Ganesh Chaturthi Katha: इस साल गणेश चतुर्थी का पर्व 14 सितंबर, सोमवार को मनाया जाएगा। इसी दिन से 10 दिवसीय गणेश उत्सव की शुरुआत होगी। इस व्रत से जुड़ी एक रोचक कथा भी है।

Ganesh Chaturthi Vrat Katha In Hindi: गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की पूजा के साथ उनकी व्रत कथा सुनने और पढ़ने का भी विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि इस कथा का श्रवण करने से भगवान गणेश प्रसन्न होते हैं और जीवन में आने वाली विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं। गणेश चतुर्थी की व्रत कथा में श्रीकृष्ण, स्यमन्तक मणि और चंद्रमा के दर्शन से लगे मिथ्या कलंक का भी प्रसंग आता है। आगे पढ़िए गणेश चतुर्थी की पूरी व्रत कथा...

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गणेश चतुर्थी की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, द्वारिका में सत्राजित नाम का एक यादव रहता था। उसने भगवान सूर्य की कठोर तपस्या की। प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उसे स्यमन्तक मणि दी। मान्यता थी कि यह मणि रोज बड़ी मात्रा में सोना देती थी। सत्राजित ने यह मणि अपने भाई प्रसेनजित को दे दी।
एक दिन प्रसेनजित मणि पहनकर जंगल में शिकार करने गया। वहां एक सिंह ने उसे मार डाला और मणि लेकर चला गया। बाद में जाम्बवन्त ने सिंह का वध कर मणि अपनी पुत्री जाम्बवती को दे दी। इधर द्वारिका में श्रीकृष्ण पर आरोप लगने लगा कि उन्होंने मणि के लालच में प्रसेनजित की हत्या कर दी है।

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अपने ऊपर लगे आरोप को गलत साबित करने के लिए श्रीकृष्ण मणि की तलाश में जंगल पहुंचे। सिंह के पैरों के निशान का पीछा करते हुए वे जाम्बवन्त की गुफा तक पहुंचे। वहां मणि देखकर उन्होंने उसे लेने का प्रयास किया। इसी दौरान जाम्बवन्त और श्रीकृष्ण के बीच भयंकर युद्ध हुआ। कई दिनों तक चले युद्ध के बाद जाम्बवन्त को समझ आया कि श्रीकृष्ण कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं। उन्होंने श्रीकृष्ण को पहचान लिया और अपनी पुत्री जाम्बवती का विवाह उनसे कर दिया। साथ ही स्यमन्तक मणि भी उन्हें सौंप दी।
श्रीकृष्ण मणि लेकर द्वारिका लौटे और सभा में पूरी घटना बताकर सत्राजित को मणि वापस कर दी। इस तरह वे आरोप से मुक्त हो गए। बाद में सत्राजित ने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह भी श्रीकृष्ण से कर दिया।
लेकिन स्यमन्तक मणि को लेकर विवाद फिर खड़ा हुआ। शतधन्वा ने सत्राजित की हत्या कर मणि चुरा ली और बाद में उसे अक्रूर को सौंप दिया। श्रीकृष्ण ने शतधन्वा का वध कर दिया, लेकिन मणि उनके हाथ नहीं लगी। इस घटना के कारण एक बार फिर श्रीकृष्ण पर तरह-तरह के आरोप लगने लगे।
तभी देवर्षि नारद ने श्रीकृष्ण को बताया कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्रमा को देखने से मिथ्या कलंक लगने का दोष होता है। इसके पीछे भगवान गणेश का चंद्रमा को दिया हुआ श्राप था।
कथा के अनुसार, एक बार चंद्रमा ने भगवान गणेश के स्वरूप का उपहास किया था। इससे क्रोधित होकर गणेशजी ने उन्हें श्राप दिया कि जो व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्रमा के दर्शन करेगा, उस पर झूठा आरोप लग सकता है। बाद में देवताओं की प्रार्थना पर गणेशजी ने श्राप का प्रभाव कम करते हुए उपाय भी बताया।
श्रीकृष्ण ने नारदजी के बताए अनुसार गणेशजी का व्रत और पूजन किया। इसके बाद वे मिथ्या कलंक से मुक्त हो गए। मान्यता है कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को भूल से चंद्रमा के दर्शन हो जाएं तो स्यमन्तक मणि की कथा और चंद्रमा से जुड़ी यह कथा सुननी या पढ़नी चाहिए। इससे चंद्रदर्शन के दोष से मुक्ति मिलने की मान्यता है।


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