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भविष्य की चुनौती या वेक-अप कॉल?

यह रिपोर्ट ISRO के लिए किसी हमले की तरह नहीं, बल्कि बदलते दौर की एक 'वेक-अप कॉल' के रूप में देखी जा रही है। भारत की योजना अपनी स्पेस इकॉनमी को मौजूदा 8-9 अरब डॉलर से बढ़ाकर अगले दशक में 40-45 अरब डॉलर तक पहुंचाने की है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारत को अपने 'नेक्स्ट जेनरेशन लॉन्च व्हीकल' (NGLV) और रीयूज़ेबल तकनीक पर तेजी से काम करना होगा। केवल सीमित बजट में काम चलाने के बजाय, लॉन्च की बारंबारता और पुनः उपयोग की क्षमता ही भविष्य के वैश्विक स्पेस मार्केट में भारत की बढ़त तय करेगी।

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About the Author

SP
Surya Prakash Tripathi
सूर्य प्रकाश त्रिपाठी। 20 जुलाई 2003 से पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत। कुल 22 साल का अनुभव। 19 फरवरी 2024 से एशियानेट न्यूज हिंदी के साथ जुड़े हुए हैं। पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री के साथ इन्होंने डबल MA LLB भी किया हुआ है। इन्होंने क्राइम, धर्म और राजनीति के साथ सामाजिक मुद्दों पर लिखने की रुचि है। हिंदी दैनिक आज, डेली न्यूज एक्टिविस्ट, अमर उजाला, दैनिक भास्कर डिजिटल (DB DIGITAL) जैसे मीडिया संस्थानों में भी सूर्या सेवाएं दे चुके हैं।
विश्व समाचार
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